दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाईकोर्ट में अपनी याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया. इसे केजरीवाल के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में केजरीवाल ने तर्क दिया कि अगर उन्हें आगामी चुनाव में हिस्सा लेने के लिए तुरंत रिहा नहीं किया जाता है तो इससे विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करने की गलत परंपरा स्थापित होगी. ऐसा कहकर उन्होंने याचिका पर तत्कालीन सुनवाई की मांग की थी.
उन्होंने कहा कि ये याचिका आपातकालीन परिस्थिति में दायर की जा रही है, क्योंकि दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री को चुनावों के बीच ईडी ने अवैध रूप से गिरफ्तार किया है.
याचिका में कहा गया है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी सह-आरोपियों की ओर से दिए गए बयानों के आधार पर की गई है, जो बाद में सरकारी गवाह बन गए हैं. ये तर्क दिया गया है कि ऐसे बयान और सबूत पिछले 9 महीनों से ईडी के पास थे और फिर भी लोकसभा चुनाव के बीच में अवैध रूप से गिरफ्तारी की गई है.
ED की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
केजरीवाल ने अपनी याचिका में ईडी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि ईडी ने खुद का इस्तेमाल होने दिया, जिससे न सिर्फ चुनाव के बीच राजनीतिक विरोधियों की स्वतंत्रता पर हमला किया जा गया, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाई गई.
याचिका में कहा गया कि अगर केजरीवाल को आगामी चुनावी में भाग लेने के लिए तुरंत रिहा नहीं किया गया तो ये सत्ताधारी पार्टी की ओर से चुनाव से पहले विपक्षी पार्टी के प्रमुखों की गिरफ्तारी की मिसाल होगी, जिससे हमारे संविधान के मूल सिद्धांत खत्म हो जाएंगे.
हाई कोर्ट के फैसले पर क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि गवाहों के बयानों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. इसे लेकर केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाई कोर्ट इस बात को समझने में विफल रहा है कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों को 'पूर्ण सत्य' नहीं माना जाता है और अदालतें उन पर संदेह कर सकती हैं. इन बयानों को कभी भी तथ्यों की सच्चाई के ठोस सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे विरोधाभास और गवाह की पुष्टि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
गवाहों के बयान पर क्या कहा?
केजरीवाल की याचिका के मुताबिक, हाईकोर्ट इस बात को समझने में भी विफल रहा है कि सरकारी गवाह बन चुके सह-आरोपियों के बयान को किसी व्यक्ति के अपराध को सुनिश्चित करने के लिए स्टार्टिंग प्वॉइंट नहीं माना जा सकता है. ईडी इस तरह के बयान जबरन दर्ज करवा रही है.
याचिका में दावा किया गया है कि हाई कोर्ट इस बात को भी नहीं समझ पाया कि ईडी ने ऐसे बयान जमानत और दोषमुक्ति का लालच देकर दर्ज किए हैं, इसलिए इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में तर्क दिया गया है कि जिन बयानों के आधार पर गिरफ्तारी की गई है, उन्हें 7 दिसंबर 2022 से 27 जुलाई 2023 के बीच दर्ज किया गया था और बाद में केजरीवाल के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है.
उन्होंने दावा किया है कि पुराने बयानों को पुष्ट करने के लिए 21 मार्च 2024 को गिरफ्तारी से पहले तक कोई बयान दर्ज नहीं किया गया, जबकि प्रिवेन्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 19 के तहत ऐसा करना जरूरी है. 21 मार्च 2024 यानी आम चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद केजरीवाल की गिरफ्तारी स्पष्ट रूप से बाहरी विचारों से प्रेरित है.
गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने की मांग
याचिका में कहा गया है कि केजरीवाल को गिरफ्तार करने के लिए सी. अरविंद, मगुंटा रेड्डी और सरथ रेड्डी के बयानों पर भरोसा किया गया है, लेकिन इन बयानों से दूर-दूर तक ये संकेत नहीं मिलता है कि केजरीवाल ने PMLA की धारा 3 के तहत कोई कमीशन का काम किया है. दावा किया गया है कि इन बयानों से केजरीवाल के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता.
उन्होंने ये भी दावा किया कि बुची बाबू और राघव मगुंटा के बयान पूरी तरह से झूठ हैं, क्योंकि वो केजरीवाल के साथ किसी भी बैठक में मौजूद नहीं थे. इसके अलावा राघव मगुंटा का बयान उन घटनाओं को शामिल करने की कोशिश करता है, जिनके बारे में उनके पिता मगुंटा रेड्डी ने कोई बात नहीं की है.
इस याचिका में केजरीवाल की रिहाई और PMLA की धारा 19 के तहत उनकी गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने की मांग की गई है.