बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने सेंट्रल रेलवे (सीआर) के महाप्रबंधक की एक याचिका खारिज कर दी. साथ ही आदेश दिए कि चलती ट्रेन पकड़ने की कोशिश के दौरान पहियों के नीचे आने वाली मृत महिला के परिवार को रेलवे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है. कोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल द्वारा 4 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश को भी दोगुना कर दिया है. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यात्रियों को ले जा रही ट्रेन से यात्री का दुर्घटनावश गिरना दुर्घटनाओं शामिल हैं. यानि जब एक यात्री वैध टिकट या पास के साथ ट्रेन में प्रवेश करने की कोशिश में के दौरान गिर जाता है, तो वह दुर्घटना ही कहलाएगी.
दरअसल, 12 फरवरी, 2006 को एक हादसा उस वक्त हुआ था जब दीपलक्ष्मी बंधे अपने पति के साथ वर्धा से नागपुर की अमरावती नागपुर पैसेंजर में सफर कर रही थीं. इसके लिए उन्होंने साधारण टिकट खरीदा था. दुर्भाग्यपूर्णजब ट्रेन पकड़ने के दौरान वह गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं. बाद में उनकी मौत हो गई. वर्धा में रेलवे पुलिस ने मामला भी दर्ज किया था.
मामला कोर्ट पहुंचा तो सेंट्रल रेलवे का प्रतिनिधित्व करने वाली अधिवक्ता नीरजा चौबे ने कहा कि मृतक दीपलक्ष्मी के पास ट्रेन में चढ़ने के लिए टिकट नहीं था, इसलिए, वह प्रामाणिक यात्री नहीं थी. बार-बार ट्रेन न पकड़ने की हिदायत देने के बावजूद वह ट्रेन पकड़ने की कोशिश कर रही थी. यह घटना उसकी लापरवाही के कारण हुई. इसलिए रेलवे मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है. रेलवे ने उन गवाहों को भी पेश किया जिन्होंने ट्रिब्यूनल के सामने बयान दिया था कि उन्होंने मृतक को चलती ट्रेन में नहीं चढ़ने के लिए कहा था, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया.
मृतक वास्तविक यात्री थी- पीड़ित परिवार
वहीं मृतक के परिवार ने दावा किया कि रेलवे मुआवजे देने के लिए उत्तरदायी है. परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे एडवोकेट पीएस मिराचे ने कहा कि केवल इसलिए कि शव से टिकट नहीं मिला, यह नहीं कहा जा सकता कि वह बिना टिकट यात्रा कर रही थी. संभावना है कि किसी अप्रिय घटना के दौरान टिकट गुम हो गया हो. इससे इंकार नहीं किया जा सकता है और इसलिए यह अनुमान लगाया जाना चाहिए कि मृतक वास्तविक यात्री थी.
मुआवजे से वंचित करने के लिए कई तर्क दिए जाएंगे- कोर्ट
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि "लाभदायक या कल्याणकारी कानूनों को एक उदार और शाब्दिक या सख्त व्याख्या नहीं दी जानी चाहिए." कोर्ट ने रेलवे अधिनियम में परिभाषित "अप्रिय घटना" की परिभाषा पर गौर किया और कहा कि शीर्ष अदालत ने भी कहा है कि बड़ी संख्या में रेल यात्रियों को रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजा से वंचित करने के लिए कई तरह के तर्क दिए जाएंगे.
'यह कोई आत्महत्या का मामला नहीं है'
कोर्ट ने आगे कहा, "यह सर्वविदित है कि हमारे देश में करोड़ों लोग हैं जो ट्रेनों से यात्रा करते हैं क्योंकि हर कोई हवाई या निजी कार से यात्रा करने का जोखिम नहीं उठा सकता है. हादसों को अलग-अलग अर्थ देकर रेल दुर्घटनाओं के पीड़ितों को रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजा पाने से रोका जा रहा है." पीठ ने कहा कि यह कोई आत्महत्या का मामला नहीं है, बल्कि महिला ट्रेन पकड़ने के दौरान वह घायल हुई थी.