कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया के साथ डीके शिवकुमार का नाम सबसे आगे था. लेकिन सीएम पद के लिए सिद्धारमैया के नाम पर मुहर लग गई और शिवकुमार को डिप्टी सीएम के लिए चुना गया. लेकिन कौन हैं डीके शिवकुमार, जो सीएम पद के लिए सिद्धारमैया को सीधे टक्कर दे रहे थे.
कर्नाटक के लोगों के लिए डीके शिवकुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं है. उन्हें राज्य में घर-घर में पहचाना जाता है. कर्नाटक की राजनीति में उन्हें संकटमोचक के नाम से जाना जाता रहा है.
राजनीति के गुण पिता से विरासत में मिले
15 मई 1962 को कनकपुरा के डोड्डालाहल्ली गांव में शिवकुमार का जन्म हुआ था. उन्हें राजनीतिक गुण विरासत में अपने पिता से मिले. 1980 के दशक में 18 साल की उम्र में वह कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) से जुड़ गए थे. वह 1981-1983 में एनएसयूआई की बेंगलुरु जिला इकाई के अध्यक्ष बने.
बेंगलुरु में राम नारायण चेल्लाराम कॉलेज में पढ़ाई के दौरान शिवकुमार यूथ कांग्रेस में शामिल हुए औऱ इसकी राज्य इकाई के महासचिव चुने गए. बाद में वह बेंगलुरु ग्रामीण जिला युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने. उन्होंने कनकपुरा तालुका के ग्रामीण इलाकों में निशुल्क हेल्थ चेकअप और ब्लड डोनेशन कैंप लगाए और इलाके में सभी की आंखों का तारा बन गए.
देवेगौड़ा को दी थी कांटे की टक्कर
1985 में जब जनता दल के प्रभावशाली नेता एचडी देवेगौड़ा सथानूर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा तो कांग्रेस को शिवकुमार के रूप में एक बेहतरीन उम्मीदवार मिला और उन्हें देवेगौड़ा के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा. इस सीट पर शिवकुमार ने देवेगौड़ा को कड़ी टक्कर दी. हालांकि, फिर भी देवेगौड़ा यह चुनाव जीत गए लेकिन वह भी भांप गए थे कि उनके लिए यह जीत आसान नहीं थी.
1987 में उन्हें सथानूर निर्वाचन क्षेत्र से बेंगलुरु ग्रामीण जिला पंचायत का सदस्य चुना गया. 1989 में वह कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सथानूर सीट से चुनाव लड़े. वह यह सीट भारी बहुमत से जीत गए थे. डीके शिवकुमार ने 1991 चुनाव में बंगारप्पा सरकार को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी और उन्हें रेल मंत्री चुना गया था. वह कैबिनेट में जगह पाने वाले सबसे युवा मंत्री थे.
हालांकि, 1994 में अगले चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वियों की कुटिल चाल की वजह से उन्हें टिकट नहीं मिल पाया था. लेकिन फिर भी उन्होंने एक बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की.
1999 में जब एसएम कृष्णा को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया तो शिवकुमार चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे और हर मोर्चे पर उनका साथ दिया. कांग्रेस चुनाव में कांग्रेस को बंपर जीत मिली और इस जीत में शिवकुमार की अहम भूमिका रही.
लगातार आठ बार चुनाव जीता
1999-2002 के दौरान शिवकुमार के दम पर ही राज्य में कांग्रेस पार्टी 139 सीटों के साथ सत्ता में आई.एमएस कृष्णा ने उन्हें कैबिनेट में जगह दी. वह 2002 में शहरी विकास मंत्री बने और स्टेट प्लानिंग बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने राज्य में युवाओं के लिए राजीव युवा शक्ति कार्यक्रम की अगुवाई भी की.
कांग्रेस ने 1999 में शिवकुमार को देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा. उस बार भी मुकाबला सथानूर सीट पर था. लेकिन देवेगौड़ा की लोकप्रियता के बावजूद शिवकुमार ने उनके बेटे कुमारस्वामी को हरा दिया.
साल 2004 में जब पहली बार कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सत्ता में आया. एसएम कृष्णा को दरकिनार कर दिया गया. लेकिन यह वह समय था, जहां से शिवकुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
वह लगातार चार बार 1989, 1994, 1999 और 2004 में सथानूर सीट से जीते. उन्होंने 2008 से कनकपुरा से चुनाव लड़ा और तब से आज तक कभी हार का मुंह नहीं देखा.