"किसी आदमी को तुम एक मछली दो, तो तुम एक दिन के लिए उसका पेट भरोगे लेकिन अगर किसी आदमी को मछली पकड़ना सिखा दो तो तुम जीवन भर के लिए उसका पेट भरने का उपाय कर दोगे." किसी बुद्धिमान व्यक्ति का ये कथन भारत में फ्रीबीज कल्चर के पनपने की पूरी कहानी कहता है.
चुनाव की घोषणाएं, घोषणापत्र के वायदों और देश की सरकारों का ट्रेंड देखें तो लगता है कि सरकार को फिलहाल जनता को रोजाना मछली देना ही मुफीद लग रहा है. क्योंकि ये 'आसान काम' है. सरकार मछली पकड़ने जैसा उद्यम जनता को सिखाने पर ज्यादा जोर नहीं दे रही है. या फिर इसके लिए मौके मुहैया नहीं करा रही है.
लेकिन इस 'आसान काम' का असर लंबे समय के लिए घातक है. इसी नुकसान की ओर इशारा किया है नरेंद्र मोदी सरकार के शीर्ष अर्थशास्त्री ने . 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने देश में फ्रीबीज इकोनोमी के चलन पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि अब लोगों को तय कर लेना चाहिए कि उन्हें मुफ्त की चीजें चाहए अथवा बेहतर सड़कें, अच्छी नालियां और स्वच्छ पानी सप्लाई.
चुन लीजिए, अच्छी सुविधाएं चाहिए या अकाउंट में पैसा
अरविंद पनगढ़िया ने गोवा की राजधानी पणजी में थे. जब उनसे पूछा गया था कि राज्यों द्वारा बुनियादी विकास के लिए आवंटित फंड का इस्तेमाल जनता को मुफ्त की रेवड़ियां देने में करना कितना चिंताजनक है. तो उन्होंने कहा कि अगर पैसा विकास परियोजनाओं के लिए दिया गया है, तो उसका इस्तेमाल उन्हीं कामों के लिए होना चाहिए. लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला चुनी हुई सरकार ही करती है.
देश में विकास योजनाओं का खाका बनाने वाली नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया ने राज्यों द्वारा अपनाए जा रहे इस ट्रेंड पर चिंता जताते हुए कहा, "ये निर्णय वित्त आयोग द्वारा नहीं लिए जाते. वित्त आयोग व्यापक आर्थिक स्थिरता के समग्र हित में इस मुद्दे को उठा सकता है. आयोग सामान्य स्तर पर कुछ कह सकता है, लेकिन यह नियंत्रित नहीं कर सकता कि राज्य राशि को कैसे खर्च करना चाहते हैं."
अरविंद पनगढ़िया ने देश में फ्रीबीज कल्चर की जिम्मेदारी जनता पर डालते हुए कहा कि अंतिम जिम्मेदारी जनता पर होती है क्योंकि नागरिक ही सरकार चुनते हैं. उन्होंने कहा, "अगर नागरिक मुफ्त सुविधाओं के आधार पर सरकार के लिए वोट करते हैं, तो इसका मतलब ये है कि वे मुफ्त सुविधाएं मांग रहे हैं. आखिरकार, नागरिकों को यह तय करना चाहिए कि उन्हें बेहतर सुविधाएं चाहिए, बेहतर सड़कें, बेहतर सीवरेज, बेहतर पानी या फिर वे ये चाहते हैं कि ये फ्रीबीज उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की जानी चाहिए."
फ्रीबीज भारतीय राजनीति की नई परिघटना नहीं है. तमिलनाडु जैसे राज्यों में ये चलना बहुत पहले से था. लेकिन थोक में वोट दिलाने वाली ये चुनावी रणनीति अब हर राज्य में पहुंच गई है. सभी राजनीतिक पार्टियां इस रणनीति का इस्तेमाल करती हैं.
सबसे पहले संक्षेप में समझते हैं कि फ्रीब्रीज कहते किसे हैं.
