कावेरी नदी के पानी को लेकर दो राज्य कर्नाटक और तमिलनाडु एक बार फिर आमने-सामने है. मामले को लेकर तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. दरअसल, तमिलनाडु सरकार की मांग है कि 10 दिनों के लिए 24 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जाए तो वहीं कर्नाटक सरकार ने 3 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का फैसला किया है. इसको लेकर बुधवार को कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है.
कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करते हुए कहा कि कृष्णा और कावेरी नदियों में पानी की भारी कमी है. इसके चलते कर्नाटक राज्य पर भारी बोझ पड़ रहा है. 12 सितंबर के बाद तमिलनाडु को और पानी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इससे कर्नाटक राज्य की जरूरत को खतरा होगा. वह अपनी वर्तमान समस्याओं के लिए तमिलनाडु राज्य को दोषी मानते हैं. प्रतिदिन 24000 क्यूसेक पानी की आपूर्ति की मांग पूरी तरह से अनुचित है.
कर्नाटक का कहना है कि 12 सितंबर, 2023 के बाद तमिलनाडु को कोई पानी नहीं छोड़ा जा सकता. कर्नाटक का कहना है कि उसने तमिलनाडु को दिए जाने वाले पानी की मात्रा को 5000 क्यूसेक से घटाकर 3000 क्यूसेक प्रतिदिन करने के लिए सीडब्ल्यूएमए के समक्ष समीक्षा दायर की है. बारिश की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. जलाशयों के प्रवाह में भारी कमी आई है. कावेरी, कृष्णा बेसिन में सूखे जैसी स्थिति है.
कावेरी नदी की जियोग्राफी क्या है?
- कावेरी नदी के जल विवाद का लंबा इतिहास रहा है. कावेरी नदी कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलती है और तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है.
- कावेरी घाटी में हिस्सा केरल का है और समंदर में मिलने से पहले ये पुडुचेरी के कराइकाल से होकर गुजरती है.
- कावेरी नदी की लंबाई तकरीबन 750 किलोमीटर है. ये नदी कुशालनगर, मैसूर, श्रीरंगापटना, त्रिरुचिरापल्ली, तंजावुर और मइलादुथुरई जैसे शहरों से गुजरती हुई तमिलनाडु से बंगाल की खाड़ी में गिरती है.
- कावेरी के बेसिन में कर्नाटक का 32 हजार वर्ग किमी और तमिलनाडु का 44 हजार वर्ग किमी का इलाका शामिल है. ये दोनों ही राज्य सिंचाई के पानी की जरूरत की वजह से कावेरी के मुद्दे पर दशकों तक लड़ते रहे.
पर क्या है इसे लेकर विवाद?
- दोनों राज्यों के बीच ये विवाद 140 साल से भी ज्यादा पुराना है. सबसे पहले साल 1881 में ये विवाद तब शुरू हुआ, जब तत्कालीन मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) ने कावेरी नदी पर बांध बनाने का फैसला किया. लेकिन मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) ने इस पर आपत्ति जताई.
- करीब चालीस साल तक ऐसे ही विवाद चलता रहा. फिर 1924 में ब्रिटिशर्स की मदद से एक समझौता हुआ. समझौते के तहत, कर्नाटक को कावेरी नदी का 177 TMC और तमिलनाडु को 556 TMC पानी मिला. TMC यानी, हजार मिलियन क्यूबिक फीट. लेकिन विवाद पूरी तरह नहीं सुलझ सका.
- आजादी के बाद 1972 में केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कावेरी नदी के चारों दावेदारों के बीच 1976 में एक समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते का पालन नहीं हुआ और विवाद चलता रहा.
- 90 के दशक में विवाद बढ़ता चला गया. तो 2 जून 1990 को कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल (CWDT) का गठन किया गया. इस ट्रिब्यूनल ने साल 2007 में अपना फैसला दिया.