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प्रमोद कृष्णम: कितने संत और कितने नेता... कैसा रहा सियासी और आध्यात्मिक सफर?

संभल स्थित कल्कि धाम के सर्वेसर्वा आचार्य प्रमोद कृष्णम चर्चा में हैं. धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर गजल गायकी, शायरी और मुशायरों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले प्रमोद कृष्णम के जीवन में राजनीति और अध्यात्म बराबर बसते हैं. उन्होंने मात्र 17 साल में राजीव को कांग्रेस के साथ वफादारी का वचन दिया था. तो आज पीएम मोदी ने उनके निमंत्रण को स्वीकार किया और उनके कल्कि धाम पर पहुंचे.

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प्रमोद कृष्णम कल्कि धाम के पीठाधीश्वर हैं. (फोटो-facebook))
प्रमोद कृष्णम कल्कि धाम के पीठाधीश्वर हैं. (फोटो-facebook))

लहराती सफेद दाढ़ी,सफेद वस्त्र और इन सफेदियों के बीच ललाट पर लाल तिलक.आचार्य प्रमोद कृष्णम पहली ही नजर में ठेठ हिन्दू संत से अपनी अलग एक छवि पेश करते हैं.हिन्दुत्व के भगवा ब्रांड के बीच उनका सफेद रंग चुनना उनकी विचारधारा और अध्यात्म को अलग पहचान देता रहा है. हालांकि इस अलग पहचान के पीछे उनका कांग्रेसी अतीत भी है, जिससे अभी-अभी वो 'मुक्त'हो चुके हैं. 

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कुछ ही दिन पहले उन्होंने कांग्रेस के साथ अपने 40 साल पुराने जुड़ाव को ये कहते हुए खत्म कर लिया था कि राम और राष्ट्र के साथ समझौता नहीं किया जा सकता. इस संबंध विच्छेद के लिए उन्हें राजीव गांधी को 40 साल पहले मात्र 16-17 की उम्र में दिये एक वादे को भी तोड़ना पड़ा, लेकिन प्रमोद कृष्णम कांग्रेस से इस विदाई के लिए पार्टी को ही दोष देते हैं.  

भगवान कल्कि की भक्ति

राजीव को वचन देने की ये कहानी बताएंगे, लेकिन इससे पहले एक हिन्दू पौराणिक कथा समझनी होगी. हम जानते हैं कि हिन्दुओं में भगवान विष्णु के 10 अवतार की मान्यता है. विष्णु के 10वें अवतार भगवान कल्कि हैं. जिनका धरती पर आगमन होना है. कहा जाता है कि कलियुग के अंत में भगवान कल्कि धरती पर आएंगे. बचपन से ही वेद-पुराणों में रुचि रखने वाले प्रमोद कृष्णम इन्हीं भगवान कल्कि को अपना मुख्य अराध्य मानते हैं. 

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4 जनवरी 1965 को बिहार में एक ब्राह्मण परिवार में पैदा लेने वाले प्रमोद कृष्णम ने राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की है. इन्होंने अपने जीवन में राजनीति और अध्यात्म दोनों से नाता रखा. राजनीति इनके पेशेवर जीवन में दिखता है तो अध्यात्म निजी जीवन में. 

आचार्य प्रमोद कृष्णम का सार्वजनिक जीवन इन्हीं कल्कि भगवान के इर्द-गिर्द घुमता है. 1990 में उत्तर प्रदेश के संभल में उन्होंने कल्कि फाउंडेशन की स्थापना की. फिर 1996 में कल्कि धाम की स्थापना उनके द्वारा की गई. इसी धाम में पीएम मोदी ने 19 फरवरी 2024 को कल्कि मंदिर की आधारशिला रखी है.  

लेकिन प्रमोद कृष्णम धर्म की अपनी रुचि को सनातन से आगे ले गए. इस्लाम पर उनकी गहरी पकड़ है. यही वजह से है कि प्रमोद कृष्णम शायरी भी करते हैं और कभी इनके जलसों में नबी और अली के भी नारे लगते हैं. कर्बला की लड़ाई की वे किसी मौलाना से भी अच्छी व्याख्या कर सकते हैं. 

2019 के चुनाव में जब वो लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने उतरे थे तो एक एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वे इस बात से इनकार करते हैं कि वे 'हिन्दू धर्म से बंधे' हैं. तब उन्होंने कहा था, "मैं भजन और शायरी भी लिखता हूं मैं धार्मिक कार्यक्रमों और मुशायरों में भी उतनी ही शिद्दत से शामिल होता हूं. मेरा धर्म शांति है और जो कोई इसमें खलल डालने की कोशिश करता है,वह मेरा प्रतिद्वंद्वी है."

