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मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद पंजाब और महाराष्ट्र की शराब नीति में जांच की क्यों उठी मांग?

पंजाब कैबिनेट ने जून 2022 में नई आबकारी नीति  2022-23 को मंजूरी दी थी. इसे लेकर विवाद हुआ था. नई नीति का कई शराब व्यापारियों ने विरोध भी किया था. हालांकि, पंजाब में अभी तक शराब नीति में किसी तरह के घोटाले की कोई बात सामने नहीं आई है. उधर, महाराष्ट्र में उद्धव सरकार द्वारा लागू शराब नीति की भी जांच की मांग उठी है.

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प्रतीकात्मक फोटो
प्रतीकात्मक फोटो

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सीबीआई ने रविवार को शराब नीति में कथित घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया है. सिसोदिया की गिरफ्तारी के साथ ही महाराष्ट्र और आप शासित पंजाब में भी विपक्षी दलों ने शराब नीति में सीबीआई जांच की मांग की है. 

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पंजाब में अभी तक शराब नीति में किसी तरह के घोटाले की कोई बात सामने नहीं आई है. हालांकि, विपक्षी दलों का आरोप है कि पंजाब की 2022-23 की आबकारी नीति, दिल्ली के समान ही है, जिसे मनीष सिसोदिया और उनकी टीम ने ड्राफ्ट की थी. 
 
शिरोमणि अकाली दल के महासचिव दलजीत चीमा ने कहा, दिल्ली में मनीष सिसोदिया पकड़े गए हैं. ऐसे में इसका असर पंजाब में भी देखने को मिलेगा, क्योंकि पंजाब में भी शराब नीति का मसौदा उन्हीं लोगों द्वारा तैयार किया गया है. सीबीआई पंजाब में पहले भी छापेमारी कर चुकी है. ऐसे में अगर जांच एजेंसी जांच का दायरा बढ़ाती है, तो गड़बड़ी का खुलासा होगा. 
 
वहीं, अब आजतक की टीम द्वारा पंजाब और दिल्ली की शराब नीति की तुलना की गई, तो इसमें कई समानताएं मिली हैं. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने खुद इसकी पुष्टि की थी. उन्होंने ट्वीट कर दावा किया था, जिस आबकारी नीति की दिल्ली में अनुमति नहीं मिली थी, वह पंजाब में कमाल कर रही है. 
 
पंजाब कैबिनेट ने जून 2022 में नई आबकारी नीति  2022-23 को मंजूरी दी थी. इसे लेकर विवाद हुआ था. नई नीति का कई शराब व्यापारियों ने विरोध भी किया था. शराब व्यापारियों का कहना था कि राज्य सरकार बड़े खिलाड़ियों के अनुकूल नीति बनाकर शराब कारोबार पर एकाधिकार करने की कोशिश कर रही है. 

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सूत्रों के मुताबिक, पंजाब सरकार ने अपनी वेबसाइट पर एक लाइसेंस रिन्यूअल फॉर्म अपलोड किया था. जिसे मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद सोमवार को हटा दिया गया. अधिकारियों ने बाद में कहा कि फॉर्म में सुधार किया जा रहा है. 

पंजाब और दिल्ली की आबकारी नीति में ये समानताएं
  
सामान्य लक्ष्य : अतिरिक्त राजस्व इकट्ठा करने लिए अधिक शराब बेचना

पंजाब और नई दिल्ली में सामान्य लक्ष्य है कि अधिक शराब बेचकर अधिक राजस्व इकट्ठा किया जाए. नकली शराब की बिक्री पर रोक लगाई जाए. पड़ोसी राज्य से शराब की तस्करी पर रोक लगाई जाए. पंजाब सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में भी बताया था कि वह अवैध शराब के इस्तेमाल को कम कर लोगों के लिए एक स्वस्थ विकल्प प्रदान करने का इरादा रखती है. देशी शराब, जिसमें 40 प्रतिशत अल्कोहल की मात्रा होती है, पॉलीथिन पाउच में बेची जाएगी. 

एक और बात सामने आई है कि इन राज्य सरकारों द्वारा IMFL भारतीय निर्मित विदेशी शराब और बीयर की बिक्री के लिए कोई कोटा निर्धारित नहीं किया है. यानी जो जितना चाहे वो बेच सकता है. 
 
