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प्रणब मुखर्जीः वो राजनेता जो दो बार प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया!

सत्तर के दशक में सियासत में कदम रखने वाले प्रणब मुखर्जी केंद्र में वित्त, रक्षा, विदेश जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने के बाद जुलाई 2012 से जुलाई 2017 तक भारत के राष्ट्रपति रहे. उनके लंबे राजनीतिक करियर में 2 बार ऐसा दौर भी आया जब वो प्रधानमंत्री बनने के दावेदार थे लेकिन चूक गए.

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पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी (फाइल-पीटीआई)
पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी (फाइल-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2012 से 2017 के बीच देश के राष्ट्रपति रहे
  • मोदी सरकार ने पिछले साल भारत रत्न से नवाजा
  • इंदिरा गांधी के दौर में वित्त मंत्री रहे थे प्रणब दा
  • 1989 में समझौता के बाद कांग्रेस में लौटे

पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का लंबी बीमारी के बाद आज सोमवार को निधन हो गया. भारतीय राजनीति में छह दशकों का लंबा सफर तय करने वाले प्रणब ने राजधानी दिल्ली के सैन्य अस्पताल में अंतिम सांसें लीं. वे देश की सबसे कद्दावर राजनीतिक हस्तियों में से एक थे. उनके राजनीतिक जीवन में दो बार ऐसे मौके आए जब वे प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए. 

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सत्तर के दशक में सियासत में कदम रखने वाले प्रणब मुखर्जी केंद्र में वित्त, रक्षा, विदेश जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने के बाद जुलाई 2012 से जुलाई 2017 तक भारत के राष्ट्रपति रहे. मोदी सरकार ने देश के लिए उनके योगदान को सम्मान देते हुए उन्हें भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया.

प्रणब दा कांग्रेस के दिग्गज नेता थे. इसके बावजूद मोदी सरकार द्वारा उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए चुना जाना बताता है कि उनकी शख्सियत और कद पार्टी या विचारधारा से कितना ऊपर था.

इंदिरा गांधी ले आईं राजनीति में

प्रणब मुखर्जी ने 1969 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उंगली पकड़कर राजनीति में एंट्री ली थी. वे कांग्रेस टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए. 1973 में वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए और उन्हें औद्योगिक विकास विभाग में उपमंत्री की जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद वह 1975, 1981, 1993, 1999 में फिर राज्यसभा के लिए चुने गए. उनकी आत्मकथा में स्पष्ट है कि वो इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और जब आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार हुई तब इंदिरा गांधी के सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे थे.

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1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस के नेता बनाए गए. इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा. प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे. प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की कैबिनेट में वित्त मंत्री थे. 1984 में यूरोमनी मैगजीन ने प्रणब मुखर्जी को दुनिया के सबसे बेहतरीन वित्तमंत्री के तौर पर सम्मानित किया था. 


इंदिरा की मौत के बाद थे पीएम के दावेदार
वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश कहते हैं कि साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था. वे पीएम बनने की इच्छा भी रखते थे, लेकिन कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने प्रणब को किनारे करके राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया. इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी बंगाल के दौरे पर थे, वे एक ही साथ विमान से आनन-फानन में दिल्ली लौटे.

प्रणब मुखर्जी का ख्याल था कि वे कैबिनेट के सबसे सीनियर सदस्य हैं इसलिए उन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन राजीव गांधी के रिश्ते के भाई अरुण नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया. उन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का दांव चल दिया. पीएम बनने के बाद राजीव गांधी ने जब अपनी कैबिनेट बनाई तो उसमें जगदीश टाइटलर, अंबिका सोनी, अरुण नेहरू और अरुण सिंह जैसे युवा चेहरे थे, लेकिन इंदिरा गांधी की कैबिनेट में नंबर-2 रहे प्रणब मुखर्जी को मंत्री नहीं बनाया गया था.

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प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक वनवास 
राजीव कैबिनेट में जगह नहीं मिलने से दुखी होकर प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़ दी और अपनी अलग पार्टी बनाई. प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया, लेकिन ये पार्टी कोई खास असर नहीं दिखा सकी. जब तक राजीव गांधी सत्ता में रहे प्रणब मुखर्जी राजनीतिक वनवास में ही रहे. 

1989 में राजीव गांधी से विवाद का निपटारा होने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.

नरसिम्हा राव ने बनाया योजना आयोग का उपाध्यक्ष

साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तो प्रणब मुखर्जी का कद बढ़ा. राव उनसे सलाह-मशविरा तो करते रहे, लेकिन फिर भी उनको कैबिनेट में जगह नहीं दी गई. राव ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया और वे पांच साल तक इस पद पर रहे. नरसिम्हा राव के सत्ता में रहते हुए ही प्रणब मुखर्जी ने धीरे-धीरे कांग्रेस में अपना सियासी आधार फिर से मजबूत करना शुरू कर दिया.

पीएम नरसिम्हा राव के सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह राजनीतिक चुनौती पेश करने लगे थे. ऐसे में अर्जुन सिंह की काट से लिए राव ने प्रणब मुखर्जी को 1995 में विदेश मंत्री बनाने का दांव चला. हालांकि, राव सरकार का यह आखिरी साल था. इसके बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो 9 साल तक उसकी केंद्र में वापसी नहीं हो सकी.

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1998 में कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभाली तो प्रणब मुखर्जी उनके साथ मजबूती के साथ खड़े रहे.

सोनिया का इनकार, मनमोहन को मिला मौका

साल 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. 2004 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा तो उन्होंने ऐलान किया कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनेंगी. एक बार फिर से प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चाएं तेज हो गईं, लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का फैसला किया. इससे प्रणब मुखर्जी के हाथ से पीएम बनने का मौका एक बार फिर निकल गया.

हालांकि, इस दौरान प्रणब मुखर्जी ने वित्त से लेकर विदेश मंत्रालय तक का कार्यभार संभाला और पार्टी के संकट मोचक की भूमिका में रहे. 2012 में कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और वो देश के 13वें राष्ट्रपति चुने गए. पिछले साल 26 जनवरी को मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया.

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