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सुंदर बने घर, रीक्रिएशनल सुविधाएं और सड़कें....ये सभी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास चीन की तरफ मौजूद हैं और सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर (नागरिक बुनियादी ढांचे) का आभास देते हैं. लेकिन हकीकत ये है कि उपरोक्त सारा तामझाम चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की वॉरफेयर रणनीति का हिस्सा है, जो मिलिट्री नेटवर्क को बढ़ाने के लिए किया गया है.
ये एकीकृत मॉडल गांवों के तथाकथित नागरिक आवास और कुछ नहीं छावनियों (कैंटोमेंट्स) का विस्तार है. असलियत में सरहद के करीब मौजूद इन जगहों पर नागरिकों की कोई आबादी नहीं है.
नई हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों के सेट से चीन की नई वॉरफेयर स्ट्रेटेजी का संकेत मिलता है. इन तस्वीरों में भूटान-चीन सीमा के पास टोरसा नदी को कवर किया गया है. चीन इसी स्ट्रेटेजी को अपने पूरे पश्चिमी बॉर्डर पर लागू करने का मंसूबा पाले हुए है.
स्पेस फर्म मैक्सार टेक्नोलॉजी की ओर से रविवार को जारी की गई तस्वीरों से घाटी के नए निर्मित पांगडा गांव में चीनी निर्माण को दिखाती हैं. लेकिन चीन की चालबाजी की कहानी तीन दर्जन से भी कम आवासीय ढांचों वाले दूरवर्ती गांव तक सीमित नहीं बल्कि कुछ और है.
इंडिया टुडे को पता चला है कि चीन सरहदों के करीब दोहरे इस्तेमाल वाले एकीकृत गांवों की स्थापना की नीति अपना रहा है. इन गांवों का इस्तेमाल चीनी सशस्त्र बलों की ओर से रणनीतिक सैन्य संसाधनों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.
इंडिया टुडे की ओर से इन सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया गया. तस्वीरें साफ तौर पर गांव के दूसरी तरफ रणनीतिक जगहों पर नवनिर्मित मिलिट्रीट स्टोरेज बंकर्स और निर्माणाधीन सड़कें दिखाती हैं. इनसे सरहद क्षेत्र में ऐसी सुविधाओं के असल इस्तेमाल का खुलासा होता है.
चीन का एकीकृत ग्राम कार्यक्रम
एकीकृत गाँव अनिवार्य तौर पर छावनियों का विस्तार हैं, जो सीमावर्ती क्षेत्रों के करीब हैं. इन एकीकृत मॉडल गांवों का उद्देश्य तिब्बती ऑटोनामस क्षेत्र के फ्रंटियर इलाकों में सैन्य और नागरिक आबादी के सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करना है. ये ऐसा क्षेत्र हैं जहां नागरिक आबादी का घनत्व बहुत कम है. ये नए विकसित किए गए गांव हैं, जो नागरिकों को बसाने के नाम पर बनाए गए, लेकिन ऐसा शायद ही कहीं हुआ.
भारत और चीन के बीच गतिरोध मई 2020 में शुरू हुआ. लेकिन इसके कई महीने पहले ही इंडिया टुडे ने चीन की ओर से LAC के पास ऐसी सुविधाएं बनाए जाने को रिपोर्ट किया था. एक अधिकारी ने बताया, सेना और नागरिक दोनों ही इन सुविधाओं का इसतेमाल कर सकते हैं. चीन का मानना हो सकता है कि ये घटनाक्रम तनाव बढ़ने की स्थिति में जमीन पर उसके दावे को मजबूत करेगा.
सिक्योरिटी प्रतिष्ठान में तैनात एक अधिकारी ने कहा, अगर ये सुविधाएं वास्तव में ही नागरिकों के लिए बनाई गईं तो यहां उन्हें रहना चाहिए था. लेकिन ऐसे गांव मोटे तौर पर खाली ही दिखाई देते हैं.
