शिवसेना में विभाजन के बाद पार्टी के दोनों धड़ों उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच सियासी घमासान तो छाया ही है. साथ ही कानूनी दांव-पेंच का दौर भी चल रहा है. इस मामले में उद्धव गुट की ओर से सुप्रीम में कोर्ट में दायर याचिका के जवाब में शिंदे गुट ने हलफनामा दाखिल किया है. इसमें शिवसेना के विभाजन को लोकतांत्रिक बताते हुए उद्धव ठाकरे की अर्जी खारिज करने की मांग की गई है.
दरअसल उद्धव गुट ने अपनी अर्जी में सुप्रीम कोर्ट से 27 जून 2022 की स्थिति बहाल करने का आग्रह किया है. इस पर शिंदे गुट ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि उद्धव खेमे को ये राहत नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वो पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं. यानी ये याचिका एक ऐसे मुख्यमंत्री के समर्थकों ने डाली है, जिसने सदन और पार्टी में ही विश्वास खो दिया है.
पार्टी का विभाजन लोकतांत्रिक
शिंदे गुट ने शिवसेना के विभाजन को लोकतांत्रिक करार दिया है. उसने कोर्ट में दलील दी है कि लोकतांत्रिक तरीके से हुए पार्टी विभाजन के मुद्दे पर कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. इस बाबत उचित निकाय यानी कि निर्वाचन आयोग भी कार्यवाही कर रहा है. संसदीय लोकतंत्र किसी भी कार्रवाई की वैधता/अवैधता का परीक्षण करने के लिए पार्टी का वो गुट कोर्ट पर दबाव नहीं बना सकता है जिसने खुद सदन और पार्टी में बहुमत खो दिया हो. इससे पता चलता है की उद्धव गुट लोकतांत्रिक फैसलों को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है.
सरकार को अस्थिर करने की कोशिश
शिंदे गुट की ओर से कहा गया है कि एक लोकतांत्रिक पार्टी के सदस्यों ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से फैसला किया है. लेकिन अब इस लोकतांत्रिक निर्णयों को चुनौती देने का प्रयास ठाकरे गुट कर रहा है. ये अलोकतांत्रिक, गैरकानूनी और असंवैधानिक है. दरअसल उद्धव गुट इस बहुमत की सरकार को अस्थिर करना चाहता है इसीलिए ये याचिका दाखिल की गई है. सुप्रीम कोर्ट अब इस मसले पर 3 अगस्त को सुनवाई करेगा.