बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को फिल्म "मैच फिक्सिंग-द नेशन एट स्टेक" की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार कर याचिका को खारिज कर दिया. यह फिल्म मालेगांव 2008 बम विस्फोट मामले पर आधारित है, लेकिन अदालत ने इसे एक काल्पनिक रचना मानते हुए फिल्म निर्माताओं को एक स्पष्ट डिस्क्लेमर लगाने का निर्देश दिया, जिसमें यह उल्लेख होगा कि यह एक काल्पनिक कहानी है.
न्यायमूर्ति बीपी कोलाबावाला और सोमशेखर सुंदरेसन की खंडपीठ ने मामले के आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया. पुरोहित ने अपनी याचिका में फिल्म रोक लगाने की मांग करते हुए तर्क दिया कि फिल्म उनकी छवि को प्रभावित कर सकती है और मामले पर असर डाल सकती है.
अदालत में पुरोहित की ओर से पेश हुए अधिवक्ता हरीश पंड्या और धृतिमान जोशी ने दावा किया कि फिल्म ने एक सेना अधिकारी के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है. उन्होंने फिल्म के ट्रेलर का हवाला दिया, जिसमें सच्चाई को उजागर करने की बात कही गई है.
'किताब पर आधारित है फिल्म'
फिल्म के निर्माताओं की ओर से वकीलों आदित्य अय्यर, अद्वैत हेलेकर और जयेश भोसले ने अदालत को बताया कि यह फिल्म एक फिक्शन रचना है जो एक किताब पर आधारित है और ये किताब पहले से ही बाजार में मौजूद है.
उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर लगाने का दावा किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाएगा कि यह कहानी काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है.
इसके बाद पीठ ने डिस्क्लेमर को देखने के लिए कहा और कुछ मामूली बदलावों का सुझाव दिया, ताकि इसे लंबे वक्त तक प्रदर्शित किया जा सके. निर्माताओं ने इसे स्वीकार किया और यहां तक कि एक ऑडियो डिस्क्लेमर जोड़ने का प्रस्ताव रखा, ताकि यह "म्यूचुअल फंड डिस्क्लेमर" की तरह न लगे.
'अभी-भी चल रहा है मामले का ट्रायल'
पुरोहित ने तर्क दिया था कि मामले का ट्रायल अभी-भी चल रहा है. इस पर अदालत ने सवाल किया कि क्या पुरोहित मानते हैं कि ऐसे फिल्मों से न्यायाधीश प्रभावित हो सकते हैं.
अदालत ने कहा, "क्या आप सच में कह रहे हैं कि भारतीय न्यायपालिका का कोई न्यायाधीश एक फिल्म देखकर प्रभावित हो जाएगा और सबूतों को भूल जाएगा? जब किताब पर प्रतिबंध नहीं है तो फिल्म पर क्यों लगाया जाए?"
पंड्या ने मांग की कि अदालत कम-से-कम महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद तक स्थगित करने की मांग की. उन्होंने कहा कि फिल्म में भगवा आतंकवाद को पेश किया गया है. हालांकि, अदालत ने सवाल किया कि फिल्म का चुनावों से क्या लेना-देना है. पीठ ने कहा, "कोई मौका नहीं. हम केवल चुनावों के कारण फिल्म निर्माताओं को नहीं रोकेंगे. चुनावों का इससे क्या लेना-देना है? किताब वर्षों से उपलब्ध है."
'गलतहफमी पर आधारित हैं याचिकाकर्ता की आशंका'
दलीलें सुनने के बाद पीठ ने कहा, "हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता की आशंका सही हैं. यह फिल्म एक काल्पनिक रचना पर आधारित है और ऐसे में यह मानने का कोई कारण नहीं है कि ट्रायल जो अंतिम बहस के चरण में है, प्रभावित होगा." अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ता की संपूर्ण आशंका गलतफहमी पर आधारित है. याचिका खारिज की जाती है."
एक याचिकाकर्ता ने वापस ली अपनी याचिका
वहीं, नदीम खान द्वारा दायर एक अन्य याचिका में दावा किया गया कि एक समुदाय की छवि को धूमिल किया जा रहा है, जिसे गुरुवार को वापस ले लिया गया.
29 सितंबर 2008 को मुंबई से लगभग 200 किमी दूर उत्तरी महाराष्ट्र के मालेगांव स्थित एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर बंधे एक विस्फोटक उपकरण के फटने से छह लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे.