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बीएमसी चुनाव में कांग्रेस क्यों अपनी सहयोगी शिवसेना से अलग लड़ना चाहती है चुनाव?

मुंबई कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष भाई जगताप ने गुरुवार को एक बार फिर कहा कि कांग्रेस बीएमसी के चुनाव में सभी 227 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है और वो अकेले चुनावी किस्मत आजमाएगी. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस बीएमसी चुनाव में शिवसेना से अलग चुनावी ताल ठोकने की तैयारी में है? 

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उद्धव ठाकरे, सोनिया गांधी, आदित्य ठाकरे
उद्धव ठाकरे, सोनिया गांधी, आदित्य ठाकरे
स्टोरी हाइलाइट्स
  • साल 2022 में बीएमसी के चुनाव होने हैं
  • मुंबई में कांग्रेस का अपना सियासी आधार रहा है
  • बीएमसी चुनाव में शिवसेना बनाम बीजेपी न हो जाए जंग

मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2022 में भले ही अभी एक साल से ज्यादा समय बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से ही सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज शिवसेना मुंबई पर काबिज गुजरातियों को साधने की कवायद की कर रही है तो उसकी सहयोगी कांग्रेस अकेले बीएमसी चुनाव में उतरने की तैयारी में है. मुंबई कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष भाई जगताप ने गुरुवार को एक बार फिर कहा कि कांग्रेस बीएमसी के चुनाव में सभी 227 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है और वो अकेले चुनावी किस्मत आजमाएगी. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस बीएमसी चुनाव में शिवसेना से अलग चुनावी ताल ठोकने की तैयारी में है? 

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बता दें कि 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद ऐसा सियासी घटनाक्रम हुआ कि मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना और बीजेपी के बीच 25 साल की दोस्ती राजनीतिक दुश्मनी में तब्दील हो गई. शिवसेना ने बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए का नाता तोड़कर अपने वैचारिक विरोधी एनसीपी और कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया. उद्धव ठाकरे सूबे के सीएम बने और कांग्रेस और एनसीपी को सत्ता में भागीदारी मिली.  

उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महा विकास अघाड़ी सरकार को एक साल पूरा हो गया है और हाल ही में तीन दलों ने मिलकर एमएलसी का चुनाव लड़ा था और बीजेपी को करारी मात देने में सफल रहे थे. इसके बावजूद मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष ही नहीं बल्कि बड़े नेता भी बीएमसी का चुनाव अकेले लड़ने के पक्ष में हैं. कांग्रेस ऐसे ही बीएमसी चुनाव अकेले नहीं लड़ना चाहती है बल्कि इसके पीछे उसके अपने सियासी कारण हैं. 

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सीट बंटवारे में मुश्किल होगी 
बीएमसी चुनाव में अगर महा विकास अघाडी के तीनों दल इस बात पर राजी होते हैं कि वे मिलकर बीएमसी का चुनाव लड़ेंगे तो निश्चित रूप से सीटों के बंटवारे में बहुत मुश्किल पेश आएगी और तीनों ही दलों में बगावत होनी तय है. एनसीपी के लिए भले ही कोई दिक्कत न हो, लेकिन कांग्रेस के लिए काफी मुश्किल होगी. 227 सीटों वाली बीएमसी में सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को अपेक्षा के मुताबिक सीटें नहीं मिल पाएगी. ऐसे बहुत सारे नेता टिकट पाने से वंचित रह जाएंगे जो 2017 के बीएमसी चुनावों में अपने दलों की ओर से चुनाव लड़ चुके हैं. 

मुंबई में कांग्रेस का सियासी आधार 
मुंबई में कांग्रेस का अपना राजनीतिक जनाधार रहा है. बीएमसी पर भी उसके अपना कब्जा रहा है. 2004 और 2009 के  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अच्छे खासे विधायक मुंबई से जीतकर आए थे. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि शिवसेना के साथ मिलकर लड़ने पर उसका अपना सियासी आधार खिसक सकता है. ऐसे में कांग्रेस बीएमसी चुनाव में अकेले उतरकर मुंबई में अपने परंपरागत वोट बैंक को सुरक्षित रखना चाहती है. 

मुंबई में मुस्लिम, दक्षिण भारतीय, राजस्थानी और उत्तर भारतीयों को कांग्रेस का मजबूत वोटबैंक माना जाता है. इनमें उत्तर भारतीय वोट का बड़ा हिस्सा भले ही बीजेपी के साथ चला गया हो, लेकिन अभी भी उसके अपना राजनीतिक आधार बचा हुआ है. इसके अलावा गैर मराठी वोट जो मुंबई में है, उसे कांग्रेस अपने साथ हर हाल में जोड़कर रखना चाहती है. इसीलिए कांग्रेस बीएमसी चुनाव में शिवसेना से अलग चुनाव लड़ने की राह तलाश रही है.

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बीजेपी बनाम शिवसेना न बन जाए लड़ाई
बीएमसी पर शिवसेना का एकक्षत्र राज कायम है जबकि 1995 तक कांग्रेस अपना मेयर बनाती रही है. बीएमसी 1996 से शिवसेना का गढ़ बन चुका है, लेकिन बीजेपी उससे यह राज हर हाल में छीनने के लिए कमर कस चुकी है. 2017 के बीएमसी चुनाव में बीजेपी और शिवसेना अलग-अलग लड़ी थी. बीजेपी ने 82 सीटों पर कब्जा कर लिया था और उसे शिवसेना से सिर्फ 2 ही सीटें कम मिली थीं. इस बार बीजेपी बीएमसी चुनाव पूरे दमखम के साथ लड़ने की तैयारी कर रही है. यही वजह है कि मुंबई कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि उनकी पार्टी अगर शिवसेना अलग से चुनाव लड़ेगी तो बीजेपी को खुद को एकमात्र विपक्ष के तौर पर पेश करने में दिक्कत होगी. इस तरह से सत्ता विरोधी वोट का बंटवारा होगा, जिसका फायदा कांग्रेस को भी मिलेगा. 

कांग्रेस के सामने सियासी वजूद बचाने का संकट
बीएमसी चुनाव फरवरी 2022 में होने हैं और स्थानीय कांग्रेस नेताओं को यह डर सता रहा है कि शिवसेना और बीजेपी में जिस तरह से वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी हुई है, कांग्रेस ने अपना कोई स्टैंड नहीं लिया तो इस लड़ाई से वो पूरी तरह बाहर हो सकती है. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि उसे मुंबई में अपने सियासी वजूद को बचाए रखने के लिए शिवसेना से अलग किस्मत आजमानी चाहिए. इसी बात को ध्यान रखते हुए कांग्रेस ने पिछले महीने ही एक साल से खाली चल रहे मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति की है.

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मुंबई कांग्रेस की कमान भाई जगताप को सौंपी गई है जबकि कार्यकारी अध्यक्ष चरणजीत सिंह सप्रा को बनाया गया है. इसके अलावा कांग्रेस ने नसीम खान, अमरजीत सिंह मन्हास, सुरेश शेट्टी को एक एक कमेटी का चेयरमैन बना कर अपने पुराने वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश की है. यही वजह है कि कांग्रेस बीएमसी के सभी 227 वार्डों के लिए चुनाव की तैयारी में है. विधायक भाई जगताप ने कहा कि जो लोग पार्टी छोड़ कर चले गए हैं, उन्हें फिर पार्टी में वापस लाने का प्रयास किया जाएगा. 

 

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