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ED की पावर पर लगी 'सुप्रीम' मोहर, जानें- क्यों अपराधियों को CBI से ज्यादा इससे लगेगा डर

CBI v/s ED: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने फैसले में साफ कर दिया कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ED का किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना, उसकी संपत्ति जब्त या कुर्क करना, और छापा मारना कानूनन सही है. सुप्रीम कोर्ट में PMLA यानी प्रिवेन्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग के प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी. इसी पर अदालत ने फैसला सुनाया है.

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CBI और ED देश की दो बड़ी कानूनी एजेंसियां हैं. (फाइल फोटो)
CBI और ED देश की दो बड़ी कानूनी एजेंसियां हैं. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 1956 में हुई थी प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना
  • PMLA, FEMA के तहत करती है कार्रवाई

CBI v/s ED: देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि ED का किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना, उसकी संपत्ति जब्त या कुर्क करना, छापा मारना कानूनन सही है. सुप्रीम कोर्ट में PMLA यानी प्रिवेन्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग के प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी. इसी पर अदालत ने फैसला सुनाया है. कोर्ट ने ये भी कहा कि ED किसी को गिरफ्तार करती है तो उसे आरोपी को ECIR यानी रिपोर्ट की कॉपी देना भी जरूरी नहीं है, सिर्फ कारण बता देना काफी है. 

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जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रवि कुमार की बेंच ने 243 याचिकाओं पर बुधवार को 545 पन्नों का ये फैसला सुनाया. बेंच ने ED के मनी लॉन्ड्रिंग की जांच, छापेमारी, बयान दर्ज करने, गिरफ्तार करने और समन जारी करने के अधिकारों को सही बताया. PMLA में 2018 में हुए कुछ संशोधनों को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. अदालत ने इस पर कोई फैसला नहीं दिया है. इस मामले को 7 जजों की बेंच को ट्रांसफर कर दिया है. 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ED इस देश की सबसे ताकतवर एजेंसी है. CBI यानी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन जो कि अपराधियों में खौफ का दूसरा नाम है और किसी अपराध से पीड़ितों का आखिरी भरोसा, वो भी अधिकारों के मामले में अब ED से कमतर नजर आती है. जबकि, CBI का गठन ED से पहले हो गया था. 

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CBI v/s ED: क्या है इतिहास?

CBI

- दूसरे विश्व युद्ध के समय भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए 1941 में ब्रिटिश सरकार स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट का गठन किया गया. 1943 में फिर स्पेशल पुलिस फोर्स का गठन हुआ.

- युद्ध खत्म होने के बाद 1946 में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू किया गया. तब इसे स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट ही कहा जाता था. 1963 में इसका नाम सीबीआई रखा गया.

ED

- 1947 में फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट (FERA) लागू हुआ. इसी के तहत 1 मई 1956 को ED की स्थापना की गई. पहले इसका नाम इन्फोर्समेंट यूनिट था, बाद में इन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट हुआ.

- शुरुआत में ED का काम विदेशों में चल रहे एक्सचेंज मार्केट में लेनदेन कर रहे लोगों की जांच करना था. बाद में FEMA, PMLA, FEOA जैसे कानून आए और ED की ताकत बढ़ती गई.

CBI v/s ED: क्या है इनका काम?

CBI

- भ्रष्टाचार से निपटनाः केंद्रीय कर्मचारियों के भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों से निपटना.

- आर्थिक अपराध से निपटनाः बैंक धोखाधड़ी, विदेशी मुद्रा उल्लंघन और तस्करी से निपटना.

- विशेष अपराध से निपटनाः आतंकवाद, संवेदनात्मक हत्याएं और अन्य अपराध से निपटना.

ED

- मनी लॉन्ड्रिंग रोकनाः पैसों की हेराफेरी कर कमाई गई संपत्ति की जांच करना और उसे जब्त करना. 

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- विदेशी मुद्रा कानून का उल्लंघन रोकनाः एक्सचेंज कंट्रोल कानूनों के उल्लंघन के मामलों की जांच करना.

- भगौड़े अपराधियों पर शिकंजाः विदेश भाग चुके अपराधियों की संपत्तियों को कुर्क करना.

CBI v/s ED: कब मिलती है जांच?

CBI

- ये केंद्र के अधीन है, लेकिन ये किसी मामले की जांच तभी करती है जब केंद्र से या हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट से आदेश मिलता है. मामला किसी राज्य का है, तो जांच के लिए वहां की राज्य सरकार की अनुमति जरूरी होती है.

