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Navneet Rana: शिवसेना के गढ़ अमरावती में नवनीत राणा ने ऐसे बनाया वर्चस्व, शिवसैनिकों से पुराना है पंगा

Navneet Rana: नवनीत राणा की शिवसेना से जंग कोई आज की नहीं है. ये जंग साल 2014 में ही शुरू हो गई थी. बाद में लोकसभा में बड़ा बवाल हुआ और फिर आखिर में हनुमान चालीसा की वजह से तकरार अपने पीक पर पहुंच गया.

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निर्दलीय सांसद नवनीत राणा
निर्दलीय सांसद नवनीत राणा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2019 में 36 हजार वोटों से जीती थीं नवनीत
  • शिवसेना नेता अरविंद सावंत पर लगाया था आरोप
  • कोरोना काल में की थी मोदी सरकार की तारीफ

महाराष्ट्र की राजनीति में हनुमान चालीसा पाठ और नवनीत राणा के एक ऐलान ने जबरदस्त बवाल खड़ा कर दिया है. अभी निर्दलीय सासंद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा जेल में हैं और कोर्ट में उनके मामले को लेकर सुनवाई होनी है. लेकिन ना ही नवनीत राणा इस मामले में झुकने को तैयार हैं और ना ही शिवसेना अपने तेवर नरम कर रही है. दोनों के बीच ये तनातनी नई नहीं है, ये अदावत पुरानी है.

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2014 में शिवसेना से छिड़ी जंग

वैसे तो नवनीत राणा ने सक्रिय राजनीति में कदम 2014 में रखा था, लेकिन 2011 में शादी के बाद से ही वे अपने पति रवि राणा के लिए चुनावी प्रचार करने लगी थीं. मॉडलिंग-एक्टिंग कर चुकी थीं, लोकप्रिय चेहरा थीं, हर कोई जानता था, ऐसे में लोगों का भी उनसे मजबूत कनेक्ट रहा और प्रचार के दौरान उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल भी किया. इसी लोकप्रियता को भुनाने के लिए नवनीत राणा ने साल 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ा. तब एनसीपी के टिकट पर वे अमरावती से उम्मीदवार बन गईं.

शिवसेना उम्मीदवार से मुकाबला, पहली हार

अमरावती वही सीट थी जहां पर शिवसेना का डंका बजता था. ऐसा डंका कि 25 सालों तक कोई दूसरी पार्टी या उम्मीदवार अपनी जगह नहीं बना सका. फिर बारी आई 2014 के चुनाव की. इस चुनाव में नवनीत राणा की राजनीतिक पारी एक हार से शुरू हुई. वे तब शिवसेना के उम्मीदवार आनंदराव अडसूल से हार गई थीं. 

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इस हार के बावजूद नवनीत ने खुद को अमरावती क्षेत्र में सक्रिय रखा. उनके धुर प्रतिद्वंदी भी आनंदराव अडसूल ही रहे. इसी वजह से ज्यादातर मौकों पर उनकी शिवसेना से तनातनी देखने को मिलती रही.

नवनीत का वो कमाल जिसने बढ़ा दी राजनीतिक तकरार

2014 की हार के बाद नवनीत राणा ने सक्रिय राजनीति से दूरी नहीं बनाई. उन्हें इस बात का अहसास था कि अगर जमीन पर काम किया जाए, तो शिवसेना के इस अभेद किले को ढहाया जा सकता. अपनी इसी थ्योरी पर आगे बढ़ते हुए नवनीत राणा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर अमरावती से चुनाव लड़ा. फिर उनका मुकाबला शिवसेना के आनंदराव अडसूल से हुआ. बताया जाता है कि इस चुनाव से पहले एनसीपी ने उन्हें अपने टिकट से लड़ने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन इस बार नवनीत ने निर्दलीय उतरने का फैसला किया. नतीजा ये हुआ कि 2019 के चुनाव में शिवसेना का ये मजबूत गढ़ टूट गया और नवनीत राणा ने राजनीति की अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की. तब 36 हजार से ज्यादा वोटों से उन्होंने शिवसेना के कद्दावर नेता को हराया.