पहले फ्रीब्रीज की परिभाषा समझिए
रिजर्व बैंक की साल 2022 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रीबीज एक लोक कल्याणकारी उपाय है जो निःशुल्क प्रदान किया जाता है. भारत के संदर्भ में फ्रीबीज वे वस्तुएं और सेवाएं हैं जो नागरिकों को बिना किसी शुल्क के प्रदान की जाती हैं. चुनाव से पहले राजनीतिक दल इसकी घोषणा करते हैं और जनता से उम्मीद करते हैं इसके बदले में वे उन्हें वोट दें.
मुफ्त चावल, गेहूं, बिजली, पानी, साइकिल, लैपटॉप, टीवी, साड़ी फ्रीबीज के उदाहरण हैं. जनता के खातों में नगद ट्रांसफर भी फ्रीब्रीज की परिभाषा का ही विस्तार है. बेरोजगारी भत्ता, विधवाओं को पेंशन, बुजुर्गों को पेंशन, कर्ज माफी को भी फ्रीब्रीज के व्यापक फलक में रखा जा सकता है.
ऐसा इसलिए क्योंकि इससे किसी सर्विस या प्रोडक्ट का निर्माण नहीं होता है और सरकार का खजाना खाली होता रहता है. इससे राजकोष पर बोझ पड़ता है. महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य अब इसी राजकोष के घाटे से जूझ रहे हैं. फंड की कमी की वजह से कई राज्यों को अब अपने पैसे को खर्च करने में विकल्प को चुनना पड़ रहा है.
दिल्ली में फ्री-पानी बिजली और वोट का कनेक्शन
दिल्ली में मुफ्त पानी बिजली का वादा अरविंद केजरीवाल को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा गया. लेकिन इससे राज्य पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा. अब चुनाव से पहले केजरीवाल ने गरीब महिलाओं को भी हर महीने 1000 रुपये देने का वादा किया है. इसके अलावा उन्होंने कई मुफ्त योजनाओं की घोषणा की है.
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने में दिल्ली सरकार 3250 करोड़ रुपये खर्च करती है.
दिल्ली सरकार ने 76000 करोड़ के बजट में 6327.8 करोड़ रुपये मुफ्त की स्कीम के लिए रखे हैं.
अगर दिल्ली सरकार महिला सम्मान योजना लागू करती है तो इससे राज्य के खजाने पर 4560 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा. इससे दिल्ली के बजट में सब्सिडी के रूप में दिया जाने वाला हिस्सा कुल बजट का 15 से 20 फीसदी तक चला जाएगा. जिससे राज्य की अगली सरकार को 8,159 करोड़ रुपये का बजट घाटा सहना पड़ सह सकता है.
निश्चित रूप से ये पैसे दिल्ली के बुनियादी विकास पर खर्च किये जा सकते थे. हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने सत्ता में आने पर इससे ज्यादा फ्रीबीज (300 यूनिट बिजली) देने का वादा किया है.
महाराष्ट्र में लाड़की बहिन योजना का बोझ
महाराष्ट्र में लाड़की बहिन योजना की कामयाबी से महायुति/बीजेपी भी हतप्रभ थी. इस स्कीम ने बीजेपी को झोली भर भर कर वोट दिलाया. लेकिन राज्य की नई सरकार सत्ता में आने के बाद इस स्कीम को लागू करने के लिए मशक्कत कर रही है. चुनाव से पहले इस स्कीम के तहत राज्य सरकार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह दे रही थी.
चुनाव के बाद महायुति सरकार ने इसे 2100 करने का वादा किया था. इस लिहाज से इस स्कीम के लिए सरकार को हर साल 63000 करोड़ रुपये चाहिए. पिछले साल के बजट में महाराष्ट्र सरकार ने इस स्कीम के लिए 46000 करोड़ आवंटित किये थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार इतनी भारी-भरकम बजट वाले स्कीम को लॉन्च करने में परेशानी महसूस कर रही है. वित्त विभाग के अधिकारियों ने कहा कि इस बारे में अगर कुछ फैसला होगा तो अगले वित्त वर्ष में क्योंकि राज्य अभी इसका बोझ नहीं उठा सकता है.
