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CM शिंदे रहेंगे या जाएंगे, स्पीकर नार्वेकर ने अयोग्य ठहराया तो कौन संभालेगा महाराष्ट्र की कुर्सी? ये है बीजेपी का प्लान B

महाराष्ट्र विधानसभा में स्पीकर राहुल नार्वेकर आज मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उनके गुट के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता मामले में फैसला सुनाएंगे. 18 महीने पहले शिंदे समेत 39 अन्य विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी, जिसके कारण 57 साल पुरानी पार्टी शिवसेना में विभाजन हो गया था और MVA सरकार गिर गई थी. बाद में दलबदल विरोधी कानूनों के तहत दोनों गुट ने एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए क्रॉस-याचिकाएं दायर की थीं.

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महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सरकार पर कोई संकट नहीं है.
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सरकार पर कोई संकट नहीं है.

महाराष्ट्र की राजनीति में आज बड़ा दिन है. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे समेत 40 विधायकों को दलबदल विरोधी कानूनों के तहत अयोग्य घोषित करने के मामले में स्पीकर राहुल नार्वेकर अपना फैसला सुनाएंगे. ऐसे में यह सवाल तेजी से चलने लगा है कि अगर स्पीकर ने शिंदे और उनके विधायकों को अयोग्य घोषित किया तो महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी कौन संभाल सकता है. यह चर्चाएं इसलिए भी मायने रखती हैं, क्योंकि बीजेपी ने साफ कहा है कि सरकार पर कोई संकट नहीं है.

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महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को स्पष्ट कहा है कि स्पीकर का चाहे जो भी फैसला हो, हमारी सरकार स्थिर रहेगी. हमारा गठबंधन कानूनी रूप से वैध है. हमें उम्मीद है कि स्पीकर का फैसला भी हमारे पक्ष में ही आएगा. फडणवीस के बयान के बाद यह साफ है कि अगर शिंदे के खिलाफ फैसला आया तो बीजेपी अपने प्लान-बी पर आगे बढ़ेगी. 

'SC ने 10 जनवरी तक फैसला देने की डेडलाइन दी थी'

दरअसल, डेढ़ साल पहले यानी 20 जून 2022 को एकनाथ शिंदे और उनके गुट के 40 विधायकों ने शिवसेना से बगावत कर दी थी और बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार बना ली थी. शिंदे को सीएम बनाया गया था. फडणवीस डिप्टी सीएम बने थे. उद्धव पक्ष ने दल-बदल कानून के तहत पहले स्पीकर को नोटिस दिया. फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

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सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में स्पीकर को फैसला लेने के लिए 31 दिसंबर, 2023 समय सीमा तय की थी, लेकिन उससे कुछ दिन पहले 15 दिसंबर को शीर्ष अदालत ने 10 दिन की मोहलत दे दी थी. ऐसे में फैसले के लिए 10 जनवरी की नई तारीख तय हुई थी. स्पीकर ने शिवसेना के दोनों गुटों (उद्धव और शिंदे) के विधायकों की सुनवाई पूरी कर ली है. इसे रिव्यू के लिए कानूनी जानकारों के पास भेजा गया. आज अयोग्यता से संबंधित याचिका पर शाम 4 बजे तक स्पीकर का फैसला आने की संभावना है. 

क्या है पूरा मामला?

2019 के चुनाव में शिवसेना ने बीजेपी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था और 56 सीटें जीती थी. जून 2022 में जब शिंदे गुट ने शिवसेना और उद्धव ठाकरे से बगावत की, तब उन्हें 16 विधायकों का समर्थन था. यानी बगावत करने वाले सदस्यों की संख्या दो तिहाई नहीं थी. ऐसे में उन पर अयोग्यता की तलवार लटकी थी. अविभाजित शिवसेना के मुख्य सचेतक के रूप में सुनील प्रभु ने शिंदे और अन्य 15 विधायकों के खिलाफ विधानसभा सदस्यता से अयोग्य ठहराए जाने का नोटिस दिया था. शिंदे गुट के बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. इस बीच, शिंदे गुट के विधायकों की संख्या 40 हो गई. यानी पहले जब बागी विधायकों को नोटिस दिया गया, तब उनकी संख्या सिर्फ 16 थी. उसके बाद 14 और विधायकों के साथ आने से कुल बागी विधायकों की संख्या 40 हो गई थी. चुनाव आयोग ने भी शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते ही चुनाव चिह्न 'धनुष वान' देने का फैसला किया था.