शराब के लाइसेंसधारियों को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप
 
आरोप है कि पंजाब सरकार ने अपनी आबकारी नीति के जरिए दिल्ली सरकार की तरह ही शराब उद्योग पर एकाधिकार करने का प्रयास किया. पंजाब सरकार ने पिछले साल आदेश जारी किया था, जिसमें एक लाइसेंसधारी को आवंटित रिटेल को तीन से बढ़ाकर पांच कर दी गई थी. कुछ शराब खुदरा विक्रेताओं ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इसमें कहा गया था कि सरकार शराब के कारोबार को साधन संपन्न ठेकेदारों तक सीमित करने की कोशिश कर रही है. 

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क्लस्टरों की संख्या भी 750 से घटाकर 177 कर दी गई. लाइसेंसधारी भी अधिक से अधिक शराब बेचने के लिए स्वतंत्र हैं. जहां मनीष सिसोदिया पर रिश्वत के बदले लाइसेंसधारी को अनुचित लाभ देने का आरोप लगा है, वहीं पंजाब में विपक्षी नेताओं ने भी ऐसी ही आशंका जताई है. 

आबकारी नीति में छोटे शराब कारोबारियों की उपेक्षा

पंजाब और दिल्ली की आबकारी नीति में बड़े कारोबारियों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगा है. छोटे व्यापारियों की पहुंच से शराब कारोबार को दूर रखने के लिए कथित रूप से लाइसेंस शुल्क बढ़ा दिया गया है. पंजाब में शराब नीति का विरोध करने वालों का दावा है कि शराब वेंडर क्लस्टर समूहों की संख्या 700 से घटाकर 177 कर दी गई है. प्रत्येक विक्रेता के लिए न्यूनतम पात्रता मानदंड नहीं बढ़ाया गया है. विक्रेता जो पहले 7-8 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहे थे, उन्हें अब 30 करोड़ रुपये तक का भुगतान करना पड़ रहा है. 

इतना ही नहीं L1 लाइसेंस की सालाना फीस 25 लाख से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दी गई है. भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने आरोप लगाया है कि दो शराब कारोबारी जो नई दिल्ली में शराब के कारोबार को नियंत्रित कर रहे थे, उन्हें कथित तौर पर पंजाब में भी ठेके दिए गए. 

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दिल्ली आबकारी घोटाले की जड़ें भी पंजाब में

ED ने पिछले साल अक्टूबर में पंजाब में 4 ठिकानों पर छापेमारी की थी. इनमें दो ठिकाने दीप मल्होत्रा से जुड़े थे, जो अकाली दल के पूर्व विधायक हैं. ये छापेमारी दिल्ली की आबकारी नीति घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में की गई थी. ईडी ने हाल ही में शराब निर्माण और वितरण कारोबार से जुड़े गौतम मल्होत्रा ​​को गिरफ्तार किया था. उन्होंने कथित तौर पर दिल्ली की विवादास्पद उत्पाद शुल्क नीति के कार्यान्वयन के बाद कार्टेलाइजेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

आप का दावा- नई आबकारी नीति से पंजाब का राजस्व बढ़ा

हालांकि, जब आप नेताओं से इन आरोपों पर सवाल किया गया तो उन्होंने इन्हें खारिज कर दिया. पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने कहा, पिछली सरकारों के नेताओं ने शराब माफिया के साथ सांठगांठ की और सरकारी खजाने से 22,500 करोड़ रुपये से अधिक की लूट कराई. उन्होंने बताया कि पिछली सरकारों के शासन के दौरान, पिछले 15 सालों में उत्पाद शुल्क संग्रह में हर साल केवल 7 % की वृद्धि हो रही थी. लेकिन पिछले साल सिर्फ छह महीनों में यह वृद्धि 37% है. 

चीमा ने दावा किया, नई आबकारी नीति एकाधिकार को खत्म करने का प्रयास है. इसका उद्देश्य शराब की कीमत कम करना, राजस्व बढ़ाना और एकाधिकार खत्म करना है. उन्होंने बताया कि नई नीति शराब निर्माता को खुदरा आउटलेट के लिए बोली लगाने से रोकती है. यानी L1 लाइसेंस प्राप्त करने वाले की शराब निर्माण में कोई हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए. चीमा ने आगे कहा कि 2022-23 की आबकारी नीति के दोहरे उद्देश्य राजस्व को अधिकतम करना और नागरिकों को सस्ती, गुणवत्ता वाली शराब उपलब्ध कराना है. 

