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चाचा शरद से सीखी सियासत, फिर 40 साल की वफादारी क्यों भुला बैठे अजित पवार?

राजनीति में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता. क्योंकि महाराष्ट्र में जो सियासी उठापटक हुई है, वह इसी ओर संकेत करती है. अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से सियासत का ककहरा सीखा और उन्हीं को चकमा दे दिया. लेकिन ऐसी क्या वजह रही, जिसके चलते अजित ने अपने ही चाचा से अदावत कर दी.

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अजित पवार ने चाचा शरद पवार से बगावत कर डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली है
अजित पवार ने चाचा शरद पवार से बगावत कर डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली है

महाराष्ट्र में सियासत की नई तस्वीर उभरकर सामने आ गई है. इसकी वजह हैं अजित पवार, जिन्होंने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली. उन्होंने दावा किया पार्टी के 40 विधायक उनके साथ हैं. इस घटनाक्रम के बाद आज अजित और शरद पवार गुट ने पार्टी के नेताओं की मीटिंग बुलाई, इसमें अजित ने शरद पवार पर निशाना साधते हुए कहा कि पवार साहब... आप 83 साल के हो गए हैं, आप कभी रुकेंगे कि नहीं...? मतलब साफ है इस मीटिंग में अजित ने शरद पवार पर जमकर निशाना साधा. लेकिन सवाल ये है कि जिस भतीजे (अजित) को चाचा शरद ने राजनीति का ककहरा सिखाया, उन्हीं अजित ने अपने चाचा से अदावत क्यों की? इसे सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं.

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सुप्रिया सुले की एंट्री की वजह से अजित को किया आउट!

इसी साल जून का महीना था... महाराष्ट्र में मौसम की गर्मी के साथ ही सियासी पारा भी हाई था. वजह थी NCP चीफ शरद पवार ने पार्टी के 25वें स्थापना दिवस पर बड़ी घोषणा की. उन्होंने पार्टी की कमान सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल के हाथों में सौंप दी. इन दो नामों का ऐलान जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही चौंकाने वाला भी. क्योंकि शरद पवार के बाद नंबर 2 और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजित पवार का कहीं नाम नहीं था. शरद के इस फैसले से साफ जाहिर था कि उन्होंने ये फैसला सुप्रिया सुले की राजनीति में एंट्री के लिए किया था. कयास यही लगाए जाते थे कि शरद पवार के बाद अजित ही पार्टी में 2 नंबर की भूमिका में हैं. लेकिन शरद पवार ने उन्हें बड़ी बारीकी से किनारे लगा दिया था. इसके बाद खबरें सामने आईं कि अजित इस फैसले से नाराज थे, उन्होंने मुंबई में एक कार्यक्रम में कहा था कि मुझे विपक्ष के नेता के रूप में काम करने में कभी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन पार्टी विधायकों की मांग पर मैंने भूमिका स्वीकार की. अब मुझे जो भी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, मैं उसके साथ पूरा न्याय करूंगा. अजित ने कहा कि मुझे बताया गया है कि मैं विपक्ष के नेता के रूप में सख्त व्यवहार नहीं करता हूं.

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- NCP में अजित को कोई बड़ी जिम्मेदारी न मिलने का असर ये भी देखा गया कि हाल ही में दिल्ली में हुई एनसीपी की नेशनल एग्जीक्यूटिव मीटिंग के पोस्टर से अजित पवार की तस्वीर गायब थी. पोस्टर में शरद पवार के साथ सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल की फोटो लगाई गई थी. 

कई बार सामने आई अजित की नाराजगी

अजित की नाराजगी उनके बयानों से झलकने लगी थी. हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जमकर तारीफ की थी. उन्होंने जलगांव में कहा था कि मोदी साहब के काम की वजह से ही देश में बीजेपी आई है. मोदीजी के कारण ही कई राज्यों में बीजेपी है, जबकि वाजपेयी साहब के समय में भी उन्हें पूरा बहुमत नहीं मिला था. मोदीजी के पास करिश्मा है. करिश्मा जैसे एक समय में इंदिराजी के पास था, नेहरू का था, उसी तरह आज मोदीजी का जलवा है. जबकि पुणे में उन्होंने कहा था कि जो काम अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता नहीं कर सके, वह काम नरेंद्र मोदी ने कर दिखाया. मतलब साफ है, शरद पवार के फैसले के बाद अजित की ओर से एनसीपी से बगावत और बीजेपी से नजदीकी की पटकथा लिखी जाने लगी थी.