इन गांवों में आम तौर पर निगरानी टॉवर दिखते हैं. चीन ने LAC के पास ऐसे दो दर्जन से ज्यादा एकीकृत गांव बनाए है. इनमें अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के सामने ईस्टर्न सेक्टर वाले ऐसे गांव भी शामिल हैं. पहले कुछ स्थापित किए गए गांवों में चीन की नई निर्मित्त चार लेन वाली सड़कें दिखाई देती हैं. भारत ने भी LAC के पास कुछ जगहों को टूरिस्ट्स के लिए खोलने की रणनीति अपनाई है.
नई सैटेलाइट तस्वीरें
तस्वीरों में दिखने वाला चीन का नया बनाया इलाका उस जगह से पूर्व दिशा की ओर 9 किलोमीटर दूर है जहां डोकलाम में 2017 में भारत-चीन गतिरोध हुआ था. इनसे भी स्थापित होता है कि चीन नागरिक गांव बनाने की आड़ में सरहद के पास सैन्य प्रतिष्ठानों को बढ़ा रहा है.
मैक्सार के आधे मीटर से नीचे हाई रिजोल्यूशन कॉमर्शियल सैटेलाइट जिओआई 1 से ली गई तस्वीरें नई इमारतों, निर्माणाधीन सड़कों और सैन्य बंकरों पर फोकस करती हैं. गांव के ये ढांचे बीते 12 महीने में खड़े हुए हैं.
लेकिन इन तस्वीरों की खास बात सिर्फ गांव के निर्माण से संबंधित नहीं है. नए मिलिट्री स्टोरेज बंकर्स जो सामरिक ऊंचाइयों पर स्थापित किए गए हैं, वो उस बात की पुष्टि करते हैं जिसका संदेह भारतीय एजेंसियां लम्बे समय से करती रही हैं. चीन संभवत: इन दोहरे इस्तेमाल वाले एकीकृत गांव की स्थापना अहम भूटान बॉर्डर के पास मिलिट्री ऑपरेशन्स की मदद के लिए कर रहा है.
तस्वीरों का विश्लेषण करने वाले मैक्सार विश्लेषकों ने इंडिया टुडे को बताया कि इस साल टोरसा नदी घाटी क्षेत्र में खासी निर्माण गतिविधियां चलती रहीं. इनमें व्यापक सड़क-निर्माण/ निर्माणाधीन ढांचों के साथ-साथ डोकलाम क्षेत्र के पास नए बने मिलिट्री स्टोरेज भी शामिल हैं.
तस्वीरों की एक और खास बात नदी घाटी क्षेत्र में सड़कों का निर्माण है. इसी साल 29 अक्टूबर को ली गई तस्वीरों में जमीन पर तैनात अर्थ मूविंग इक्विपमेंट्स को भी देखा जा सकता है. इससे संकेत मिलता है कि सड़क निर्माण का काम शुरुआती चरण में हो सकता था. सीमावर्ती क्षेत्र में ऐसे एकीकृत गांवों की स्थापना चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को एक रणनीतिक लाभ प्रदान करती है. इससे पहले भूटान ने डोकलाम में भूटानी क्षेत्र के अंदर चीन की ओर से ऐसे गांव स्थापित किए जाने की रिपोर्टों को खारिज कर दिया था. भारत में भूटान के राजदूत मेजर जनरल वेटसोप नामग्येल ने इंडिया टुडे को बताया- "भूटान के अंदर कोई चीनी गांव नहीं है."
डोकलाम में टकराव वाली साइट के पास चीन का ये एकमात्र निर्माण नहीं है. सिक्किम और भूटान की सीमा पर चुंबी घाटी में पीएलए की ओर से किए गए निर्माण को भी नोटिस किया गया है. पीएलए कैम्प ग्यानत्से के दक्षिण में निर्माण गतिविधि अगस्त 2019 में शुरू की गई थी जो अब लगभग पूरी हो चुकी है. यहां दो इमारतें, एक और ऊंचे निर्माण के साथ 12 शेड्स देखे जा सकते हैं.
चुम्बी घाटी के देजाबू में एक और नई इमारत पीएलए की ओर से इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसा लगता है कि ये नई इमारतें जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सैनिकों को समायोजित करने के लिए हैं.