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बीजेपी ने की उद्धव के शासन में आई शराब नीति में जांच की मांग

बीजेपी ने महाविकास अघाड़ी सरकार में आई शराब नीति में जांच की मांग की है. उद्धव ठाकरे के सीएम रहते 2022 में शराब नीति लागू की गई थी. इसे लेकर काफी विवाद हुआ था. अब मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद बीजेपी के मुंबई अध्यक्ष आशीष शेलर ने इस शराब नीति में घोटाले के आरोप लगाए हैं. 

महाराष्ट्र की शराब नीति 
 
महाराष्ट्र में करीब 20 साल बाद नई और बदली हुई नीति अस्तित्व में आई है. पहले महाराष्ट्र में सिर्फ रजिस्टर्ड वाइन स्टोर ही शराब बेच सकते थे. लेकिन नई शराब नीति के तहत शराब को उन किराने की दुकानों पर बेचने की अनुमति है, जिनके पास शराब की बिक्री के लिए एक अलग कैबिनेट है. 

नई पॉलिसी के मुताबिक, जो सुपरमार्केट शराब बेचना चाहते हैं, उन्हें 5000 रुपए देने होंगे. हालांकि, शिक्षा संस्थान या धार्मिक स्थान के पास मौजूद सुपरमार्केट में इसकी अनुमति नहीं है. यह प्रतिबंध तब लागू होता है जब सुपरमार्केट किसी नगरपालिका निकाय के 50 मीटर, किसी शैक्षणिक या धार्मिक संस्थान के 100 मीटर, बस स्टॉप के 100 मीटर या महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन डिपो के 100 मीटर के दायरे में हो. 

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18 नवंबर 2021 को जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, इंपोर्टेट शराब पर उत्पाद शुल्क घटाकर 150 फीसदी कर दिया गया. इससे आयातित शराब की कीमत 30-50 फीसदी कम हो गई. महाराष्ट्र में इससे पहले 300 प्रतिशत का शुल्क वसूला जाता था, जिससे यहां देश में सबसे महंगी शराब मिलती थी. 

महाराष्ट्र में शराब का खेल

भारत में शराब उद्योग में महाराष्ट्र राज्य का सबसे बड़ा योगदान है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, महाराष्ट्र को कुल आय का 65 प्रतिशत टर्नओवर नासिक, पुणे और सांगली क्षेत्रों से मिलता है. महाराष्ट्र में हर रोज 80 से 90 लाख लीटर शराब की सेल होती है. यहां सालाना लाइसेंस की फीस 5000 रुपये है. 
 
बीजेपी ने लगाए ये आरोप
 
भाजपा अब विदेशी शराब पर कर छूट, बार और पब के लिए लाइसेंस शुल्क में छूट और किराने की दुकानों में शराब की बिक्री की अनुमति के मामले में उद्धव सरकार के फैसले की जांच की मांग कर रही है. 

नवंबर 2021 में लागू हुई थी दिल्ली की शराब पॉलिसी 

दिल्ली की शराब नीति मार्च-अप्रैल 2021 में बनी थी. इसे नवंबर 2021 में लागू किया गया था. नीति का लक्ष्य 9,500 करोड़ रुपये का राजस्व पैदा करना था. पहले की नीति में शराब की दुकानें सरकारी और गैर सरकारी होती थीं. लेकिन नई नीति के तहत सिर्फ प्राइवेट दुकानें खोली गईं. 

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इतना ही नहीं ड्राई डे भी 21 से घटाकर 3 कर दी. प्राइवेट विक्रेताओं को एक बोतल पर दूसरी फ्री जैसी स्कीमों को लागू करने की अनुमति दी गई. शहर को 32 जोन में बांटा गया. हर जोन में 27 दुकानें खोली गईं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 200 वेंडर्स ने घाटे का हवाला देते हुए कुछ महीनों के भीतर ही अपनी दुकानें बंद कर दीं. यह भी आरोप लगाया गया कि नई नीति के तहत पक्षपात किया गया. 

शराब नीति के तहत होल सेल का लाइसेंस किसी भी राज्य में कम से कम पांच साल के थोक वितरण अनुभव वाली इकाई को दिया जाएगा. इतना ही नहीं कंपनी के पास कोई रिटेल आउटलेट भी नहीं होना चाहिए. लेकिन आरोप यह है कि थोक लाइसेंसधारियों ने उन क्रेडिट नोटों को डायवर्ट किया जो खुदरा विक्रेताओं द्वारा उपयोग किए गए थे. आरोप है कि कमिशन 2% से बढ़ाकर 12% किया गया. 

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