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- साल 2019 में जब अजित ने रातों-रात बड़ा सियासी उलटफेर करते हुए सुबह के वक्त देंवेंद्र फडणवीस सरकार में डिप्टी सीएम पद की शपथ ली, हालांकि ये सरकार महज 80 घंटे ही चल सकी थी, हालांकि आज से चार साल पहले भी अजित ने ये फैसला शरद से नाराजगी के बाद लिया था. 

- अजित की नाराजगी आज उस वक्त खुलकर सामने आई, जब उन्होंने कहा कि 1999 में पवार साहब ने कहा था कि सोनिया गांधी विदेशी हैं. वह हमारी पीएम नहीं हो सकतीं. हमने पवार साहब की बात सुनी. इसके बाद हुए चुनाव में हमने महाराष्ट्र में जमकर प्रचार किया, हमने 75 सीटें जीतीं. सभी को महत्वपूर्ण विभाग मिले, लेकिन मुझे कृष्णा खोरे महामंडल मिला, जो 6 जिलों तक सीमित था. लेकिन मैंने लगातार काम किया. शासन-प्रशासन पर मेरी पकड़ है.

भतीजे की बगावत के बाद क्या बोले चाचा?
 

- भतीजे की बगावत के बाद 82 साल के चाचा शरद पवार ने कहा कि जो लोग बीजेपी के साथ गए उनका इतिहास याद करना चाहिए. पंजाब में अकाली दल अब बीजेपी के साथ नहीं है. बिहार, आंध्र प्रदेश में बीजेपी सरकार से बाहर हुई. उसका गठबंधन टूटा. जो भी बीजेपी के साथ गया बाद में वह बाहर हो गया. बीजेपी गठबंधन वाली पार्टी को बर्बाद कर देती है. शरद ने आगे कहा कि नागालैंड का उदाहरण महाराष्ट्र में देना ठीक नहीं है. क्योंकि वहां सीमाई राज्यों में स्थिरता के लिए NCP बीजेपी के साथ गई. 

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- पवार ने कहा कि वह पहले भी ऐसी बगावत देख चुके हैं, और वह फिर से पार्टी खड़ी करके दिखाएंगे. उन्होंने कहा कि अगले कुछ दिनों में लोगों को पता चल जाएगा कि इन एनसीपी नेताओं ने हाथ क्यों मिलाया है. जो लोग शामिल हुए हैं उन्होंने मुझसे संपर्क किया है और कहा है कि उन्हें बीजेपी ने आमंत्रित किया है. लेकिन उन्होंने कहा कि उनका रुख अलग है.

- शरद पवार ने कहा कि मुझे इस तरह की स्थिति के बारे में पता नहीं है. 1980 में भी ऐसा ही हुआ था. 5 को छोड़कर सभी ने मुझे छोड़ दिया था, मैंने फिर से शुरुआत की. बाद में चुनावों के दौरान जिन लोगों ने मुझे छोड़ा उनमें से ज्यादातर हार गए. मुझे लोगों पर विश्वास है और मैं हूं मुझे और भी मजबूती से वापस आने का विश्वास है. उन्होंने कहा कि अब मैं एक नई और ऊर्जावान टीम बनाऊंगा, जो सच्चे मन से महाराष्ट्र की भलाई और उत्थान के लिए काम करेंगे.  

अजित की राजनीति में एंट्री फिर चाचा के लिए छोड़ दी थी सीट

अजित ने साल 1982 में राजनीति में कदम रखा. वह अपने चाचा के नक्शेकदम पर ही चले. उन्होंने एक सहकारी चीनी संस्था के बोर्ड के लिए चुनाव लड़ा और जीते. इसके बाद 1991 में अजित पुणे जिला सहकारी बैंक (PDC) के अध्यक्ष के रूप में चुने गए और 16 साल तक इस पद पर रहे. इस दौरान उन्होंने बारामती लोकसभा सीट से इलेक्शन लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के लिए अपनी लोकसभा सीट छोड़ दी थी. साल 1991 में अजित पवार की महाराष्ट्र विधानसभा में एंट्री हुई. वह सुधाकरराव नाइक की सरकार (जून 1991-नवंबर 1992) में कृषि और बिजली राज्य मंत्री रहे. जब शरद पवार मुख्यमंत्री के रूप में राज्य में लौटे, तो अजित मृदा संरक्षण, बिजली और योजना राज्य मंत्री (नवंबर 1992-फरवरी 1993) रहे. अजित पवार साल 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 में बारामती सीट से फिर से चुने गए. 2004 में जब कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सत्ता में लौटा, तो उन्होंने देशमुख सरकार में और बाद में अशोक चव्हाण सरकार में जल संसाधन मंत्रालय का जिम्मा संभाला. 

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