बांध में पानी नहीं है, तालाब और कुएं सूख चुके हैं, ग्रामीण नए कुएं खोदने को मजबूर हैं और पानी के लिए सभी अब किस्मत के भरोसे हैं. यह हाल है महाराष्ट्र के जालना जिले का, जहां खेती तो दूर पीने के लिए भी पानी का संकट खड़ा हो गया है. जालना को लोग 'मौसंबियों के शहर' के रूप में भी जानते हैं.
यहां मौसंबी का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है लेकिन पानी की कमी के चलते कई किसान अब अपने मौसंबी के पेड़ों को काटने के लिए मजबूर हैं. जालना का सबसे बड़ा बांध घाणेवाड़ी पूरी तरह सूख गया है. अब यहां के लोगों के लिए पैठण के जायकवाड़ी बांध से पानी लाया जा रहा है. लोग पूरी तरह से पानी के जार और टैंकरों पर निर्भर हैं.
तालाब और दोनों कुएं सूखे
जालना का वाडेकर परिवार मौसंबी और नींबू उगाता है. परिवार में पिता और पुत्र दोनों किसान हैं. अंकुश वाडेकर और अनिल वाडेकर दोनों पिता-पुत्र के पास जनवाड़ी गांव में लगभग 5 एकड़ जमीन है. वे मुख्य रूप से मौसंबी और नींबू की खेती करते हैं. मौसंबी और नींबू के अलावा वे सोयाबीन और कपास भी उगाते हैं. वाडेकर परिवार के पास अपने खेत में एक स्व-निर्मित तालाब है जिसकी क्षमता 16 लाख लीटर पानी की है. उनके खेत में दो कुएं भी हैं. इस साल के सूखे में उनका तालाब और दोनों कुएं सूख गए हैं.
मौसंबी के पेड़ों को अच्छे आकार का फल देने में करीब पांच साल का समय लगता है. इसके लिए इसे प्रचुर मात्रा में पानी की जरूरत होती है. वाडेकर ने कहा कि इस साल नींबू से उन्हें काफी अच्छी कमाई की उम्मीद थी. नींबू के लिए इस साल का रेट करीब 100 से 150 रुपए प्रति किलो था लेकिन उनके पास इस साल पानी ही नहीं है.
वाडेकर परिवार को काटने पड़े मौसंबी के पेड़
वाडेकर परिवार ने कई प्रयास किए. उन्होंने अपने खेत में एक नया कुआं खोदा. इसमें अच्छे खासे पैसे भी खर्च हुए. लेकिन 50 फीट की खुदाई के बाद भी उन्हें पानी का कोई निशान नहीं मिला. उन्होंने वॉटर टैंकर पर भी काफी पैसा बहाया लेकिन ये सब काफी नहीं था. पानी की कमी के चलते पेड़ पर लगे नींबू सूखकर गिर गए और मौसंबी के पेड़ भी सूख गए. अब वाडेकर परिवार ने मौसंबी के पेड़ काट दिए हैं और अब उस जगह पर कपास उगा रहे हैं.
कुछ ही दिनों में बर्बाद हो गई पांच साल की मेहनत
इसी तरह जालना के एक और किसान बिबिशन धिरदे अंगूर, नींबू और मौसंबी उगाते हैं. पांच साल पहले उन्होंने मौसंबी के पड़े लगाए थे. पाचं साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें इस साल दिवाली पर अच्छे रिटर्न की उम्मीद थी. जैसे ही पेड़ों पर फल आने वाले थे बिबिशन के पास पानी खत्म हो गया.
उनके लिए टैंकर का पानी पर्याप्त नहीं था और उनकी पांच साल की मेहनत कुछ ही दिनों में बर्बाद हो गई. बिबिशन का कहना है कि अभी भी उन्हें सूखे पेड़ों को हटाने के लिए जेसीबी पर काफी पैसे खर्च करने पड़ेंगे. फिलहाल वह 15 लाख के नुकसान में हैं.