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बैंकर....सिंगिंग और राजनीति, कुछ ऐसा है TMC में शामिल होने वाले बाबुल सुप्रियो का सफर

अब जैसा बाबुल सुप्रियो का राजनीतिक सफर रहा है, उसे देखते हुए कहना पड़ेगा कि उन्होंने समय-समय पर सभी को चौंकाया भी है और खुद अपने के लिए कई चुनौतियों को स्वीकार किया है. सिर्फ रानजीति में नहीं, बाबुल ने कई क्षेत्रों में अपनी काबिलियत को साबित किया है.

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TMC में शामिल होने वाले बाबुल सुप्रियो का सफर
TMC में शामिल होने वाले बाबुल सुप्रियो का सफर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कई क्षेत्रों में एक्सपेरिमेंट करने वाले बाबुल
  • बैंकर बन करियार की शुरुआत, संगीत ने दिलवाई पहचान
  • मोदी का उदय, सुप्रियो का राजनीतिक आगाज

जुलाई में बीजेपी और राजनीति दोनों को छोड़ने का दावा करने वाले बाबुल सुप्रियो ने बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है. उन्होंने शनिवार को सीएम ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन थाम लिया. उन्होंने फिर सक्रिय राजनीति में भी वापसी कर ली और अब एक नई पारी खेलने के लिए तैयार दिख रहे हैं.

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कई क्षेत्रों में एक्सपेरिमेंट करने वाले बाबुल

अब जैसा बाबुल सुप्रियो का राजनीतिक सफर रहा है, उसे देखते हुए कहना पड़ेगा कि उन्होंने समय-समय पर सभी को चौंकाया भी है और खुद अपने के लिए कई चुनौतियों को स्वीकार किया है. सिर्फ रानजीति में नहीं, बाबुल ने कई क्षेत्रों में अपनी काबिलियत को साबित किया है. ये बात कम ही लोग जानते हैं राजनेता और सिंगर के अलावा बाबुल सुप्रियो एक बैंकर भी रह चुके हैं. उन्होंने बकायदा एक बड़ी कंपनी संग काम कर रखा है.

बैंकर बन करियार की शुरुआत, संगीत ने दिलवाई पहचान

बाबुल ने अपने करियर की शुरुआत एक बड़े मल्टीनेशनल बैंक के साथ की थी. वहां पर उन्हें बैंकर की नौकरी मिल गई थी. सैलरी बढ़िया थी और वे काम भी अच्छा कर रहे थे. लेकिन उस नौकरी से बाबुल संतुष्ट नहीं थे, उनका मन कम ही लगता था. ऐसे में कुछ ही समय बाद बाबुल ने अपनी जिंदगी का पहला बड़ा फैसला ले लिया. उन्होंने एक अच्छी-खासी बैंक की नौकरी को त्याग दिया. 

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उस नौकरी को छोड़ बाबुल सुप्रियो ने खुद को संगीत क्षेत्र में डाल लिया. अब क्योंकि उनका पूरा परिवार भी गायकी से जुड़ा रहा है, ऐसे में बाबुल को इस क्षेत्र में ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा और उन्होंने कम समय में अपनी एक अलग पहचान बना ली. बाबुल ने बॉलीवुड फिल्मों में गाना गाया, बंगाली संगीत में अपना योगदान दिया और कई फिल्मों में बतौर एक्टर भी काम किया. ऐसे में राजनीति में आने से पहले ही बाबुल सुप्रियो अपने करियर में कई एक्सपेरिमेंट कर चुके थे.

मोदी का उदय, सुप्रियो का राजनीतिक आगाज

लेकिन फिर जब साल 2014 में मोदी युग शुरू होने जा रहा था, तब बाबुल सुप्रियो ने फिर अपनी जिंदगी में बड़ा फैसला लिया. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली और फिर बंगाल की आसनसोल सीट से चुानव भी लड़ा. पहला चुनाव था, लेकिन बाबुल ने पूरी ताकत झोंक दी. उस समय बंगाल में ममता का ही दबदबा था, वहां पर बीजेपी बतौर विपक्ष भी मजबूत नहीं थी. लेकिन तब बाबुल ने टीएमसी के गण में कमल खिलाने का काम कर दिया.

43 की उम्र में बना दिए गए मंत्री

2014 के चुनाव में बाबुल सुप्रियो ने आसनसोल सीट को 70 हजार वोटों से जीत लिया था. तब उन्होंने टीएमसी की डोला सेन को बुरी तरह हराया था. उनकी उस जीत को बीजेपी ने भी अच्छे से भुनाया था और बाबुल को 43 की उम्र में ही मंत्री बना दिया. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सबसे पहले बाबुल सुप्रियो को शहरी विकास, आवास मंत्रालय में राज्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. फिर 2016 में उन्हें भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम में बतौर राज्यमंत्री बनाया गया था. ऐसे में बीजेपी के अंदर सुप्रियो का कद लगातार बढ़ता रहा और क्योंकि वे बंगाल से आते थे, ऐसे में उन्हें काफी राजनीतिक तवज्जो भी दी गई.

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कैसे बीजेपी में बिगड़ा सुप्रियो का खेल?

लेकिन फिर आया सबसे बड़ा नाटकीय मोड़. इस साल हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की करारी हार हुई. अपना रिकॉर्ड जरूर सुधारा, लेकिन ममता की लहर को नहीं रोक पाई. बाबुल सुप्रियो भी अपनी सीट आसनसोल हार बैठे. ऐसे में हाईकमान में नाराजगी थी, वहां के स्थानीय नेताओं से भी तल्खी की खबरें आ रही थीं. आरोप- प्रत्यारोप का दौर था और सुप्रियो को भी हार के लिए जिम्मेदार बताया गया. यहां से बाबुल की नाराजगी शुरू हो गई थी. खुलकर कुछ नहीं बोल रहे थे, लेकिन रिश्तों में दरार थी.

सबसे बड़ा नाटकीय मोड़ कब आया?

इसके बाद जब मोदी सरकार ने अपना दूसरे कार्यकाल का पहला मंत्रिमंडल विस्तार करने का फैसला लिया, तब फिर बाबुल सुप्रियो को बड़ा झटका लगा. केंद्रीय मंत्री के पद से तो उनकी छुट्टी हुई ही, पार्टी में तवज्जो मिलना भी कम हो गया. उस मंत्रिमंडल विस्तार के कुछ दिन बाद ही बाबुल सुप्रियो ने राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया. एक लंबी फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्होंने जनता की सेवा और अपने भविष्य के प्लान के बारे में विस्तार से बताया.

लेकिन उस समय बाबुल ने टीएमसी में जाने की कोई इच्छा जाहिर नहीं की थी. ऐसे में अब जब उन्होंने टीएमसी का दामन थाम लिया है, तो इसे बीजेपी के लिए जरूर झटका माना जा रहा है, लेकिन सुप्रियो के लिए ये बंगाल की राजनीति में एक वापसी है.

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