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'खतरनाक कुत्तों' की नस्लों के बैन से जुड़े मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से मांगा जवाब

पुणे स्थित गैर सरकारी संगठन 'एनिमल रेस्क्यू ट्रस्ट' द्वारा दायर एक जनहित याचिका में हाई कोर्ट से खतरनाक नस्ल वाले कुत्तों की बिक्री रोकने वाले सर्कुलर को रद्द करने और इसके इम्प्लीमेंटेशन पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इसमें कहा गया था कि इस कदम से ऐसी नस्लों के खिलाफ क्रूरता बढ़ सकती है.

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खतरनाक कुत्तों की नस्लें (प्रतीकात्मक फोटो)
खतरनाक कुत्तों की नस्लें (प्रतीकात्मक फोटो)

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने गुरुवार को 'खतरनाक' कुत्तों की 23 नस्लों पर बैन लगाने की मांग के खिलाफ जनहित याचिका पर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है. मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय (पशुपालन और डेयरी विभाग) ने 12 मार्च को एक सर्कुलर जारी कर राज्यों से यह तय करने के लिए कहा कि ह्यूमन लाइफ के लिए खतरनाक कुत्तों की कुछ नस्लों की बिक्री, प्रजनन और रखने के लिए कोई लाइसेंस या अनुमति जारी ना की जाए.

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एजेंसी के मुताबिक पुणे स्थित गैर सरकारी संगठन 'एनिमल रेस्क्यू ट्रस्ट' द्वारा दायर एक जनहित याचिका में हाई कोर्ट से सर्कुलर को रद्द करने और इसके इम्प्लीमेंटेशन पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इसमें कहा गया था कि इस कदम से ऐसी नस्लों के खिलाफ क्रूरता बढ़ सकती है.

चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस आरिफ डॉक्टर की बेंच ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और 24 जून तक मामले पर जवाब मांगा है.

याचिकाकर्ता ने बेंच से सर्कुलर पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है. हालांकि, बेंच ने कहा कि कलकत्ता हाई कोर्ट ने पहले ही परिपत्र पर आंशिक रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा कि उस परिपत्र के आधार पर महाराष्ट्र में किसी भी अथॉरिटी द्वारा कोई और कार्यकारी आदेश या निर्णय नहीं लिया गया है. हम पहले यह देखना चाहते हैं कि केंद्र सरकार इस पर क्या कहना चाहती है.

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जनहित याचिका में क्या कहा गया है?

जनहित याचिका में दावा किया गया कि सभी हितधारकों से सुझाव लिए बिना 23 नस्लों के कुत्तों पर बैन लगाया गया है. इसके अलावा जनहित याचिका में कहा गया है कि सर्कुलर इन नस्लों की क्रूरता के किसी भी वैज्ञानिक प्रमाण के बिना गैर-तथ्यात्मक है और हाल में हुई कुत्तों के काटने की घटनाओं पर आधारित है.

इसमें कहा गया है कि परिपत्र को चुनौती देने वाली अन्य उच्च न्यायालयों में भी इसी तरह की याचिकाएं दायर की गई हैं. कुछ अदालतों ने परिपत्र के इम्प्लीमेंटेशन पर रोक लगा दी है. याचिका में कहा गया है कि बैन लगाने का फैसला मनमाना है और दावा किया गया है कि इसमें किसी साइंटिफिक स्टडी और साक्ष्य का अभाव है. इस तरह के प्रतिबंध से ऐसी नस्लों के खिलाफ क्रूरता बढ़ जाएगी.
 

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