ED

- किसी पुलिस थाने में 1 करोड़ या उससे ज्यादा की गलत कमाई का केस दर्ज हुआ तो पुलिस ED को इसकी सूचना देती है. इसके अलावा ED संज्ञान लेते हुए थाने से FIR या चार्जशीट की कॉपी मंगवाकर जांच शुरू कर सकती है.

CBI v/s ED: गिरफ्तारी का अधिकार?

CBI 

- किसी भी पब्लिक सर्वेंट को गिरफ्तार कर सकती है, जब जांच के लिए उसे गिरफ्तार किया जाना जरूरी है या जब एजेंसी को लगे कि आरोपी भाग सकता है या सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है. CBI बिना वारंट के भी गिरफ्तार कर सकती है.

ED

- PMLA के तहत, ED को संपत्ति जब्त करने, गिरफ्तार करने और छापा मारने का अधिकार मिला है. एजेंसी किसी से पूछताछ किए बिना भी उसकी संपत्ति जब्त कर सकती है. ED को गिरफ्तारी के समय सिर्फ कारण बताना होता है. ऐसी गिरफ्तारी में जमानत मिलना काफी मुश्किल हो जाता है.

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CBI v/s ED: कैसा है ट्रैक रिकॉर्ड?

CBI

- 2012 से 2021 तक 10 साल में 7,932 केस दर्ज किए. इनमें 5,257 मामलों में दोष साबित हो चुका है.

ED

- PMLA के तहत 2005 से 31 मार्च 2022 तक 5,422 केस दर्ज किए, जिनमें 23 लोग दोषी ठहराए गए.

सोर्सः लोकसभा में सरकार की ओर से दी गई जानकारी

दिल्ली से महाराष्ट्र-झारखंड तक ED का शिकंजा

- दिल्लीः नेशनल हेराल्ड के मामले में ED ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पूछताछ की. उनसे पहले राहुल गांधी से भी घंटों तक पूछताछ की थी. ये विवाद करोड़ों रुपये की जायदाद पर मालिकाना हक का है.

- दिल्लीः राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया. अप्रैल में उनकी 4.81 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की.

- पश्चिम बंगालः शिक्षक भर्ती घोटाले में राज्य के मंत्री पार्थ चटर्जी को 23 जुलाई को गिरफ्तार किया. उनकी करीबी के घर से 40 करोड़ रुपये मिले.

- झारखंडः अवैध खनन मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा समेत कई लोगों के यहां छापे में 5.34 करोड़ रुपये मिले.

- झारखंडः आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल, उनके कारोबारी पति और सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी में 19.76 करोड़ रुपये बरामद.

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- महाराष्ट्रः उद्धव सरकार में मंत्री रहे शिवसेना और एनसीपी के कई नेताओं पर FIR दर्ज की. अनिल देशमुख और नवाब मलिक अभी भी जेल में.

एक्सपर्ट की क्या है राय?

- सुप्रीम कोर्ट के वकील असगर खान ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि ED का काम संवैधानिक उल्लंघन नहीं है. कोर्ट ने फैसले में कई और एजेंसियों का जिक्र भी किया है, जो CRPC के दायरे में नहीं आतीं. कोर्ट ने माना है कि ED थानों की पुलिस नहीं है, वो दूसरी एजेंसियों से बिल्कुल अलग है. ED को गिरफ्तारी के वक्त ये बताने की जरूरत नहीं है कि आरोपी को PMLA के तहत क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है? या क्या आरोप लगे हैं?

- असगर खान बताते हैं कि जहां तक गिरफ्तारी के समय रिपोर्ट की कॉपी देने की बात है, तो CRPC के तहत पुलिस आरोपी को FIR की कॉपी देने के लिए बाध्य है. लेकिन ED के साथ ऐसा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि ED की कार्रवाई आर्टिकल 21 (फ्रीडम ऑफ लिबर्टी) का उल्लंघन नहीं है.

- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अजय अग्रवाल बताते हैं कि ED हमेशा से ताकतवर थी, लेकिन पहले वो अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करती थी. ED को PMLA से ताकत मिलती है. कारोबारियों के अलावा ब्यूरोक्रेट्स, बड़े नेता भी इसकी जद में हैं. पहले CBI का नाम ज्यादा दिखता था, लेकिन अब ED का काम दिख रहा है.

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- वो कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी किसी एजेंसी के कामकाज में दखल नहीं दिया. अगर कोई जांच एजेंसी अवैध काम करेगी, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकती है. अगर ED भी कानून के दायरे से बाहर काम करती है, तो उसके खिलाफ भी अदालत में जाया जा सकता है.

 

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