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शिंदे गुट का तर्क है कि उसे दो तिहाई से ज्यादा 40 विधायकों का समर्थन है. जबकि उद्धव गुट ने पहले 16 और 14 बागी विधायकों को नोटिस जारी किए थे. ऐसे में उनका कहना है कि शिंदे गुट के समर्थन में एक साथ दो तिहाई बागी विधायक नहीं गए. अब फैसला लेने के लिए स्पीकर के पाले में गेंद है.

दल विरोधी कानून क्या कहता है...

संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून को शामिल किया गया है. इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में 'दल-बदल' की कुप्रथा को समाप्त करना है. कानून के अनुसार, सदन के स्पीकर के पास सदस्यों को अयोग्य करने संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है. यदि स्पीकर के दल से संबंधित कोई शिकायत प्राप्त होती है तो सदन द्वारा चुने गए किसी अन्य सदस्य को इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है.  इसके अलावा, कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों का भी जिक्र है, जिनमें दल-बदल पर भी अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है. दल-बदल विरोधी कानून में एक राजनीतिक पार्टी को किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में या उसके साथ विलय करने की अनुमति दी गई है. बशर्ते कि उसके कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों. ऐसे में ना तो दल-बदल रहे सदस्यों पर कानून लागू होगा और ना ही राजनीतिक पार्टी पर. स्पीकर को इस कानून से छूट प्राप्त है.

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'अगर शिंदे अयोग्य घोषित हुए तो गिर जाएगी सरकार!'

कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर अयोग्य घोषित किया जाता है तो मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उनके गुट के मंत्री और विधायकों को तुरंत इस्तीफा देना होगा. टेक्निकल तौर पर सरकार पर भी संकट आ जाएगा. यानी नई सरकार के गठन की कवायद शुरू की जाएगी. हालांकि, बीजेपी गठबंधन के पास जरूरी बहुमत रहेगा. क्योंकि कुछ महीने पहले ही अजित पवार गुट ने एनसीपी से बगावत की थी. अजित ने अपने साथ 40 विधायकों के आने का दावा किया था. 

विधानसभा की कुल 288 सीटें हैं. बहुमत के लिए 145 सदस्यों का साथ होना जरूरी है. 2019 में बीजेपी ने 105 सीटें जीती थीं. 40 विधायक अजित गुट के साथ हैं. ऐसे में महायुति सरकार जरूरी संख्या जुटाने में कामयाब दिखती है.

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'अजित को सीएम बनाकर बड़ा दांव खेल सकती है बीजेपी!'

महायुति सरकार भले ही दोबारा आना तय होगा, लेकिन मुख्यमंत्री नया होगा. यानी शिंदे की कुर्सी किसे दी जाएगी, यह गठबंधन के नेताओं को तय करना होगा. शिंदे के अयोग्य होने की स्थिति में अजित गुट का हावी होना तय माना जा रहा है. यह भी कहा जा सकता है कि बीजेपी अजित पवार को नया सीएम बनाने के लिए सहमति दे सकती है.

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'चुनाव आयोग के फैसले को आधार बना सकते हैं स्पीकर'

हालांकि, अगर शिंदे गुट को अयोग्य ठहराया जाता है तो फिर अजित गुट के विधायकों की सदस्यता पर भी संकट आ सकता है. यानी स्पीकर का इसी तर्ज पर फैसला आने की संभावना जताई जा रही है. यह भी जानना जरूरी है कि चुनाव आयोग ने विधायकों की संख्या ज्यादा होने की वजह से शिंदे को पार्टी और सिंबल सौंप दिया था. ऐसे में स्पीकर यह तर्क भी दे सकते हैं कि चुनाव आयोग के फैसले के आधार पर किसी सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है. 

'फैसले के बाद ऊपरी अदालत जाने का विकल्प'

यह भी फैक्ट है कि शिंदे और उद्धव गुट, दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं, ऐसे में अगर शिंदे गुट योग्य पाया जाता है तो उद्धव गुट अयोग्य हो जाएगा. यही नियम शिंदे गुट के लिए लागू होगा. अगर शिंदे गुट अयोग्य पाया जाता है तो उद्धव गुट योग्य मान लिया जाएगा. फिलहाल, अयोग्य विधायक इसी साल होने वाला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं. स्पीकर के फैसले के बाद अयोग्य गुट 30 दिन के अंदर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है. कोर्ट ने फैसले पर रोक लगाई तो राहत मिल सकती है. 