कुछ ही दिन पहले महाराष्ट्र के कृषि मंत्री माणिकराव कोकाटे ने कहा था कि लाड़की बहिन योजना राज्य के खजाने पर बोझ डाल रही है, जिससे कृषि ऋण माफी योजना को लागू करने में दिक्कत हो रही है.
हिमाचल में 'मुफ्त' का सवाल
हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार भी 'मुफ्त' के वादे के साथ सत्ता में आई थी. राज्य सरकार ने पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने का वादा किया था और महिलाओं को 1500 देने और 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया था.
राज्य ने इन योजनाओं को लागू किया तो वहां कि इकोनॉमी पूरी तरह से चरमरा गई. पिछले साल लोग तब हैरान हो गये जब 1 सितंबर 2024 को राज्य के 2.5 लाख सरकारी कर्मचारी और 1.5 लाख पेंशनर्स के खाते में न तो सैलरी आई और न ही पेंशन.
सरकार जरूरी योजनाओं पर पैसे खर्च नहीं कर पा रही है. अब सुक्खू सरकार ने इन स्कीम पर कैंची चलानी शुरू कर दी है और जनता से बिजली सब्सिडी को छोड़ने की अपील की है. इससे राज्य सरकार को 750 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है. हिमाचल सरकार का अनुमान है कि साल 2024-25 में राज्य का वित्तीय घाटा 10,784 करोड़ रुपये रह सकता है.
झारखंड की केंद्र से गुहार
झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने भी फ्रीबीज के दम पर खूब वोट हासिल किया और राज्य में दूसरी बार सत्ता में वापसी की. झारखंड में मइया सम्मान योजना काफी लोकप्रिय रही. इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे की महिला को राज्य सरकार हर महीने 1000 रुपये दे रही थी. अब सरकार ने इसे बढ़ाकर 2500 कर दिया है.
सरकार बनने के बाद 6 जनवरी को सीएम हेमंत सोरेन ने जब इस स्कीम के तहत ताजा किस्त महिलाओं के खाते में ट्रांसफर की तो राज्य खजाने पर एक महीने के लिए इसका बोझ 1415.44 करोड़ रुपये था. झारखंड जैसे छोटे राज्य में इस स्कीम का बोझ राज्य के खजाने पर 16980 करोड़ रुपये सालाना है.
इस स्कीम के अलावा हेमंत राज्य के लोगों को मुफ्त बिजली भी दे रहे हैं. इसका भी बोझ खजाने पर पड़ा है. अब हेमंत सरकार ने केंद्र से 1.36 लाख करोड़ का फंड मांगा है. हेमंत का दावा है कि ये झारखंड से निकले कोयले की रॉयल्टी है जो केंद्र झारखंड को नहीं दे रही है.
फ्रीबीज और कल्याणकारी योजनाओं का अंतर
फ्रीबीज स्कीम की प्रकृति अगर थोड़ी सी बदल दी जाए तो ये योजनाएं हमेशा नकारात्मक नहीं होती है. अर्थशास्त्र के लिहाज से महिलाओं के खाते में सीधा नगद ट्रांसफर नॉन प्रोडक्टिव लग सकता है लेकिन अगर किसी महिला को पेशेवर ट्रेनिंग के लिए सरकार पैसा दे तो इसका असर सकारात्मक हो सकता है. लंबे समय तक दिया जाने वाला बेरोजगारी भत्ता भी अनुत्पादक लग सकता है लेकिन मेधावी छात्रों को दी जाने वाली स्कॉलरशिप समाज में नई प्रतिभा पैदा कर सकती है.
इसी तरह रेलवे टिकट पर दी जाने वाली सब्सिडी, खाद पर मिलने वाली सब्सिडी ऐसे मद हैं जिससे पूरा राष्ट्र प्रभावित होता है और लोगों की खर्च करने की शक्ति बढ़ती है.