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'मैं तो मृत्युदंड देता, लेकिन अपराध...,' बिलकिस के सभी 11 दोषियों को मुंबई की कोर्ट में सजा सुनाने वाले जज ने बताई पूरी कहानी

गुजरात की बिलकिस बानो को एक बार फिर कोर्ट से न्याय मिला है. दो साल से खुली हवा में घूम रहे दोषी एक बार फिर जेल की सलाखों में होंगे. 2002 में बिलकिस के साथ गैंगरेप हुआ और परिवार के सात सदस्यों की हत्या हुई. 6 साल बाद 2008 में सभी 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा मिली. 14 साल बाद यानी 2022 में सभी 11 दोषियों की सजा को माफ कर दिया गया था. दो साल सभी दोषी फिर जेल में होंगे.

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बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई को रद्द कर दिया गया है.
बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई को रद्द कर दिया गया है.

बिलकिस बानो केस एक बार फिर चर्चा में है. सुप्रीम कोर्ट ने गैंगरेप और हत्या के सभी 11 दोषियों की सजा माफी को रद्द कर दिया है. 16 साल पहले मुंबई की विशेष कोर्ट के जज यूडी साल्वी ने दरिंदगी करने वाले 11 लोगों को सजा सुनाई थी, उनसे आजतक ने बातचीत की है. साल्वी ने कहा, सजा में छूट देते समय अपराध की गंभीरता पर विचार किया जाना चाहिए था. उन्होंने यह भी कहा कि मैं इन दोषियों को मृत्युदंड की सजा देता, लेकिन यह अपराध उकसाने की वजह से होना पाया गया था.

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बता दें कि गुजरात के बिलकिस बानो केस के गुनहगारों को फिर जेल भेजा जाएगा. सभी 11 दोषियों को दो हफ्ते के अंदर सरेंडर करना होगा. 21 जनवरी 2008 को मुंबई में जज छूट देते समय यूडी साल्वी ने बिलकिस बानो के परिवार की हत्या और बलात्कार के दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. हालांकि, 14 साल बाद अगस्त 2022 में गुजरात सरकार ने माफी नीति के तहत इन लोगों को रिहा कर दिया था. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने ना सिर्फ दोषियों की रिहाई रद्द की, बल्कि गुजरात सरकार को भी फटकार लगाई है और इसे धोखाधड़ी वाला कृत्य बताया है. SC ने कहा, दोषी और गुजरात सरकार ने तथ्य छिपाए हैं. गुजरात सरकार ने यह नहीं बताया कि सजा माफी का अधिकार उसका नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र सरकार है. क्योंकि घटना भले गुजरात की है, लेकिन केस में ट्रायल से लेकर सजा तक महाराष्ट्र में सुनाई गई है. ऐसे में यह अधिकार महाराष्ट्र सरकार का है.

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'बिलकिस से गैंगरेप हुआ, तब गर्भवती थी'

अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या दोषी सजा माफी के लिए महाराष्ट्र सरकार से संपर्क करेंगे. सजा में छूट के बारे में पूछे जाने पर रिटायर जज यूडी साल्वी ने कहा, अपराध की गंभीरता महत्वपूर्ण है. पॉलिसी सिर्फ गाइडेंस के लिए है. बताते चलें कि रिटायर जस्टिस यूडी साल्वी ने ही साल 2008 में बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में 11 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. साल 2002 में गुजरात के गोधरा में दंगे भड़कने के बाद बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप हुआ था. तब वो पांच महीने की गर्भवती थी. उसके परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी गई थी.

'क्या पुरानी पॉलिसी से छूट देगी महाराष्ट्र सरकार?'

एक वरिष्ठ वकील कहते हैं, 2010 में महाराष्ट्र सरकार ने विभिन्न अपराधों के तहत छूट को वर्गीकृत किया था. गैंगरेप और हत्या जैसे गंभीर अपराधों के तहत सजा में छूट को प्रतिबंधित कर दिया गया है. अब सोमवार के फैसले के बाद यह सवाल बना हुआ है कि क्या अपराधियों को अपराध होने पर पहले की पॉलिसी के आधार पर छूट मिल सकती है.

'3-4 महीने में स्थिति स्पष्ट होगी'

वरिष्ठ वकील उदय वारुंजिकर ने कहा, अगर महाराष्ट्र में बिलकिस बानो मामले के दोषियों द्वारा सजा में छूट का आवेदन दिया जाता है तो नई पॉलिसी लागू होगी. मौजूदा नीति तब लागू होगी जब मुकदमे में छूट की मांग की जाएगी. यदि आप छूट नहीं देना चाहते हैं तो कोई मसला ही नहीं है. यदि राज्य छूट का रास्ता खोलता है तो इसे कैसे उचित ठहराया जाए, इस पर सवाल होंगे. इस मामले में गुजरात से मुंबई मुकदमा ट्रांसफर कर दिया गया था. भारतीय न्याय संहिता के तहत नए बिल पारित हो गए हैं, इसके लागू होने से राज्य की छूट नीतियों में बदलाव हो सकता है. आने वाले 3-4 महीनों में ये चीजें साफ हो जाएंगी.

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'फैसले पर विचार करने के पक्षधर थे साल्वी'

रिटायर जस्टिस यूडी साल्वी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उत्साहजनक है. कोर्ट ने क्षेत्राधिकार पर छूट को खारिज कर दिया है जो सही है. 2022 में जब इन दोषियों को सजा में छूट दी गई तो साल्वी की राय थी कि इस फैसले पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए.

'व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण अपराध होता तो फांसी देता'

उन्होंने आगे कहा, इन दोषियों पर मुंबई में मुकदमा चलाया गया. विस्तृत आदेश में और भी टिप्पणियां होंगी. जब मैं इस मामले में फैसला दे रहा था तो मैं उन्हें (दोषी) मृत्युदंड दे देता. लेकिन यह अपराध व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण नहीं, बल्कि उकसाया गया था. ये लोग माध्यम थे, जिनके जरिए अपराध हुआ था. इसलिए मैंने आजीवन कारावास दिया. इसी तरह छूट देते समय अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखा जाना चाहिए. पॉलिसी सिर्फ मार्गदर्शन करती हैं, लेकिन छूट देते समय समाज को संदेश देने के बारे में भी सोचना चाहिए. सजा माफी पर रिहा होने के बाद उनका जो स्वागत हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण था.

'7 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी किया था'

गौरतलब है कि 21 जनवरी 2008 को स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. स्पेशल कोर्ट ने 7 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. जबकि एक दोषी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई थी. बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी दोषियों की सजा को बरकरार रखा था.

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