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क्या हुआ था जून 2022 में...

20 जून 2022 को एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के विधायकों ने बगावत कर दी थी. शिंदे के साथ शिवसेना विधायक महाराष्ट्र से गुजरात के सूरत पहुंचे थे. उसके बाद 10 निर्दलीय विधायक भी शिंदे खेमे के साथ आ गए थे.  बाद में यह सभी गुवाहाटी चले गए थे. तब शिंदे ने दावा किया था कि उनके साथ 35 विधायकों का समर्थन है. बाद में शिंदे गुट के विधायकों की संख्या 40 हो गई थी. इन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता का नोटिस दिया गया था. महा विकास अघाड़ी गठबंधन सरकार गिर गई. उसके बाद ठाकरे और शिंदे गुट ने एक-दूसरे के विधायकों के खिलाफ याचिका दायर की और दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की. 30 जून को बीजेपी गठबंधन की तरफ से एकनाथ शिंदे नए मुख्यमंत्री बनाए गए. उद्धव गुट के पास सिर्फ 16 विधायकों का समर्थन है.

अजित गुट पर भी आना है फैसला

स्पीकर राहुल नार्वेकर बीजेपी के टिकट पर दक्षिण मुंबई के कोलाबा सीट से पहली बार विधायक चुने गए हैं. स्पीकर ने बताया कि 34 याचिकाएं दायर की गईं और सुनवाई के दौरान उनके कार्यालय के समक्ष 2.5 लाख पन्नों के दस्तावेज पेश किए गए. नार्वेकर ने यह भी बताया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर 30 जनवरी तक फैसला देने का प्रयास किया जा रहा है.शरद पवार की पार्टी एनसीपी में जुलाई 2023 में बगावत हो गई थी और डिप्टी सीएम अजीत पवार के नेतृत्व में विधायक शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गए थे.

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पूरे मामले में व्हिप ही निर्णायक... जानिए क्यों?

- इस बीच पूरे मामले में व्हिप निर्णायक है. स्पीकर इसकी व्याख्या कैसे करते हैं और व्हिप देने की प्रक्रिया क्या होगी, यह महत्वपूर्ण होगा. स्पीकर के विश्लेषण के मुताबिक चाहे ठाकरे गुट हो या शिंदे गुट, दोनों में से किसी एक गुट को इस व्हिप से झटका लगेगा. 
- महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के पूर्व सचिव अनंत कालसे कहते हैं कि अब तक के इतिहास में यह फैसला ऐतिहासिक होगा. यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में गिना जाएगा. जैसे केशवानंद भारती मामला संविधान के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया. यहां दसवीं अनुसूची का अर्थ एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. सिर्फ दो ही चीजें हैं- कौन सी पार्टी और क्या व्हिप उल्लंघन किया? अगर ये दोनों साबित हो गए तो उस सदस्य की सदस्यता जा सकती है. तीसरा पहलू यह है कि यदि सदस्यता बनी रहनी है तो दो-तिहाई सदस्य विधायक दल छोड़कर किसी अन्य दल में विलय करने पर भी सदस्य बने रह सकते हैं. ये महत्वपूर्ण बिंदु हैं.
- कलसे ने आगे कहा, क्या एकनाथ शिंदे ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है? क्या उन्होंने व्हिप का उल्लंघन किया है? या फिर उस गुट ने कोई दूसरी पार्टी बना ली है और उसका किसी दूसरी पार्टी में विलय हो गया है? इन तीन मुद्दों पर विधानसभा अध्यक्ष को फैसला देना है. पहला मुद्दा यह है कि क्या उन्होंने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है. इसमें अहम है कि सुप्रीम कोर्ट ने 12 मई को अपने फैसले में कहा था कि उस वक्त सुनील प्रभु पार्टी के सचेतक थे. इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह व्हिप उन पर कानूनी रूप से लागू होगा. लेकिन, क्या यह दिया गया है? क्या उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है? यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर स्पीकर को निर्णय लेना है. दूसरी बात, क्या व्हिप का उल्लंघन हुआ है?

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