देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है. तमाम राजनीतिक दल लगातार अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर रहे हैं. 2024 के आम चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा के नेतृत्व वाली NDA और कांग्रेस के गठबंधन वाली INDIA ब्लॉक के बीच है. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में इस चुनाव में क्या घटेगा इसपर सबकी नजर बनी हुई है. कारण साफ है. बीते 5 साल में राज्य की सियासी गलियों में बहुत कुछ घटा है. वर्षों पुरानी अलायंस के टूटने से लेकर राज्य के दो बड़े राजनीतिक दलों में फूट और इसके पश्चात नई धाराओं का उदय, महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत कुछ देखा जा चुका है.
प्राकश अंबेडकर पर बना हुआ है संशय
इस बीच महाराष्ट्र में प्राकश अंबेडकर और उनकी पार्टी का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा, इसे लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. दरअसल, प्रकाश अंबेडकर ने भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर वंचित बहुजन आघाडी पार्टी बनाई थी. 2019 में महाराष्ट्र में वंचित बहुजन आघाडी ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. 2019 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन को 6.92% वोट मिले थे. इस नए गठबंधन ने महाराष्ट्र में कम से कम 8 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस-एनसीपी के उम्मीदवारों को हराने में अहम भूमिका निभाई. इन लोकसभा क्षेत्रों में इस गठबंधन को करीब-करीब 1.5 लाख से लेकर 2 लाख तक वोट मिले. इसके अलावा कुछ अन्य लोकसभा सीटों पर इन्हें 40 से 50 हजार वोट मिले. कुल मिलाकर एक बड़ा वोट बैंक 2019 के लोकसभा चुनाव में उनके साथ दिखा. इसके साथ ही वंचित बहुजन आघाडी ने या फिर ये कहें कि प्रकाश अंबेडकर ने राज्य की सियासत में अपनी ताकत का लोहा मनवाया.
प्रकाश अंबेडकर का वोट बैंक
प्रकाश अंबेडकर महाराष्ट्र की राजनीति का एक अहम चेहरा हैं. ऐसा माना जाता है कि महाराष्ट्र के दलित समाज का, जिन्हें बौद्ध समाज भी कहा जाता है, सर्मथन प्रकाश अंबेडकर को हासिल है. मूल रूप से ये वो लोग हैं जिन्होंने डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. राज्य में इन दलित समाज का समर्थन प्रकाश अंबेडकर को हासिल है. आपको बता दें कि AIMIM और प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाडी का गठबंधन 2019 के विधानसभा चुनाव में टूट गया था. तब भी उस चुनाव में लगभग 4% तक वोट वंचित बहुजन आघाडी पाने में कामयाब हुई थी. इसके बाद से ही प्रकाश अंबेडकर महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान तैयार करने की कोशिश लग गए.
शिवसेना के साथ लेकिन महाविकास आघाडी से दूरी
इसके बाद राज्य की राजनीति में बड़ा उटरफेर आया. 2019 में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की सरकार बनी. उस समय भी वंचित बहुजन आघाडी ने कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना और बीजेपी दोनों से समान दूरी बनाए रखा. लेकिन 2022 के बाद जब राज्य की राजनीति एक बार फिर बदली तब प्रकाश अंबेडकर एक बार फिर सतह पर आए. उद्धव ठाकरे और प्रकाश अंबेडकर ने अलग से गठबंधन की घोषणा की. यह गठबंधन शिवसेना और वंचित बहुजन आघाडी का गठबंधन था. इसमें शिवसेना के साथी कांग्रेस और एनसीपी शामिल नहीं थे. यह गठबंधन महाविकास आघाडी का गठबंधन नहीं था. इसके बाद महाविकास आघाडी के नेताओं ने कहा कि जब भी चुनावों को लोकर सीट शेयरिंग की बात होगी तब शिवसेना को जो सीटें मिलेंगी, वंचित बहुजन आघाडी को उन्हीं सीटों में से हिस्सा दिया जाएगा.
