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एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे में मशीन गन, सामने 700 दुश्मन... देश के पहले परमवीर चक्र विजेता की दास्तां

3 नवंबर 1947 यानी देश को आजाद हुए मुश्किल से चार महीने हुए थे. पाकिस्तान ने कबिलाई लश्कर घुसपैठियों के साथ श्रीनगर पर हमला बोल दिया था. मकसद था श्रीनगर एयरबेस को कब्जे में करना. 700 दुश्मन आए थे. हमारे 50 जवानों ने उन्हें न सिर्फ छह घंटे आगे बढ़ने से रोका. बल्कि 200 घुसपैठियों को नर्क पहुंचा दिया. इस दौरान हमारे 22 जवान शहीद हो गए. साथ ही वो भी चला गया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा. ये कहानी है देश के पहले परम वीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) की.

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पहला परमवीर चक्र हासिल करने वाले शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा. (फोटोः विकिपीडिया)
पहला परमवीर चक्र हासिल करने वाले शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा. (फोटोः विकिपीडिया)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मेजर शर्मा के साथ 21 और जवान हुए थे शहीद
  • 200 से ज्यादा कबिलाई घुसपैठियों को मारा था
  • छह घंटे तक रोक रखा था दुश्मनों को बडगाम में

मेजर सोमनाथ शर्मा (Major Somnath Sharma) चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डेल्टा कंपनी के अधिकारी थे. पाकिस्तानी घुसपैठ के समय उन्हें श्रीनगर एयरबेस की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था. 22 अक्टूबर 1947 को सूचना मिली की पाकिस्तान घुसपैठ करने वाला है. एयरबेस पर दुश्मन का कब्जा होता तो भारतीय सेना कश्मीर न पहुंच पाती. इसका बड़ा नुकसान होता. पाकिस्तान श्रीनगर पर कब्जा कर लेता. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. 

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23 अक्टूबर 1947 की सुबह दिल्ली के पालम एयरपोर्ट से सैनिकों और हथियारों को श्रीनगर पहुंचाया गया. 31 अक्टूबर को मेजर सोमनाथ शर्मा भी श्रीनगर पहुंचा दिए गए. उस समय मेजर शर्मा के दाहिने हाथ में प्लास्टर चढ़ा था. क्योंकि हॉकी खेलते समय उनका हाथ फ्रैक्चर हो गया था. डॉक्टरों ने आराम करने की सलाह दी थी. पर देशभक्त का दिल कहां मानता है. दुश्मन दरवाजे पर हो तो घाव और दर्द नहीं दिखता. मेजर शर्मा ने युद्धक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगी. वो मिल भी गई. उन्हें उनकी यूनिट का कमांड सौंप दिया गया. 

श्रीनगर एयरबेस पर तैयारी करते भारतीय जवान.
श्रीनगर एयरबेस पर तैयारी करते भारतीय जवान. 

कहां से होगा असली हमला, पता था मेजर शर्मा को

मेजर शर्मा को आला सैन्य अधिकारियों ने कहा कि कश्मीर घाटी को घुसपैठियों से बचाना है. उन्हें मार भगाना है. दो दिन बाद 2 नवंबर 1947 को खबर मिली कि पाकिस्तानी दुश्मन श्रीनगर एयरफील्ड से कुछ किलोमीटर दूर बडगाम तक पहुंच गया है. 161 इन्फैन्ट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर एलपी बोगी सेन के आदेश पर मेजर शर्मा और 50 जवानों की उनकी कंपनी बडगाम रवाना हो गई. 3 नवंबर 1947 की अलसुबह मेजर शर्मा और टीम बडगाम पहुंचे. तत्काल उन्होंने कंपनी को कुछ टुकड़ों में बांटकर मोर्चा लेने के लिए पोजिशन ले ली. 

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बडगाम गांव में दुश्मन की हलचल दिख रही थी. मेजर शर्मा ने अपने पोजिशन को बरकरार रखते हुए अंदाजा लगाया ये हलचल तो ध्यान भटकाने के लिए है. असली हमला तो पश्चिम दिशा की तरफ से होगा. मेजर शर्मा की ये गणित सही निकली. दोपहर ढाई बजे 700 लश्कर कबिलाइयों ने हमला किया. उन्होंने 50 जवानों की टुकड़ी पर ताकतवर मोर्टारों के गोले दागे. मेजर शर्मा और उनके साथी जवान तीन तरफ से घिर गए थे. उनकी टीम के साथी सिर के ऊपर फट रहे मोर्टार के गोलों से निकल रहे बारूद, कांच और नुकीली कीलों से बुरी तरह जख्मी हो रहे थे. लेकिन करारा जवाब दे रहे थे. 

