छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्रों में इंसान और वन्यजीव संघर्ष में हो रही लगातार वृद्धि से गंभीर स्थिति पैदा हो गई है, जहां लगभग हर हफ्ते जानलेवा घटनाएं सामने आ रही हैं. वन्यजीव विभाग के सूत्रों के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में ऐसी मुठभेड़ों में लगभग 595 लोगों की जान चली गई है, जिसमें वार्षिक औसत 54 मौतें हैं. हाल के वर्षों में स्थिति और खराब हो गई है.
हाल ही में हुए एक हृदयविदारक हादसे में पांडो जनजाति के दो मासूम बच्चे, 11 वर्षीय दिशु और पांच वर्षीय काजल की हाथियों के हमले में मौत हो गई. यह घटना सरगुजा जिले में घटी, जब हाथियों के एक झुंड ने रात में उनके घर पर हमला कर दिया. इस हमले में बच्चों के माता-पिता भागने में सफल रहे, लेकिन हाथियों ने बच्चों को कुचल कर मार डाला. छत्तीसगढ़ वन विभाग और पुलिस ने इस घटना की पुष्टि करते हुए बच्चों के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है. परिजनों को शुरुआती मुआवजा दिया गया है और आगे की औपचारिकताएं पूरी होने पर अतिरिक्त मुआवजा दिया जाएगा.
ये जिले हैं प्रभावित
यह घटना अकेली नहीं है. छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष चिंताजनक रूप से बढ़ता जा रहा है. जिससे सरगुजा, रायगढ़, कोरबा, सुरजपुर, महासमुंद, धमतरी, गरियाबंद और बालोद जैसे जिले गंभीर रूप से प्रभावित हैं.
11 साल में 595 लोगों की मौत
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में लगभग 595 लोग इन संघर्षों में मारे जा चुके हैं, जिसमें प्रतिवर्ष औसतन 54 मौतें हुईं हैं. हाल के सालों में स्थिति और बिगड़ गई है. साल 2021-22 में 95 लोगों की मौत हुई थी और इसके बाद दो सालों में भी लगभग 77 मौतें दर्ज की गईं हैं, जबकि साल 2024 में अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है.
कारगर साबित नहीं हुई मिर्च तकनीक
इन संघर्षों को रोकने के प्रयास से अभी तक कोई भी प्रभावी समाधान नहीं निकाला सका है. हाथियों को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा अपनाई गई ‘मिर्च तकनीक’, जिसमें मिर्च का धुआं कर हाथियों को भगाने का प्रयास किया जाता है. विभाग की ये तकनीक हाथियों को रोकने में नाकाम साबित हुई है. यह तकनीक कभी-कभी हाथियों को और अधिक आक्रामक बना देती है, जिससे लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है. यह स्थिति अधिक प्रभावी और मानवीय रणनीतियों की आवश्यकता को उजागर करती है.