महाराष्ट्र के सोलापुर में जुड़वा बहनों से शादी करने वाले युवक का मामला चर्चा में है. हिंदू मैरिज एक्ट में एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी नहीं की जा सकती, इसलिए युवक पर केस भी दर्ज हो चुका. हालांकि बार-बार ये बात भी उठ रही है कि जब शादी करने वाली युवतियों को एतराज नहीं था, तो केस बनना नहीं चाहिए. ये तो हुआ एक पति की कई पत्नियों वाला मामला, लेकिन इसका उलट भी होता है. ऐसे भी समुदाय हैं, जहां बहुपतित्व को बुरा नहीं माना जाता. यहां एक पत्नी कई पतियों के साथ एक ही घर में रहती है.
चीन में मच चुका है हंगामा
लगभग दो साल पहले चीन की फुडान यूनिवर्सिटी के इकनॉमिस्ट ये केंग एन्जी के एक बयान ने तहलका मचा दिया था. उन्होंने अपने यहां बहुपतित्व की वकालत करते हुए कहा कि यही अकेला रास्ता है, जिससे सभी चीनी युवकों की शादी हो सकेगी. बता दें कि सत्तर के दशक में वन-चाइल्ड-पॉलिसी लाने के बाद से चीन में लैंगिक भेदभाव बढ़ा. पेरेंट्स लड़कों की चाह में लड़कियों को मारने लगे.
इच्छा के बावजूद शादी नहीं हो पा रही
अब इतने दशक बाद इस नियम को हटाया तो गया, लेकिन काफी देर हो चुकी है. चीन में अब ज्यादातर आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. साथ ही वहां सेक्स रेश्यो भी गड़बड़ा चुका. लड़कियां कम हैं, लड़के ज्यादा. ऐसे में बहुत से चीनी युवक चाहकर भी अपने लिए पत्नी नहीं खोज पा रहे. इन्हीं मुश्किलों को देखते हुए वहां के अर्थशास्त्री ने बहुपतित्व की बात की, जिसमें तिब्बत का भी हवाला दिया.
तिब्बत में क्या है प्रथा
एक महिला के कई पतियों का जिक्र तिब्बत में मिलता रहा है. ये एक छोटा सा देश है, जो लंबे समय से चीन की मनमानी भी झेल रहा है. ऐसे में जीवन चलाने के लिए उनके पास ज्यादा साधन नहीं. ज्यादातर लोग यहां किसान हैं, जो जमीन के छोटे टुकड़े पर पूरा परिवार चलाते हैं. इन हालातों में अगर कई भाइयों वाले परिवार में सबकी शादियां हों, और बच्चे भी हों तो छोटी जमीन के कई हिस्से हो जाएंगे.
इसी मुश्किल के हल के तौर पर तिब्बती सोसायटी ने बहुपतित्व की प्रैक्टिस शुरू की
एक तर्क ये भी रहा कि एक पति अलग कमाने-खाने के लिए बाहर जाए तो घर की देखभाल उतनी ही जिम्मेदारी से दूसरा पति कर सके. यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का ने सत्तर के दशक से लेकर अब तक के कई मानवशास्त्रियों के हवाले से रिसर्च की और पाया कि अब फैमिली लॉ के आने के बाद से बहुपतित्व गैरकानूनी हो चुका है, लेकिन तिब्बती गांवों में अब भी ये जारी है.
ऐसे सुलझाई गईं रुटीन मुश्किलें
यहां पर सवाल आता है कि एक घर में कई पतियों के कारण क्या तनाव नहीं होता होगा, या फिर समय का बंटवारा कैसे होता है. इसका जवाब मेवलिन गोल्डस्टेन के लेख वेन ब्रदर्स शेयर ए वाइफ में मिलता है. अमेरिकी सोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट ने कई दशक तिब्बत में बिताए और उनके समाज को काफी पास से देखा. वे लिखते हैं कि तिब्बती समाज में आमतौर पर शादियां घर के बड़े तय करते हैं. इसके इर्दगिर्द यही बात होती है कि जमीन को लेकर भाइयों में झगड़ा न हो. इसका हल वे बहुपतित्व में देखते हैं.
शादी बहुत अनोखे ढंग से होती है
बीच में बड़ा भाई और होने वाली वधू बैठी होती है, जिनके अलग-बगल बाकी छोटे भाई रहते हैं. शादी की सारी रस्में बड़े भाई के साथ ही होती हैं. बाकी भाई एक तरह से गवाह की तरह होते हैं, लेकिन घर में वधू के आने के बाद वो सबकी पत्नी कहलाती है. ऐसे में ये भी होता है कि अगर भाइयों में से किसी एक की मौत हो जाए तो भी पत्नी अकेली नहीं छूटती है.
कब पत्नी के कमरे में जाना मना
बहुपतित्व के साथ कई नाजुक सवाल भी उठते हैं, जैसे समय का बंटवारा, या संतान के बारे में कैसे तय होता है कि वो किस पिता से है. इस बारे में उन समाजों में भी खूब सोच-समझकर कई बातें तय हुईं, जिसमें एक टोपी अहम भूमिका निभाती है. जब महिला किसी भी पुरुष से साथ होती है, तो कमरे के बाहर एक टोपी रख दी जाती है. ये संकेत है, जिसे बाकी लोग समझते हैं. जब तक कोई भी भाई भीतर रहेगा, दूसरे लोग कमरे में नहीं जाएंगे.
इसी तरह से इस शादी के जन्मी संतानों को सारे ही पिता अपनी संतान मानते हैं और कोई भेदभाव नहीं रखते. बच्चे के जैविक पिता के बारे में न कोई सामाजिक तौर पर पूछता है, न ही इसपर कोई इंक्वायरी जैसी बिठाई जा सकती है. नई पीढ़ी की संतानों में अगर पुरुष एक से ज्यादा हुए तो वापस यही प्रथा चल पड़ती है.
खुद यूनिवर्सिटी ने मानी बात
साठ के शुरुआती दशक में चीन की दखलंदाजी बढ़ने के साथ तिब्बत में नया कानून आया, जिसके मुताबिक बहुपतित्व गैरकानूनी है. हालांकि एंथ्रोपोलॉजिस्ट्स का मानना है कि गांवों में ये चीज आज भी चल रही है. साल 1988 में तिब्बत यूनिवर्सिटी ने लगभग हजार परिवारों पर स्टडी की और पाया कि शहरी इलाकों में भी 13 प्रतिशत लोग इसकी प्रैक्टिस कर रहे हैं.
तिब्बत अकेला नहीं, दुनिया के कई देशों में छिटपुट स्तर पर, या सीमित तबके में ही सही, बहुपतित्व को मान्यता है. जैसे केन्या में बीच में ऐसे कई मामले आए, जहां एक महिला ने कई पुरुषों से शादी की. मस्साई समुदाय में इसे गलत नहीं माना जाता और परिवार की एकजुटता से जोड़कर देखते हैं. दक्षिणी अमेरिका की तुपी-कवाहिब कम्युनिटी में भी ये दिखता रहा. कई और ट्राइब्स भी इस तरह के रिश्ते को सही या गलत नहीं मानते. यहां तक कि भारत के भी हिमाचल और दक्षिण के कई ट्राइब्स में ये प्रैक्टिस चलती रही. हालांकि अब ये चलन में नहीं, या फिर है भी तो इस बारे में खुलकर बात नहीं होती.