फर्जी जाति प्रमाणपत्र वाला विवाद, बढ़ती जंग

उस जीत के बाद शिवसेना की तरफ से ही नवनीत पर सबसे बड़ा आरोप लगाया गया. ये आरोप था फर्जी जाति प्रमाणपत्र को लेकर. शिवसेना के ही पूर्व सांसद आनंदराव अडसूल ने आरोप लगाया कि नवनीत राणा मोची जाति से नहीं आती हैं और सिर्फ अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र लेने के लिए उन्होंने ये झूठ बोला. उस समय शिवसेना नेता को अपने आरोपों पर इतना भरोसा था कि उन्होंने सीधे बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया. याचिका दायर की गई और नवनीत राणा को बड़ा झटका लगा.

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तब बॉम्बे हाई कोर्ट ने नवनीत राणा को दो टूक कहा था कि आप मोची जाति से ताल्लुक नहीं रखती हैं, सिर्फ इस तबके को उपलब्ध सुविधाओं को हासिल करने के लिए आपने धोखाधड़ी की. इस मामले में नवनीत राणा को बॉम्बे हाई कोर्ट से जरूर झटका लगा लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर रोक लगा दी गई. लेकिन शिवसेना और नवनीत के बीच टकराव की दीवार खड़ी हो चुकी थी.

वसूली कांड पर जोरदार भाषण और फिर धमकी विवाद

जो जंग पहले सिर्फ चुनावी दंगल तक सीमित दिखी, पिछले साल मार्च में वो लोकसभा तक जा पहुंची. ये वो समय था जब महाराष्ट्र की राजनीति में वसूली कांड की वजह से बड़ा बवाल खड़ा हो गया था. उस बवाल पर निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने लोकसभा में एक जोरदार भाषण दिया था. महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार पर जमकर निशाना साधा था.

लेकिन बाद में नवनीत राणा ने आरोप लगा दिया संसद की लॉबी में शिवसेना सांसद अरविंद सावंत ने उन्हें धमकाया. नवनीत की मानें तो तब सावंत ने कहा था कि तू महाराष्ट्र में कैसे घूमती है, मैं देखता हूं. तेरे को भी जेल में डालेंगे. ये बवाल इतना ज्यादा बढ़ गया था कि नवनीत ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को तो चिट्ठी लिखी ही, बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी पत्र लिखा. ऐसे में ये दूसरा बड़ा मौका रहा जब नवनीत राणा ने शिवसेना से सीधी टक्कर ली.

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मोदी सरकार की तारीफ, नवनीत की विचारधारा पर सवाल

ये तो नवनीत और शिवसेना के बीच आपस में आरोप-प्रत्यारोप का दौर रहा, लेकिन निर्दलीय सांसद की विचारधारा की वजह से भी उनकी शिवसेना से तकरार हमेशा देखने को मिली है. ऐसा देखा गया है कि कई मामलों पर नवनीत राणा ने केंद्र की मोदी सरकार का समर्थन किया है. कोरोना की दूसरी लहर के बाद जब पिछले साल दिसंबर में सत्र बुलाया गया था, तब बहस के दौरान नवनीत राणा ने खुलकर केंद्र सरकार की तारीफ की थी. वहीं दूसरी तरफ उन्होंने महाराष्ट्र सरकार पर उनके क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाया था. यहां तक कहा था कि सीएम से लेकर मंत्री तक, कोई जवाब नहीं देता है. इस वजह से भी शिवसेना की नवनीत राणा से ठनी रही और उन पर 'बीजेपी की बी टीम' होने का आरोप लगा.

ऐसे में शिवसेना और नवनीत राणा के बीच दुश्मनी वाली पिच काफी समय पहले ही तैयार हो चुकी थी, हनुमान चालीसा विवाद ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया. अब कब तक और कहां तक ये 'आरोपों वाली जंग' जाती है, इस पर सभी की नजर रहेगी.

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