जब बदल गई महाराष्ट्र की सियासत
महाराष्ट्र में राजनीतिक उलटफेर चलता रहा. एनसीपी टूटी. अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से अलग हो गए. एक तरफ एनसीपी का नाम और चुनाव चिन्ह अजित पवार को मिला तो दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के हाथ शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह लगा. इस सबके बीच प्रकाश अंबेडकर ने महाविकास आघाडी में आने से इंकार कर दिया. लेकिन करीब तीन महीने पहले एक बार फिर शीट शेयरिंग को लेकर उनकी बातचीत महाविकास आघाडी के साथ शुरू हुई. प्रकाश अंबेडकर का मानना था कि उन्हें 'INDIA' अलायंस में शामिल किया जाए. बाद में दिल्ली में हुई बैठक में शरद पवार ने खुद प्रकाश अंबेडकर का नाम सजेस्ट करते हुए कहा था कि उन्हें इंडिया अलायंस में शामिल करने से गठबंधन की स्थिति महाराष्ट्र में मजबूत होगी. लेकिन उस वक्त इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया जा सका.
कांग्रेस को प्रकाश अंबेडकर पर विश्वास नहीं?
ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस के नेता प्रकाश अंबेडकर पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं. हालांकि इसके पीछे भी इतिहास है. 1998 में एक पार्टी अस्तित्व में थी. नाम था रिपब्लिकन पार्टी. उस वक्त इसके अंदर चार गुट थे. इसमें प्रकाश अंबेडकर, रामदास अठावले, जोगेंद्र कवाडे और आर एस गवई शामिल थे. तब राज्य में इनका गठबंधन कांग्रेस के साथ हुआ. इसका नतीजा यह रहा कि महाराष्ट्र में कांग्रेस 36 सीटें जीतकर आई, जिसमें से 4 सीटें पहली बार राज्य के राजनीतिक इतिहास में रिपब्लिकन पार्टी मिली थीं. लेकिन फिर प्रकाश अंबेडकर गठबंधन से बाहर हो गए. इसलिए कांग्रेस को लगता है कि प्रकाश अंबेडकर डील तोड़ देते हैं, और इसका असर कांग्रेस के दलित वोटों पर पड़ता है. ऐसे में कांग्रेस पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है. जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होता है. इसलिए कांग्रेस पहले से प्रकाश अंबेडकर के साथ बातचीत करने को तैयार नहीं है.
हालांकि, महाराष्ट्र में फिलहाल जो राजनीतिक स्थिति बनी हुई है उसमें ये साफ नजर आ रहा है कि दोनों अलाइंस, एक ओर शिवसेना, बीजेपी और एनसीपी और दूसरी तरफ शिवसेना (UBT), कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट), समान रूप से मजबूत नजर आ रहीं हैं. तमाम सर्वे में ये बात सामने आ रही है कि दोनों ही गठबंधन करीब-करीब 40 से 45 फीसदी वोट शेयर के साथ बैठी हुई है. ऐसे में प्रकाश अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन आघाडी का 4% वोट काफी मायने रखता है. ये बात प्रकाश अंबेडकर अच्छी तरह जानते हैं.
MVA के साथ जाने को लेकर क्या है संशय?
प्रकाश अंबेडकर अगर महाविकास आघाडी के साथ जाते हैं तो इसका फायदा उन्हें उनकी अपनी सीट अकोला सहित कुछ अन्य स्थानों पर मिल सकता है. प्रकाश अंबेडकर अकोला सीट जीत सकते हैं. साथ ही कुछ अन्य साटों पर भी उनकी पार्टी को लोकसभा चुनाव में फायदा मिल सकता है. लेकिन साथ ही प्रकाश अंबेडकर को इस बात का भी डर है कि महाविकास आघाडी के साथ हाथ मिलाने से कहीं उनका 4% वोट बैंक छिटक कर कांग्रेस के पास न चला जाए. जिसका नुकसान बाद में उन्हें और उनकी पार्टी को उठाना पड़े.
