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महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में जल संकट... 21 गांवों में टैंकरों से पहुंचाया जा रहा पानी, 70 कुओं का किया अधिग्रहण

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके में भीषण जल संकट है. कई गांवों में पीने के पानी की किल्लत हो गई है. हालात इतने गंभीर हैं कि सरकार को 70 निजी कुओं का अधिग्रहण करना पड़ा है. 21 गांवों में टैंकरों के जरिए जल आपूर्ति की जा रही है. छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़ और हिंगोली जिलों के 62 गांव प्रभावित हुए हैं. बढ़ती गर्मी और सूखते जल स्रोतों के कारण हालात और बिगड़ सकते हैं.

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मराठवाड़ा के 21 गांवों में टैंकरों से भेजा जा रहा पानी. (Photo: AI)
मराठवाड़ा के 21 गांवों में टैंकरों से भेजा जा रहा पानी. (Photo: AI)

गर्मियों की तपिश के साथ ही महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में पानी की किल्लत गहराने लगी है. हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि सरकार को पीने के पानी की आपूर्ति के लिए 70 निजी कुओं का अधिग्रहण करना पड़ा है. प्रशासन के अनुसार, मराठवाड़ा के तीन जिलों में कुल 62 गांवों को पेयजल संकट से राहत देने के लिए यह कदम उठाया गया है.

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एजेंसी के मुताबिक, वर्तमान में 21 गांवों और तीन बस्तियों में पानी की आपूर्ति टैंकरों के माध्यम से की जा रही है. इन प्रभावित इलाकों में कुल 19 टैंकरों की तैनाती की गई है, जिनमें से 17 छत्रपति संभाजीनगर जिले में और 2 नांदेड़ जिले में पानी पहुंचा रहे हैं.

मराठवाड़ा के जिन जिलों में पानी की कमी सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है, उनमें छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़ और हिंगोली शामिल हैं. प्रशासन ने छत्रपति संभाजीनगर जिले में 34, हिंगोली में 15 और नांदेड़ में 21 निजी कुओं का अधिग्रहण किया है, ताकि स्थानीय लोगों को पीने के पानी की पर्याप्त आपूर्ति की जा सके.

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हर साल गर्मी के मौसम में मराठवाड़ा क्षेत्र में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है. पानी के स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे गांवों में जल संकट खड़ा हो जाता है. इस साल भी जल संकट को देखते हुए प्रशासन पहले से सतर्क हो गया है और प्रभावित गांवों में टैंकरों की मदद से पानी पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

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इस गंभीर स्थिति के मद्देनजर, महाराष्ट्र सरकार अन्य संभावित जल स्रोतों की भी पहचान कर रही है, ताकि आने वाले दिनों में पानी की समस्या से न जूझना पड़े. इसके अलावा, जल संरक्षण योजनाओं पर भी तेजी से काम किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते जल संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है.

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