थोड़ा बिज़नेस थोड़ी सेवा..कहते हैं भीड़ का कोई पैमाना नहीं होता, लेकिन भीड़ में बिजनेस जरूर होता है. गाजीपुर बॉर्डर पर एक साल पहले जब किसान पहुंचे तो लोगों के आने जाने का रास्ता बंद हो गया. ऐसा लगा कि सबका कामकाज अब ठप हो जाएगा. लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, आंदोलन (Farmers Protest) की भीड़ में कुछ लोगों ने अपनी दुकानें लगा लीं. दुकान लगाने में थोड़ा बिजनेस था तो थोड़ी सेवा भी. आंदोलन के समय गाजीपुर बॉर्डर पर रहे ऐसे ही कई लोगों से हमने बात की.
'गोवर्धन गुप्ता से बने 'गुप्ता जी'.. पैसा नहीं नाम कमाया'
68 साल के गोवर्धन गुप्ता मूल रूप से बनारस के रहने वाले हैं, लेकिन अब दिल्ली में ही रहकर कुर्ता पजामा बेचकर घर चलाते हैं. गाजीपुर बॉर्डर पर पहले वो आंदोलन में शामिल होने के लिए आए थे, लेकिन धीरे-धीरे उनको अहसास हुआ कि कई लोग जो लंबी तैयारी से नहीं आए थे, उन्हें कपड़ों और दूसरी चीजों की जरूरत है. गुप्ता जी अपनी दुकान नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन से उठाकर गाजीपुर में ले आए. सेवा भाव ऐसा रहा कि बाजार में जो कुर्ता 350 में बेचते थे, उसे गाजीपुर में जरूरतमंदों को 150 में बेच दिया. कभी मुनाफा कमाया भी तो 10-20 रुपये का.
धीरे-धीरे गोवर्धन गुप्ता ने राकेश टिकैत के संगठन भारतीय किसान यूनियन के बिल्ला, झंडा और टोपी भी बेचना शुरू किया. धीरे धीरे जरूरत के हिसाब से लोअर चार्जर और तिरंगा झंडा भी बेचने लगे. गुप्ता जी बताते हैं कि आज उनका सारा माल लगभग खत्म हो चुका है. एक साल तक दुकान लगाकर ज्यादा पैसा तो नहीं कमाया, लेकिन नाम बहुत कमाया. यहां लोग गुप्ता जी गुप्ता जी बोल कर आवाज देते हैं. कई नए लोगों से दोस्ती भी हुई. चार बच्चों के पिता गोवर्धन बताते हैं कि उनकी अपनी कोई जमीन नहीं है, लेकिन वह राकेश टिकैत को देखकर आंदोलन से जुड़े थे.
'किराए का घर छोड़ आंदोलन में की छोटी सी दुकान'
अमर सेन दिव्यांग हैं. दोनों हाथों में अंगुलियां नहीं हैं. अमर सेन गाजीपुर में अपनी 70 साल की मां के साथ एक छोटे से टेंट में रहते हैं. इसी में सिगरेट और तंबाकू की छोटी सी दुकान खोल रखी है. अमर सेन बताते हैं कि वह अपनी मां के साथ खोड़ा में किराए के घर में रहते थे, लेकिन आंदोलन में किराए का घर छोड़कर यहीं रहने लगे. खाने पीने की कोई दिक्कत नहीं रही. थोड़ी बहुत बिक्री भी हो जाती थी.
अमर सेन और उनकी मां इस बात से थोड़ा परेशान जरूर हैं कि अब आंदोलन खत्म हो गया है और उन्हें वापस खोड़ा का रुख करना पड़ेगा. अमर सेन कहते हैं कि पैसे की बहुत तंगी रहती है. दोनों हाथ से मजबूर हैं. इसलिए कोई भारी काम भी नहीं कर सकते. खोड़ा में घर का किराया 1200 रुपये महीना था. अब फिर से किराए पर घर लेना पड़ेगा और नया काम भी ढूंढ़ना पड़ेगा.
'सिर्फ 10 रुपये में काटे बाल, फिर भी खुश'
गाजीपुर बॉर्डर पर आपको पूरे आंदोलन में सिर्फ एक नाई की दुकान दिखाई पड़ेगी. राज वीर यहां छोटा सा चबूतरा बनाकर लोगों के दाढ़ी और बाल काटते हैं. अचानक राजवीर की दुकान पर एक बुजुर्ग आते हैं. राजवीर की कैंची और शीशा उठाते हैं और अपनी मूंछों के बढ़े हुए बाल काटकर कैंची और शीशे को जगह रखकर चले जाते हैं. मतलब कोई पैसा नहीं देते हैं. पूरे आंदोलन राजवीर की दुकान इसी तरह चलती रही. राजवीर बताते हैं कि पूरे 1 साल से यहीं पर बने हुए हैं. राजवीर का कोई फिक्स रेट नहीं है. यहां जो भी आंदोलनकारी दाढ़ी के बाल कटवाने आते हैं.
राजवीर ने कहा कि कोई 10 रुपये देता है तो कोई 20 रुपये. कोई कोई तो पांच रुपये देकर ही चला जाता है, लेकिन राज भी कहते हैं कि किसी से कोई शिकायत नहीं. वह यहां पर कमाई की सोच कर बैठे भी नहीं थे. उनका मकसद तो लोगों की सेवा करना था.
राजवीर मूल रूप से मुरादाबाद के हैं. अब खोड़ा में रहते हैं. राजवीर कहते हैं कि 2 नाई और आए थे, लेकिन वो अच्छी दुकानदारी सोच कर आए थे. जब उनकी दुकान ठीक से नहीं चली तो वह यहां से लौट गए. हमें कोई जितने पैसे दे गया, हम उतने में खुश रहे. परिवार में बीवी, दो बेटे और दो बेटियां हैं. आंदोलन खत्म होने के बाद क्या करेंगे, इस पर राजवीर मुस्कराकर बोलते हैं 'फिर से खोड़ा में कुर्सी मेज डाल के बैठ जाएंगे और क्या.'
इनपुटः मनीष चौरसिया