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हेमंत सोरेन ने जीता विश्वास मत, लेकिन अब भी कुर्सी पर संकट के बादल!

झारखंड मेंं गहराए राजनीतिक संकट के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया है. वो भले बीजेपी पर हमलावर हों, लेकिन उनकी सदस्यता पर अभी भी संशय बना हुआ है. राज्यपाल रमेश बैस अगर सोरेन की सदस्यता खत्म कर देते हैं तो उन्हें सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ जाएगी.

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झारखंड सीएम हेमंत सोरेन
झारखंड सीएम हेमंत सोरेन

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी कुर्सी पर मंडराते सियासी संकट के बीच सोमवार को विधानसभा के विशेष सत्र में विश्वास मत हासिल कर लिया. अत्मविश्वास से भरे सोरेन यह संदेश देने में सफल रहे कि बीजेपी दिल्ली से लेकर रांची तक उनके खिलाफ साजिश कर रही है, लेकिन वो डरने वाले नहीं हैं. सोरेन सरकार को भले ही बहुमत हासिल हो, लेकिन उनकी सदस्यता पर राज्यपाल रमेश बैस ने अभी तक कोई फैसला नहीं दिया है. इस तरह से झारखंड में सियासी अस्थिरता की संभावना जस की तस बनी हुई है? 

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राज्यपाल लेंगे सोरेन पर फैसला

बीजेपी ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले को लेकर सीएम हेमंत सोरेन और उनके परिवार के खिलाफ राज्यपाल रमेश बैस से शिकायत की थी कि उन्हें अयोग्य करार दिया जाए. शिकायत को गवर्नर ने चुनाव आयोग को भेजा था. इस पर चुनाव आयोग ने सोरेन को नोटिस देकर उनकी और शिकायतकर्ता का पक्ष जानने के बाद अपनी सिफारिश राज्यपाल को भेज दी थी. सोरेन की सदस्यता पर राज्यपाल रमेश बैस ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया जबकि उन्होंने शुक्रवार को दो दिन में स्टैंड लेने की बात कही थी. 

हालांकि, चुनाव आयोग ने सोरेन मामले में राज्यपाल से क्या सिफारिश की है, यह बात अभी तक औपचारिक रूप से सामने नहीं आई है. लेकिन माना जा रहा है कि आयोग ने सोरेन के खिलाफ शिकायत को सही पाया है और उन्हें अयोग्य करार दिए जाने की सिफारिश की है. इसके बाद से झारखंड में राजनीतिक सरगर्मी तेज है. ऐसे में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सियासी तौर पर शह-मात का खेल चल रहा है.

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विश्वास मत जीते, लेकिन संकट नहीं टला 

झारखंड में सियासी संशय के बीच हेमंत सोरेन ने विधानसभा में उम्मीद के अनुरूप समर्थन हासिल कल लिया. विधानसभा में 81 सदस्यों में से विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 48 वोट पड़े. जेएमएम के 30, कांग्रेस के 15, आरजेडी-सीपीआई माले-एनसीपी के एक-एक विधायकों का समर्थन मिला है जबकि बीजेपी और आजसू के विधायक वाकआउट कर गए थे. हेमंत सोरेन विश्वास प्रस्ताव पास कर भले ही अब विपक्ष के लिए छह महीने तक सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाना मुश्किल होगा, लेकिन सोरेन की सदस्यता पर संकट बना हुआ है.   

राज्य विधानसभा में विश्वासमत पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गंभीर आरोप लगाए. सदन में सोरेन ने कहा कि 25 अगस्त से राज्य में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है. चुनाव आयोग और राजभवन के द्वारा ऐसा माहौल बनाया जा रहा है. चुनाव आयोग कहता है कि उसके द्वारा अनुशंसा भेजी गई है, लेकिन राजभवन द्वारा इस पर कोई खुलासा नहीं किया गया है. यहां तक कि यूपीए के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मिलकर वस्तुस्थिति की जानकारी मांगी, तब कहीं जाकर राज्यपाल ने आयोग का पत्र मिलने की बात स्वीकार की. उन्होंने दो-तीन दिनों के भीतर इसे स्पष्ट करने की बात कही थी, लेकिन इसके बाद वह सीधे दिल्ली अपने आकाओं से मिलने चले गए. 

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सोरेन क्यों आत्मविश्वास से भरे हैं

विधानसभा के एक दिन के विशेष सत्र में बीजेपी भले ही महागठबंधन को आईना दिखाने में सफल ना हुई हो, लेकिन हेमंत सोरेन ने एक तीर से कई शिकार जरूर किए हैं. सोरेन के सदन में दिए गए भाषण को देखें तो वो आत्मविश्वास से काफी भरे हुए नजर आए और बीजेपी पर काफी हमलावर थे. सोरेन ने एक लाइन कहकर ये साबित करने की कोशिश की कि ना सिर्फ यह बहुमत की सरकार है, बल्कि हिम्मत की सरकार है. न डरूंगा, न डराऊंगा. 

विश्वासमत हासित करने को हेमंत सरकार की एक दूरगामी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है. इसके बाद छह माह तक सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाना मुश्किल होगा. इसलिए इसे मौजूदा सरकार का एक बड़ा संकट टलने का संकेत बताया जा रहा है, लेकिन इससे सोरेन की विधायकी पर आया संकट दूर होने की उम्मीद कम है. चुनाव आयोग की सिफारिश पर रमेश बैस को फैसला करना है, जो मंगलवार को दिल्ली से रांची पहुंचेगे.  

राज्यपाल के फैसले पर टिकी निगाहें

माना जा रहा है कि उनके रांची लौटने के बाद ही सीएम हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता पर राज्यपाल का फैसला सार्वजनिक होगा. बताया जाता है कि राज्यपाल अब मंगलवार को रांची लौट सकते हैं और उनके फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं. राज्यपाल रमेश बैश अगर चुनाव आयोग की सिफारिश पर क्या कदम उठाते हैं, इस पर ही झारखंड का राजनीतिक भविष्य निर्भर है.

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गवर्नर रमेश बैस अगर हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता को खत्म कर देते तो फिर उन्हें सीएम पद छोड़ना होगा. ऐसे में फिर महागठबंधन को नए नेता का चुनाव करके नए सिरे से विश्वासमत हासिल करना अनिवार्य हो जाएगा. हेमंत सोरेन फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं, लेकिन उन्हें सदन में बहुमत साबित करनी होगी. इसके अलावा उन्हें छह महीने के अंदर दोबारा से विधायक बनना होगा. सोरेन के लिए मामला इतना आसान है या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा? 

 

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