क्या है प्रकाश अंबेडकर की मांग
फिलहाल प्रकाश अंबेडकर दोनों गठबंधन से समान दूरी रखकर चलने की कोशिश कर रहे हैं. प्रकाश अंबेडकर यह चाहते हैं कि चुनाव में उन्हें कम से कम इतनी सीटें दी जाएं कि वो अपनी ताकत बरकरार रख सकें. साथ ही उनकी कुछ मांगे ऐसी हैं जिन्हें पूरा कर पाना किसी भी गठबंधन के लिए आसान नहीं है. जैसे कि उन्होंने मनोज जरांगे पाटिल को जालना से लोकसभा टिकट देने की मांग रखी है. साथ ही उनकी एक मांग यह भी है कि लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र से 10 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट मिलना चाहिए. इसके अलावा उन्होंने एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाने की भी मांग रखी है.
राहुल की यात्रा में हुए थे शामिल
हालांकि प्रकाश अंबेडकर हाल में संपन्न हुई राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में मुंबई में शामिल हुए थे. यात्रा में शामिल होने को लोकर प्रकाश अंबेडकर ने तब कहा था कि यह 'INDIA' ब्लॉक की रैली नहीं है. उन्हें कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने का न्योता मिला था. इसलिए वो इस यात्रा में शामिल हुए थे. कुल मिलाकर ऐसा कहा जा सकता है कि प्रकाश अंबेडकर एक तरीके से इंडिया अलाइंस पार्टनर को मिक्स सिग्नल दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ महा विकास अघाडी के नेताओं को लग रहा है कि प्रकाश अंबेडकर समय खींच रहे हैं.
क्या नहीं हो पाएगा गठबंधन
जब प्रकाश अंबेडकर से सीटों को लेकर चर्चा हुई तो अचानक से उन्होंने छब्बीस सीटों की एक लिस्ट सामने रख दीं. इसके बाद MVA की तरफ से उन्हें चार सीटों का एक प्रस्ताव दिया गया. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि यह अलायंस अधर में फंस गया है. कोई भी दल गठबंधन न होने का जिम्मा अपने सर नहीं लेना चाहती. सभी यह बताना चाहते हैं कि सामने वाले की वजह से गठबंधन नहीं हो सका.
लगातार गोल शिफ्ट कर रहें हैं प्रकाश अंबेडकर
पूरी बातचीत के बीच प्रकाश अंबेडकर हमेशा गोल शिफ्ट करते दिखे हैं. पहले उनका कहना था कि चारों पार्टनर 12-12 सीटों पर चुनाव लड़े. यह हो नहीं सका. इसके बाद उन्होंने कहा कि पहले MVA वापस में सीटों का बटवारा कर ले, उसके बाद वह तीनों पार्टियों (कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और एनसीपी (शरद पवार गुट) से अलग-अलग बातचीत करेंगे. उनका यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया गया. अब उन्होंने कहा है कि वो सीट बंटवारे को लोकर कांग्रेस से बातचीत करेंगे. हालांकि कांग्रेस एक लिमिट के आगे इस पर तैयार नहीं है.
दुविधा में फंसे हैं प्रकाश अंबेडकर
प्रकाश अंबेडकर ने कहा है कि वो सात सीटों पर कांग्रेस का समर्थन करेंगे लेकिन कांग्रेस को उन पर भरोसा नहीं है. अब प्रकाश अंबेडकर कहीं ना कहीं इस दुविधा में फंस गए हैं कि एक ओर उनकों उन्हें अपना वोट बैंक भी बचाना है और दूसरी तरफ महाविकास आघाडी के साथ में मिलकर उन्हें चुनाव में सीटें भी जितनी है. इस दुविधा के बीच अब यह गठबंधन कहीं ना कहीं खतरे में पड़ता नजर आ रहा है. अगर राज्य में लोकसभा का चुनाव पूरी तरह से दो गठबंधनों के बीच रहा तो ऐसे में प्रकाश अंबेडकर को अपना 4% वोट बैंक तो बचाना ही है साथ ही इस बात का ख्याल भी रखना है कि वो पूरी तरीके से महाविकास आघाडी के साथ न चला जाए. जिसका असर उनके आगे की राजनीति पर भी पड़ सकता है. इसलिए वो MVA से रिश्ता तोडना भी नहीं चाहते लेकिन पूरी तरीके से उनके साथ जाकर यह भी नहीं दिखाना चाहते कि अब उनमें और महाविकास आघाडी में कोई फर्क नहीं रहा.