गुजरात के बिलकिस बानो केस में 11 दोषियों को रेमिशन पॉलिसी के तहत जेल से रिहा कर दिया गया है. इसको लेकर पीड़ित पक्ष की ओर से लगातार मांग की जा रही है कि ये अन्याय है और रेप और मर्डर के दोषियों को समय से पहले जेल से रिहा नहीं किया सकता, लेकिन सरकार इस पर कोई जवाब नहीं दे रही है. करीब एक दशक पहले मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने रेमिशन पॉलिसी के तहत छूटे दोषियों को वापस गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया था.
बिलकिस बानो के दोषियों को जेल से रिहा करने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, लेकिन करीब एक दशक पहले एमपी में सिमी के 5 कार्यकर्ताओं को फिर से गिरफ्तार करने का आदेश दिया गया था, जिन्हें गणतंत्र दिवस पर छूट नीति के तहत जेल से रिहा कर दिया गया था. साल 2011 में एमपी की जेलों से करीब 600 कैदियों को रिहा किया गया था, इनमें SIMI के भी 5 सदस्य शामिल थे. जिन्होंने जेल में रहने के दौरान आधे से ज्यादा सजा पूरी की थी.
बिलकिस के 11 दोषियों को फिर से गिरफ्तार करने की मांग पर गुजरात सरकार की मौन प्रतिक्रिया के विपरीत एमपी सरकार ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया था. दक्षिणपंथी संगठनों ने राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल तत्वों की समय से पहले रिहाई के लिए जेल अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की भी धमकी दी थी.
साल 2008 में प्रशिक्षण शिविर किया था आयोजित
साल 2008 में उज्जैन जिले के उनहेल में एक प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने के लिए प्रतिबंधित संगठन के 5 सदस्यों को 5 साल जेल की सजा सुनाई गई थी. वे पहले ही 31 महीने से अधिक जेल में बिताने के बाद छूट के पात्र हो गए थे. जेल विभाग ने केवल एक स्थायी आदेश पर कार्रवाई की थी, जो पहली बार एक दशक पहले जारी किया गया था.
9 दिन बाद कर लिया गया गिरफ्तार
शिवराज सरकार सड़क पर विरोध प्रदर्शनों से शर्मिंदा थी, जो उसके हिंदुत्व की साख पर सवाल उठा रहे थे और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मालवा क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय का विरोध नहीं करना चाहती थी. दक्षिणपंथी संगठनों का ये विरोध प्रदर्शन इंदौर, उज्जैन समेत कई शहरों में फैल गया था. चौहान सरकार ने दबाव में आकर नियमों का उल्लंघन करते हुए 5 कार्यकर्ताओं की रिहाई के 9 दिन बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार करने का आदेश दिया. विरोध शुरू होने के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस को अलर्ट पर रखा गया और सिमी सदस्यों को बिना अनुमति के अपने घरों से बाहर नहीं निकलने को कहा गया.
अधिकारियों का भी किया गया था ट्रांसफर
अगले 9 दिनों तक उन्हें रोजाना स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना पड़ा और कई घंटों की पूछताछ के बाद ही वे घर लौट सके. जब विरोध शांत नहीं हुआ, तो पुलिस ने पांचों को उनके घरों से उठाकर परिवार के सदस्यों से कहा कि 'हम पर भरोसा करें हम उन्हें जल्द ही वापस लाएंगे.' परिवारों ने सोचा कि वे रात तक लौट आएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सरकार इतनी सक्रिय थी कि उसने न केवल सिमी सदस्यों को बची सजा को पूरा करने के लिए वापस जेल भेज दिया, बल्कि वरिष्ठ पुलिस और जेल अधिकारियों के साथ-साथ एक नौकरशाह का तबादला कर दिया. जेल के एक कनिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर दिया गया था. इन 5 को छोड़कर बाकी सभी ने समय से पहले रिहाई का आनंद लिया.
रेमिशन पॉलिसी में किया गया बदलाव
नियमों को पूर्वव्यापी प्रभाव से बदल दिया गया था और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए लोगों को माफी के लिए अपात्र बना दिया गया था. अधिकारी इतने डरे हुए थे कि छोटे-मोटे अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए और बुढ़ापे तक पहुंचने वालों को भी विवाद के बाद लंबे समय तक क्षमा से वंचित कर दिया गया था. हालांकि, सरकार की शर्मिंदगी खत्म नहीं हुई थी क्योंकि छह महीने बाद उच्च न्यायालय ने सिमी सदस्यों की फिर से गिरफ्तारी को कानून का घोर उल्लंघन बताया और उनकी रिहाई का आदेश दिया.
पाकिस्तानी नागरिक भी हुआ था गिरफ्तार
संयोग से पकड़ा गया एक पाकिस्तानी नागरिक भी छिंदवाड़ा जेल में बंद था. उसे जेल से रिहा कर दिया गया था और वह वापस पाकिस्तान भेजे जाने की प्रतीक्षा कर रहा था. बाद में उसको भी गिरफ्तार कर लिया गया और 18 महीने की जेल की अवधि पूरी करने के लिए कहा गया. रिहा होने के समय उसने 16 महीने जेल में बिताए थे. पुलिस ने सोचा कि वह एक जासूस था लेकिन मामले को साबित नहीं कर सका और उसे जाली पासपोर्ट ले जाने के लिए दोषी ठहराया गया था.
दोषियों की छूट को ठहराया उचित
इसके विपरीत गुजरात सरकार ने दोषियों को वापस जेल भेजने की मांग का जवाब देने के बजाय चुनावी साल में विरोध की आवाज को लगभग नजरअंदाज कर दिया. यहां तक कि एक भाजपा नेता ने कुछ दोषियों को 'सुसंस्कृत' कहा. फिर यह कहते हुए छूट को उचित ठहराया कि यह कानून के मुताबिक है. इसके साथ ही कहा कि याचिकाकर्ताओं को रेमिशन पॉलिसी के विरोध में जाने का अधिकार नहीं है. अब इस पर फैसला लेने के लिए शीर्ष अदालत का इंतजार है.
(मिलिंद घटवई)