बिहार का एक मंदिर जिसकी वजह से विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. ये वो भी जगह है जहां काशी नगर को बसाया जाना था लेकिन एक जौ बराबर (थोड़ी) जगह कम पड़ने के कारण काशी को बनारस जाना पड़ा. गुरु वशिष्ठ ने इस स्थान पर महादेव की पूजा की थी इन्हें वशिशेश्वर महादेव कहा जाता है. कालांतर में ये बटेश्वर महादेव कहलाए. यहां गंगा महादेव को पखारने के लिए उत्तरवाहिनी कैसे होती है ये अद्भुत छांटा देखने के लायक है. पटना से 300 किलोमीटर दूर कहलगांव में तंत्र विद्या के लिये बेहद उपयुक्त स्थान जिसे गुप्त काशी भी कहा जाता है.
ऋषियों की तपोभूमि रही है कहलगांव की धरती
भागलपुर का कहलगांव किसी जमाने में ऋषियों की तपोभूमि रही है. इस इलाके में गुरु वशिष्ठ, ऋषि दुर्वासा और ऋषि कोहल ने तपस्या की थी. ऋषि कोहल के नाम से इस क्षेत्र का नाम कहलगांव पड़ा. दुर्वासा की यह तपोभूमि रही है. ऋषि वशिष्ठ के द्वारा स्थापित महादेव आज बटेश्वर महादेव के नाम से जाने जाते है. यह स्थल कितना पवित्र है इसकी चर्चा पुराणों में उल्लेखित है. यहां 40 किलोमीटर गंगा उत्तरायणी बहती है. पहाड़ है, जंगल है और श्मशान घाट भी.
महादेव बटेश्वर नाथ मंदिर के ठीक सामने मां काली का मंदिर है. महादेव के सामने मां काली के मंदिर का संयोग देश मे कहीं नहीं मिलता है. प्राचीनकाल में यह तंत्र विद्या का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था. दूर-दूर से लोग यहां तंत्र विद्या की सिद्धि प्राप्त करने के लिये आते थे. इस जगह की सिद्धि को देखते हुए बटेश्वर मंदिर से 3 किलोमीटर दूर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. जिसमें तंत्र विद्या की पढ़ाई होती थी.
न्याय दर्शन और तंत्र विद्या के अध्ययन की विशेष व्यवस्था
पाल राजवंश के द्वारा इस विश्वविद्यालय की स्थापना 8वीं शताब्दी में हुई थी जिसमें लगभग 160 विहार थे. इस विश्वविद्यालय में व्याकरण न्याय दर्शन और तंत्र विद्या के अध्ययन की विशेष व्यवस्था थी. नालंदा विश्वविद्यालय की तरह इसे भी बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था. मंदिर के पंडित राजेन्द्र झा कहते हैं कि वशिष्ठ ऋषि के द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा करने से अनेक फलों की प्राप्ति होती है. मनुष्य सारे पापों से मुक्त हो जाता है. उन्होंने बताया कि देश में कहीं भी महादेव के सामने काली मंदिर नहीं है लेकिन तंत्र विद्या का प्रमुख केंद्र होने के कारण यहां मां काली स्थापित हैं.
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बताया यह जाता है कि इस जगह को भगवान शिव की नगरी काशी के रूप में बसाया जाना था लेकिन जौ बराबर भूमि कम पड़ जाने के कारण काशी को बनारस के पास बसाया गया. इसकी चर्चा भी पुराणों में है. मंदिर के पुजारी कलेन्द्रा झा का कहना है कि इस जगह पर गुरु वशिष्ठ तपस्या किये हैं और यहां गुरु वशिष्ठ, गुरु दुर्वासा ऋषि और कोहल ऋषि तीनों का तीन आश्रम बना हुआ है.
गुरु वशिष्ठ ने की थी प्रथम पूजा
प्रथम पूजा गुरु वशिष्ठ ने की थी. उन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम वशिष्ठश्वरनाथ पड़ा. इस जगह 40 किलोमीटर उत्तरवाहिनी गंगा है. सामने श्मशान घाट और उसी के सामने काली. पहले तन्त्र विद्या की पढ़ाई होती थी जो विक्रमशिला के नाम से विख्यात है. इस मंदिर का पहली बार 1216 में जीर्णेधार हुआ है. इन्ही के द्वारा विक्रमशिला बना जहां तन्त्र विद्या की पढ़ाई होती थी.
कोहल ऋषि के नाम पर पड़ा गांव का नाम
कोहल ऋषि ने गंगा किनारे अपना आश्रम बनाया था, उन्हीं के नाम पर कहलगांव का नाम पड़ा. यह पहले काशी बनने वाला था लेकिन काशी बनने में कुछ जगह कम पड़ गई तो काशी वहां चला गया और गुप्त काशी यहां रह गया. यहां उत्तरवाहनी गंगा ज्यादा पाई जाती हैं. वटेश्वरनाथ को ज्यादा भीड़ भाड़ यहां पसंद नहीं है. साल में लगने वाला दो मेले एक दो दिन से ज्यादा नहीं चलते हैं. कोई न कोई व्यवधान उत्पन्न हो जाता है.
इस मंदिर के एक और पुजारी वीरेन्द्र झा का कहना है कि हर तीर्थ से यह शांत जगह है. ये तांत्रिक स्थल है. यह शंकर जी शांति चाहते हैं. यह अशांति नहीं रहती हैं. चहल पहल नहीं रहता है. आचार्य़ अशोक शुक्ला यहा प्राय साधना के लिए आते हैं. उनका कहना है कि यह बाबा भोले नाथ का अति सुंदर और रमणीय स्थल है जो बाबा बटेस्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध है. इस मंदिर का पुराणों में वर्णन है. अब भी इस स्थल पर जो भी भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं. भगवान उसको सिद्ध करते हैं.
एक और साधक उदय शंकर मिश्रा ने कहा कि यह रमणीय स्थान है. यहां तंत्र-मंत्र कर सकते हैं और उससे फल की प्राप्ति होती है और कोई भी रोगी व्यक्ति गंगा में स्नान करके बाबा का जलार्पण करता है तो उसका रोग ठीक हो जाता है. ये बाबा की असीम महिमा है और कृपा है.