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नबी जितने तुम्हारे हैं, नही उतने हमारे हैं

यूट्यूब पर अगर कुछ ही साल पुराने वीडियो को देखें तो प्रमोद कृष्णम के मशायरे मुस्लिम समाज में काफी लोकप्रिय हुए हैं. एक वीडियो में वो कहते हैं..., 'मेरे सीने की धड़कन हैं, मेरी आंखों के तारें हैं...सहारा बेसहारों का... खुदा के वो दुलारे हैं... समझकर तुम फकत अपना... उन्हें तक्सीम न करना, नबी जितने तुम्हारे हैं, नही उतने हमारे हैं.'फिर तालियों की आवाज रुकती नहीं. उम्मीद की जा सकती है कि वे अपनी बदली वफादारियों के बीच भी गजल गायकी और मुशायरों के इस सिलसिले को जारी रखेंगे. 

खुद प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि जो लोग ये कहते हैं कि मैं पूजा करता हूं,प्रेम नहीं करता वे लोग झूठ बोलते हैं. आचार्य प्रमोद कृष्णम की गजल का एक शेर है- वो शख्स जो किसी से मोहब्बत नहीं करता, धोखा है इबादत का, इबादत नहीं करता. 

अखाड़ा परिषद ने बताया था फर्जी बाबा

आचार्य प्रमोद कृष्णम को साल 2018 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने 'फर्जी बाबाओं' की सूची में शामिल किया था. अखाड़ा परिषद का आरोप था कि उन्हें समूह से बाहर कर दिया गया है क्योंकि वह 'संत परंपरा' (संतों की परंपरा) का पालन नहीं करते हैं और न ही उन्होंने अपना घर और परिवार छोड़ा है, जैसा कि सभी वास्तविक संत करते हैं.

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इस पर उन्होंने कहा था कि "मुझे किसी संगठन के प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं है. मुझे पता है कि मैं क्या कर रहा हूं और अपने रास्ते पर चलता रहूंगा."

राजीव को दिया वादा और कांग्रेस से दूरी...

2019 के लोकसभा चुनाव में राजनाथ सिंह के खिलाफ उतारकर कांग्रेस ने कृष्णम को बड़ी जिम्मेदारी दी थी. इस चुनाव में राजनाथ, सपा की ओर से शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा भी रेस में थीं, इस इलेक्शन में करीब 1.80 लाख वोट लाकर प्रमोद कृष्णम तीसरे स्थान पर रहे थे. 

कांग्रेस के टिकट पर दो बार (2014, 2019) लोकसभा चुनाव लड़ चुके प्रमोद कृष्णम का पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस मोह भंग होना शुरू हो गया. कुछ ही दिन पहले उन्हें पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है. प्रमोद कृष्णम इसे अपनी मुक्ति बताते हैं. अपनी सफाई में कृष्णम ने कथित रूप से राजीव गांधी को दिया वो अपना वादा याद किया था जब उन्होंने कहा था कि वे आजीवन कांग्रेस में रहेंगे. 

प्रमोद कृष्णम ने कहा था, "जब मेरी उम्र 16-17 वर्ष थी तो 1981-82 के लगभग में मैं राजीव गांधी से मिला था, जब वो संजय गांधी के निधन के बाद सांसद बने थे. इंदिरा प्रधानमंत्री थीं, तब से लेकर मैं कांग्रेस से जुड़ा था. तब राजीव से मैंने वादा किया था. उस समय इंदिरा जी की हत्या वो चुकी थी और राजीव प्रधानमंत्री बन चुके थे. तब राजेश पायलट ने मुझे उनसे मिलवाया था. मैंने वादा किया था कि आखिरी सांस तक कांग्रेस नहीं छोड़ूंगा."

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कभी प्रियंका गांधी के करीबी नेताओं में शुमार रहे प्रमोद कृष्णम के अनुसार इस वादे को उन्होंने निभाया है. प्रमोद कृष्णम के अनुसार वे कांग्रेस के कई फैसलों जैसे, धारा-370 हटाने का विरोध, तीन तलाक हटाने का विरोध से समहत नहीं थे. लेकिन वे चुप रहे. और अपमान सहकर भी कांग्रेस में बने रहे. उनका दावा है कि पार्टी उन्होंने नहीं छोड़ी, पार्टी ने उन्हें छोड़ा है. 

दरअसल 2019 के चुनाव, किसान आंदोलन-1, कोरोना काल के मोदी सरकार के कटु आलोचक रहने वाले प्रमोद कृष्णम ने अपने हाल के दिनों में अपने रुख में बदलाव कर लिया है. बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि अगर ममता बनर्जी को समर्थन नहीं किया गया तो नरेंद्र मोदी को हराना मुश्किल हो जाएगा. वहीं प्रमोद कृष्णम आज ये कहते नजर आ रहे हैं कि वे आजीवन प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े रहेंगे. 

प्रमोद कृष्णम का आरोप है कि कांग्रेस और राहुल गांधी के आसपास कुछ ऐसे लोग जमा हो गए हैं जो हिंदुत्व के खिलाफ अनर्गल बयान को ही राजनीति समझते हैं.इसी का जिक्र करते हुए उन्होंने डीएमके नेता उदयनिधि का उदाहरण दिया. जिन्होंने सनातन की तुलना डेंगू-मलेरिया से की थी. कृष्णम मानते हैं कि कांग्रेस के पतन का एक कारण तुष्टिकरण की राजनीति भी है. 

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