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देश की राजधानी में रविवार को नई संसद का उद्घाटन किया जाएगा. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस सेंगोल यानी राजदंड को स्थापित करेंगे, जो 15 अगस्त 1947 की आजादी की रात पंडित जवाहर लाल नेहरू को सौंपा गया था. ये वही सेंगोल है, जो हिंदू परंपरा में सत्ता हस्तांतरण की पहचान रहा है और तमिल संस्कृति की शान रहा है. अब नई संसद में इसे उसी परंपरा, उसी रीति-रिवाज, उसी धार्मिक अनुष्ठान के साथ इसे नरेंद्र मोदी को थमाया जाएगा, जिस अनुष्ठान के साथ 14 अगस्त 1947 की रात को अंग्रेजी हुकूमत के आखिरी वायसराय माउंट बेटन ने नेहरू को थमाया था.
इस सेंगोल की एक्सक्लूजिव तस्वीरें भी सामने आई हैं. 5 फीट लंबे चांदी से बने इस सेंगोल पर सोने की परत चढ़ाई गई है. इसके ऊपरी हिस्से पर नंदी विराजमान हैं और इस पर झंडे बने हुए हैं. उनके नीचे तमिल भाषा में कुछ लिखा भी हुआ है. दरअसल, हाल ही में प्रायगराज से लाने के बाद इसे दिल्ली के म्यूजियम में रखा गया था. इस सेंगोल को 1947 में बनवाया गया था.
कहां बनाया गया था सेंगोल?
14 अगस्त, 1947 को सत्ता के हस्तांतरण के वक्त तीन लोगों को विशेष रूप से तमिलनाडु से दिल्ली आए थे. अधीनम के उप महायाजक , नादस्वरम वादक राजरथिनम पिल्लई और ओथुवर (गायक), जो सेंगोल लेकर आए थे. इसे मद्रास के स्वर्णकार वुम्मिडि बंगारू चेट्टी ने हस्तशिल्प कारीगरी द्वारा बनवाया था. इसे 1 महीने से कम समय में बनाया गया था. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके लिए वुम्मिडि बंगारू चेट्टी को 15000 रुपये मिले थे.
देखें नई संसद की एक्सक्लूजिव वीडियो
संसद में किस जगह स्थापित होगा सेंगोल?
अब नई संसद में सेंगोल को स्थापित करने से पहले एक बार फिर इसको पवित्र जल से शुद्ध किया जाएगा. एक बार फिर वैदिक मंत्रों से संसद गूंजेगी. एक बार फिर संसद में शंख-ध्वनि होगी. इसके बाद इसे प्रधानमंत्री मोदी को थमाया जाएगा, जो इसे लोकतंत्र के नए मंदिर में स्थापित करेंगे. सेंगोल को लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी के बगल में पोडियम पर स्थापित किया जाएगा.
1947 में क्यों बनवाया गया था सेंगोल?
14 अगस्त 1947 में आजादी के समय जब लॉर्ड माउंट बेटन ने पंडित नेहरू से पूछा कि सत्ता हस्तांतरण के दौरान क्या आयोजन होना चाहिए तो नेहरूजी ने अपने सहयोगियों से चर्चा की. तब स्वतंत्रता सेनानसी सी गोपालाचारी ने सेंगोल प्रक्रिया के बारे में उन्हें बताया था. इसके बाद इसे तमिलनाडु से मंगाया गया और आधी रात को पंडित नेहरु ने मांउंट बेटन से इसे स्वीकार किया. इसका अर्थ था पारंपरिक तरीके से भारत की सत्ता अंग्रेजों के हाथों से हमारे पास आई.
प्रयागराज के म्यूजियम से मंगाया गया सेंगोल
बता दें कि प्रयागराज के एक म्यूजियम में दुर्लभ कला संग्रह के तौर पर एक गोल्डन स्टिक रखी हुई थी. अब तक इसे नेहरू की सोने की छड़ी के रूप में जाना जाता रहा है. लेकिन हाल में ही चेन्नई की एक गोल्डन कोटिंग कंपनी ने म्यूजियम प्रशासन को इस स्टिक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी थी. कंपनी का दावा था कि यह कोई स्टिक नहीं बल्कि सत्ता हस्तांतरण का दंड है. गोल्डन ज्वेलरी कंपनी वीबीजे (वूम्मीदी बंगारू ज्वैलर्स) का दावा है कि 1947 में उनके वंशजों ने ही इस राजदंड को अंतिम वायसराय यानी माउंट बेटन के आग्रह पर बनाया था. अब मोदी सरकार इसी राजदंड यानी सेंगोल को संसद भवन की नई इमारत में रखने जा रही है.
पीएम मोदी ने किया था सेंगोल का जिक्र
14 अगस्त 1947 को नेहरू जी को सेंगोल मिलने के बाद इसे प्रयागराज के आनंद भवन में रख दिया गया था. ये नेहरू खानदान का पैतृक निवास है. 1960 के दशक में इसे वहीं के म्यूजियम में शिफ्ट कर दिया गया. 1975 में शंकराचार्य ने भी अपनी पुस्तक में इसका जिक्र किया है. पीएम नरेंद्र मोदी को करीब डेढ़ साल पहले सेंगोल के बारे में 1947 की इस ऐतिहासिक घटना के बारे में बताया गया था. इसके बाद 3 महीने तक इसकी खोजबीन होती रही और देश के हर म्यूजियम में में इसे ढूंढा गया. फिर ये प्रयागराज के म्यूजियम में मिला. 1947 में जिन्होंने इसे बनाया था, उन्होंने इसकी सत्यता की पुष्टि की.
चोल साम्राज्य से होता आ रहा इस्तेमाल
सेंगोल को हिंदी में राजदंड कहा जाता है और इसका इस्तेमाल चोल साम्राज्य से होता आ रहा है. इस साम्राज्य का जब कोई राजा अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता था तो उसे सत्ता हस्तांतरण के रूप में सेंगोल देता था. सेंगोल देने की परंपरा चोल साम्राज्य से ही चली आ रही है. तभी से तमिलनाडु और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक माना जाता है. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि मौर्य और गुप्त वंश में भी सेंगोल का इस्तेमाल हुआ करता था.