हाथरस की निर्भया मामले को लेकर विपक्ष के तमाम दलों ने योगी सरकार के खिलाफ लगातार मोर्चा खोल रखा है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने पीड़िता के परिवार से मिलने के बाद यूपी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. इस मुद्दे के बहाने कांग्रेस अब मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार के खिलाफ सोमवार को मौन धरना-प्रदर्शन कर दलितों को संदेश देना चाहती है कि हम आपके साथ खड़े हैं. मध्य प्रदेश में होने जा रहे उपचुनाव के मद्देनजर कांग्रेस की इस कोशिश को राजनीतिक समीकरण साधने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.
दरअसल, हाथरस मामले में पुलिस और प्रशासन ने अमानवीयता से लेकर घोर लापरवाही की है, जिसके लेकर लोगों में जबरदस्त गुस्सा है. पीड़िता के परिजनों से दुर्व्यवहार, आधी रात को शव का दाह संस्कार, दस दिन बाद आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म की धाराएं जोड़ने के मामले को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है. इस मामले को लेकर लोगों की नाराजगी की आग धीरे-धीरे मध्य प्रदेश तक पहुंच रही है, जहां 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं. इन सीटों पर दलित समुदाय किंगमेकर माने जाते हैं.
कांग्रेस का मौन प्रदर्शन
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि 'एक तरफ भाजपा 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का बढ़-चढ़ कर नारा देती है, लेकिन दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्यों में ही आज बेटियां सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं. चाहे यूपी के हाथरस की घटना हो या मध्य प्रदेश के खरगोन, सतना, जबलपुर , खंडवा, सिवनी, कटनी या नरसिंहपुर की घटना हो, आज हमारी बहन-बेटियां सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं'. कमलनाथ ने शिवराज सरकार पर हमला करते हुए कहा कि 'मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरफ चौपट हो चुकी है. अपराधी तत्व बहन-बेटियों के साथ दरिंदगी, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं को बेखौफ अंजाम दे रहे हैं. बीजेपी महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के मामले पर मौन है.
एमपी की 28 सीटों पर उपचुनाव
मध्य प्रदेश की 28 विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनावों में से 11 सीट आरक्षित हैं जबकि बाकी 17 सीटें सामान्य हैं. इन सीटों पर करीब 20 फीसदी दलित मतदाता हैं, जो काफी अहम और निर्णायक माने जाते हैं. उपचुनाव वाली ज्यादातर सीटें ग्वालियर-चंबल संभाग की हैं. दलित बहुल और उत्तर प्रदेश से सटा होने के चलते इस इलाके में बसपा का अच्छा खासा जनाधार है.
बता दें कि साल 2018 में हुए चुनाव में इनमें से कई आरक्षित सीट पर बसपा दूसरे नंबर पर रही थी. एमपी उपचुनाव कांग्रेस के लिए बेहद अहम है, क्योंकि इन चुनावों में जीत पार्टी की सत्ता में वापसी की राह बना सकती है. इसीलिए, कांग्रेस उपचुनावों में दलित मतदाताओं को अपनी तरफ करना चाहती है, जिसके लिए हाथरस कांड पर बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है जबकि बसपा प्रमुख इस मुद्दे पर अभी तक सड़क पर नहीं उतर सकी हैं. ऐसे में कांग्रेस दलित समुदाय को एक राजनीतिक संदेश देने की कवायद में है.
दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में
मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल संभाग के तहत आने वाली सीटों पर बसपा को अच्छा खासा वोट मिलता रहा है. पिछले चुनाव में 15 सीटों पर उसे निर्णायक वोट मिले थे. इनमें से दो सीटों पर बसपा प्रदेश में दूसरे नंबर पर रही थी जबकि 13 सीटें ऐसी थीं, जहां बसपा प्रत्याशियों को 15 हजार से लेकर 40 हजार तक वोट मिले थे. ग्वालियर-चंबल की जिन सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, उनमें से मेहगांव, जौरा, सुमावली, मुरैना, दिमनी, अंबाह, भांडेर, करैरा और अशोकनगर सीट पर बसपा पूर्व के चुनाव में जीत दर्ज कर चुकी है.
2018 के विधानसभा चुनाव में गोहद, डबरा और पोहरी में बसपा दूसरे नंबर पर रही है जबकि ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व और मुंगावली में उसकी मौजूदगी नतीजों को प्रभावित करने वाली साबित हुई. मुरैना में बीजेपी की पराजय में बसपा की मौजूदगी प्रमुख कारण था. इसके अलावा पोहरी, जौरा, अंबाह में बसपा के चलते भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी.
दलित सीटों पर बसपा का ग्राफ
दलित मतदाताओं का बाहुल्य होने के चलते बसपा ने 2018 में ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर निर्णायक वोट हासिल किए थे. इनमें अंबाह 22179, अशोकनगर 9559, करैरा 40026, ग्वालियर 4596, ग्वालियर पूर्व 5446, गोहद 15477, डबरा 13155, दिमनी 14458, पोहरी 52736, भांडेर 2634, मुंगावली 14202, मुरैना 21149, मेहगांव 7579, बमोरी 7176, सुमावली 31331 एवं जौरा में बसपा प्रत्याशी को 41014 वोट मिले थे.
कांग्रेस दलितों को साधने में कामयाब
दरअसल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद किया था. भारत बंद के दौरान ग्वालियर-चंबल इलाके में हिंसा भड़क गई थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी और काफी लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई थी. उस समय मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी, जिससे दलित समुदाय काफी नाराज था और चुनाव में उसका फायदा कांग्रेस को मिला था.
मध्य प्रदेश के 2018 विधानसभा में दलित की पहली पसंद कांग्रेस बनी थी. इसी के सहारे चंबल-ग्वालियर इलाके में बीजेपी का पूरी तरह सफाया हो गया था. ऐसे में कांग्रेस एक बार फिर हाथरस की बेटी के इंसाफ के लिए मौन धरना प्रर्दशन करके एमपी के दलित समुदाय के साथ खड़ी होना चाहती है ताकि उपचुनाव में सियासी जंग फतह कर सके. हालांकि, देखना होगा कि उपचुनाव में दलित समुदाय कांग्रेस और बीजेपी में से किस पर भरोसा जताता है.