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'कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं...', NLSIU में बोले CJI सूर्यकांत

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को न्याय, स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की अपील की.

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CJI सूर्यकांत बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में अपना संबोधन दिया
CJI सूर्यकांत बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में अपना संबोधन दिया

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के दीक्षांत समारोह में दिवंगत छात्रा उर्वशी कृष्णात्रा को श्रद्धांजलि दी. उर्वशी ने यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी, लेकिन दीक्षांत समारोह से कुछ समय पहले उनका निधन हो गया. सीजेआई ने कहा कि उर्वशी को आज यहां अपने सहपाठियों के साथ डिग्री हासिल करनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से वह अब हमारे बीच नहीं हैं.

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे सीजेआई सूर्यकांत ने अपने संबोधन के दौरान दिवंगत छात्रा उर्वशी कृष्णात्रा को याद किया. उन्होंने छात्रा के निधन पर दुख जताते हुए उनके परिवार और दोस्तों के प्रति संवेदना व्यक्त की.

 'उर्वशी को आज यहां अपने साथियों के बीच होना चाहिए था'

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'आइए, हम कुछ पल निकालकर उर्वशी कृष्णात्रा को भी याद करें. वह NLS परिवार की एक युवा और ऊर्जावान सदस्य थीं और उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी. दुर्भाग्य से वह अब हमारे बीच नहीं हैं.'

उन्होंने आगे कहा, 'उन्हें आज यहां होना चाहिए था. अपने सहपाठियों के साथ इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की खुशी साझा करते हुए अपनी मेहनत से अर्जित डिग्री प्राप्त करनी चाहिए थी.'

सीजेआई ने कहा, 'यहां उपस्थित सभी लोगों की ओर से मैं उनके परिवार और दोस्तों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं. उनके साथ बिताए पलों की यादें परिवार और दोस्तों को हमेशा शक्ति और सांत्वना देती रहें.'

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'कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं'

इस दौरान चीफ जस्टिस ने कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को उनके भविष्य की जिम्मेदारियों के बारे में भी बताया. उन्होंने कहा कि कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है. इसमें केवल कानून की धाराओं और पुराने न्यायिक फैसलों की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है.

सीजेआई ने कहा, 'मैं अक्सर इस बात पर विचार करता हूं कि कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है. इसमें केवल कानून और न्यायिक मिसालों पर महारत हासिल करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि जो न्यायसंगत है, उसके पक्ष में खड़े होने का साहस और उन लोगों की आवाज सुनने की विनम्रता भी जरूरी है, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं.'

उन्होंने कहा कि बौद्धिक स्वतंत्रता के साथ निष्पक्षता भी जरूरी है. किसी के बारे में फैसला लेने से पहले उसकी बात सुननी चाहिए. किसी व्यक्ति और उसके विचारों के बीच अंतर करना चाहिए. असहमति जताते समय भी दूसरे व्यक्ति की गरिमा का सम्मान बनाए रखना चाहिए.

'कानून एक जीवंत संवाद है'

चीफ जस्टिस ने कहा कि यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान छात्र अलग-अलग पृष्ठभूमि, मान्यताओं और विचारों वाले लोगों के साथ रहते हैं. कई बार उनके विचार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, लेकिन यही विविधता उन्हें कानून को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है.

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उन्होंने कहा कि जब हम अपने विचारों से अलग नजरिया रखने वाले लोगों की बात सुनते हैं, तो हमें याद आता है कि कानून अपने आप में एक जीवंत संवाद है. इसमें अलग-अलग आवाजें हमेशा एक जैसी नहीं होतीं, लेकिन मिलकर न्याय की एक सामूहिक अभिव्यक्ति तैयार करती हैं.

'संविधान की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी'

सीजेआई सूर्यकांत ने छात्रों से कहा कि यूनिवर्सिटी से निकलने के बाद वे केवल एक पेशे में कदम नहीं रख रहे हैं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, 'जब आप इस परिसर से बाहर निकलेंगे, तो केवल एक पेशे में प्रवेश नहीं करेंगे, बल्कि लोगों की सेवा करने और उनकी स्वायत्तता की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी संभालेंगे.'

चीफ जस्टिस ने कहा कि कानूनी पेशा उनके धैर्य की परीक्षा लेगा, नैतिक मूल्यों को चुनौती देगा और कई बार उनसे असाधारण साहस की अपेक्षा करेगा. हालांकि, यही पेशा उन्हें अन्याय दूर करने, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान के मूल्यों को बनाए रखने का संतोष भी देगा.

 'कानून की पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं'

सीजेआई ने कहा कि NLSIU में छात्रों की शैक्षणिक यात्रा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही है. इसने उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया है.

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उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे में हर दिन नई जटिलताएं सामने आती हैं. ऐसे में बौद्धिक क्षमता के साथ नैतिक जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है.

सीजेआई के मुताबिक, यूनिवर्सिटी में बिताए वर्षों ने छात्रों में विश्लेषण करने, बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और अपनी बात मजबूती से रखने की क्षमता विकसित की है. साथ ही उन्हें दबाव का सामना करने, जटिल परिस्थितियों को समझने और चुनौतियों के बीच अपने सिद्धांतों पर कायम रहने का साहस भी दिया है.

(NOTE: इससे पहले प्रकाशित खबर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के भाषण की उस कॉपी पर आधारित थी, जो आधिकारिक सूत्रों ने इंडिया टुडे/आजतक के साथ शेयर की थी. बाद में सीजेआई की ओर से जारी किए गए मूल भाषण का संशोधित वर्जन उपलब्ध कराया गया. इसके आधार पर खबर में आवश्यक संशोधन किए गए हैं.)

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