मेजर सोमनाथ शर्मा कुछ अधिकारियों के साथ.
मेजर सोमनाथ शर्मा कुछ अधिकारियों के साथ.

एक-एक जवान, सात-सात दुश्मनों से ले रहा था लोहा

मेजर शर्मा ने जब गिनती की तो पता चला कि उनका एक-एक जवान सात-सात दुश्मनों से संघर्ष कर रहा था. तत्काल उन्होंने ब्रिगेडियर सेन को और टुकड़ी भेजने की रिक्वेस्ट की. मेजर शर्मा को बडगाम पोस्ट की वैल्यू पता थी. उस पोजिशन को वो छोड़ना नहीं चाहते थे. अगर ये पोस्ट चली जाती तो शायद श्रीनगर भारत के हाथ से निकल जाता. कश्मीर घाटी भारत से अलग हो जाती. लेकिन मेजर शर्मा और उनकी टीम ने ऐसा होने नहीं दिया. 

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एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे में मशीन गन की मैगजीन

एक हाथ में प्लास्टर लगा होने के बावजूद मेजर शर्मा हर पोस्ट पर दौड़-दौड़कर सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे. बीच-बीच में दुश्मन पर गोलियां बरसा रहे थे. उनकी फॉरवर्ड प्लाटून खत्म हो चुकी थी. लेकिन बाकी सैनिकों ने मेजर शर्मा को हौसले को देखते हुए जंग जारी रखी. इस बीच मेजर शर्मा सभी लाइट ऑटोमैटिक मशीन गनर्स के पास मैगजीन पहुंचाने का काम करने लगे. ताकि गोलियां खत्म न हों किसी भी पोस्ट पर. दुश्मन के शरीर को हिंदुस्तानी गोलियां चीरती रहें. 

इस बीच मेजर शर्मा ने मुख्यालय को एक संदेश भेजा. उन्होंने कहा कि हम संख्या में बहुत कम है. दुश्मन हमसे सिर्फ 45-46 मीटर की दूरी पर है. हम भयानक गोलीबारी के बीच हैं. लेकिन हम अपनी जगह से एक इंच भी नहीं खिसकेंगे. हम आखिरी गोली और आखिरी जवान के रहने तक घुसपैठियों को जवाब देते रहेंगे. इसके थोड़ी देर बाद ही मेजर सोमनाथ शर्मा एक मोर्टार विस्फोट में शहीद हो गए. आखिरी सांस तक लड़ते रहे. उनका सर्वोच्च बलिदान बेकार नहीं गया. 

न श्रीनगर एयरबेस जाने दिया, न ही कश्मीर हाथ से छूटने दिया.
न श्रीनगर एयरबेस जाने दिया, न ही कश्मीर हाथ से छूटने दिया.

श्रीनगर एयरबेस पर कब्जा होने से बचाया

उनकी टुकड़ी के 20 से ज्यादा जवान शहीद हो चुके थे. मेजर शर्मा भी नहीं थे. लेकिन उनके बाकी बचे जवानों ने बहादुरी का परचम लहरा दिया. मेजर शर्मा के जाने के बाद भी दुश्मन को छह घंटे तक आगे नहीं बढ़ने दिया. इतना समय काफी था, पिछली टुकड़ी को आने के लिए. रीनफोर्समेंट के तौर पर कुमाऊं रेजीमेंट की पहली बटालियन आई. आते ही दुश्मन को करारा जवाब देने के लिए पोजीशन संभाली. मेजर शर्मा, एक जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर और चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डी कंपनी के 20 सैनिक शहीद हो गए. लेकिन श्रीनगर और कश्मीर बच गया. 

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पिता अमरनाथ शर्मा भी सेना में थे

मेजर सोमनाथ शर्मा 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के दाढ़ में पैदा हुए थे. उनके पिता अमरनाथ शर्मा भारतीय सेना में मेजर जनरल थे. बाद में वो इंडियन आर्म्ड मेडिकल सर्विसेज के पहले डायरेक्टर जनरल भी बने थे. मेजर शर्मा के अंकल कैप्टन केडी वासुदेव भी फौजी थे. वो द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी हमलावरों के खिलाफ रिवर स्लिम को बचाते समय शहीद हुए थे. 

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