मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में दक्षिण अफ्रिका से लाए गए 6 चीतों समेत 9 की मौत हो चुकी है. इनमें तीन शावक शामिल हैं, जिनका जन्म कूनो में ही हुआ था. चीतों की मौत के मामले लगातार सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं. इसको लेकर सरकार ने भी रिपोर्ट मांगी है. इस बीच विदेशी एक्सपर्ट्स ने सरकार को कई तरह के सुझाव दिए हैं, जिससे कि चीता प्रोजेक्ट को सफल बनाने में सहायता मिल सके. इसमें उन्होंने अफ्रिका से युवा चीता लाने और इनके फर (शरीर के बाल) ट्रिम करने जैसी सलाह दी है.
दरअसल, केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट चीता में शामिल विदेशी विशेषतज्ञों ने शुरुआती अनुभव से सीखे गए सबक के आधार पर हाल ही में सरकार को स्टेटस रिपोर्ट सौंपी है. इसमें उन्होंने इस बात पर जोर कि युवा चीते अपने नए वातावरण के लिए अधिक अनुकूल होते हैं और बूढ़े चीतों की तुलना में उनकी जीवित रहने की दर अधिक होती है. इसलिए भारत को अगली खेप में युवा चीतों को भारत लाना चाहिए.
'युवा चीतों का इलाज करना भी आसान'
उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि युवा नर चीते अन्यों के प्रति कम आक्रामता दिखाते हैं, जिससे जानवरों से आपसी लड़ाई-झगड़े का जोखिम कम हो जाता है. बाड़े में छोड़े जाने के बाद युवा चीतों के जीवित रहने की संभावना और प्रजनन क्षमता प्रदान अधिक होती है. साथ ही युवा चीतों को वाहनों और पैदल चलने वाले मनुष्यों के प्रबंधन की आदत भी होती है. इससे उनके स्वास्थ्य संबंधी मामलों की आसान निगरानी हो जाती है और पशु चिकित्क भी आसानी से किसी भी तरह का इलाज दे सकते हैं. ये कुछ चीतों में रेडियो कॉलर के कारण हुए संक्रमण के हाल के मामलों को देखते हुए महत्वपूर्ण है. इसके अतिरिक्त, ऐसे चीतों के आने से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा.
एक्सपर्ट्स ने कहा कि नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से कूनो लाए गए चीतों को देखने के लिए लोग उत्साहित हैं. ऐसे में जल्द ही ये पर्यटन के लिए खुलने जा रहा है और युवा चीतों में उक्त गुण अधिक से अधिक आगंतुकों को आकर्षित कर सकते हैं.
अफ्रीकी विशेषज्ञों ने शॉर्टलिस्ट किए 10 युवा चीते
बता दें कि अफ्रीकी विशेषज्ञों ने 19 महीने से 36 महीने की उम्र के 10 युवा चीतों को भी शॉर्टलिस्ट किया है, जिन्हें 2024 की शुरुआत में भारत में लाया जा सकता है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कूनो नेशनल पार्क में दर्ज की गई चीता की मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन कूनो में जंगली चीता को फिर से बसाने के लिए सामान्य मापदंडों का ध्यान रखा गया है.
इस साल मार्च से अब तक अफ्रीका से कूनो में शिफ्ट किए गए 20 वयस्क चीतों में से छह की मौत हो गई है. वहीं कूनो में जन्में 4 शावकों में से तीन की भी मौत हो चुकी है.
दक्षिण अफ्रीका में फेल हुए थे चीता बसाने के 9 प्रयास
विशेषज्ञों ने सरकार का ध्यान दक्षिण अफ्रीका में चीता के पुनरुत्पादन (reintroduction) प्रयासों के दौरान आने वाली शुरुआती कठिनाइयों की ओर आकर्षित किया. यहां 10 में से नौ प्रयास विफल रहे थे. इन अनुभवों से जंगली चीता के पुनरुत्पादन और प्रबंधन के लिए बेहतर तरीके अपनाने के प्रेरणा मिली.
अफ्रीकी वन्यजीव विशेषज्ञ विंसेंट वैन डेर मेरवे ने कहा, " दक्षिण अफ्रीका में, हमें चीता के पुनरुत्पादन में 26 साल लग गए और इस प्रक्रिया में हमने 279 जंगली चीतों को खो दिया. हम उम्मीद नहीं कर सकते कि केवल 20 चीतों के साथ भारतीय जमीन पर फिर से चीता बस जाएगा. हालांकि भारत में इस तरह के उच्च नुकसान की संभावना नहीं है, प्रोजेक्ट चीता के जरिए कम से कम नुकसान के साथ चीतों को फिर से बसाया जाएगा."
भारत लाए गए 20 चीते घटकर रह जाएंगे पांच से सात
रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीका में पिछले अनुभवों के आधार पर शुरुआती दौर में भारत लाए गए 20 चीतों आबादी घटकर लगभग पांच से सात तक रह जाएगी. हालांकि वयस्कता तक जीवित रहने की यथार्थवादी संभावनाओं वाले पहले शावक का जन्म 2024 में होने की संभावना है. हालांकि, शुरुआत में चीता शावक की मृत्यु दर अधिक होने की उम्मीद है क्योंकि पुन: प्रस्तुत मादा चीता एशिया में विभिन्न जन्म अंतरालों के अनुकूल होती है.
'भारत में सिर्फ एक सुपरमॉम चीता होने की संभावना'
रिपोर्ट में "सुपरमॉम्स" के महत्व को भी रेखांकित किया गया है. सुपरमॉम यानी अत्यधिक सफल, फिट और उपजाऊ मादा चीता, जो दक्षिणी अफ्रीका में जंगली चीतों की आबादी को बनाए रखती हैं. विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में लाए गई सात मादा चीतों में से केवल एक के "सुपरमॉम" होने की संभावना है.
'चीतों के फर काटने की जरूरत'
उन्होंने यह भी कहा कि अफ्रीकी सर्दियों से बचाने के लिए चीतों के फर की मोटी परत विकसित करने की प्राकृतिक प्रक्रिया भारत की गीली और गर्म परिस्थितियों में घातक साबित हो रही है. साथ ही उन्होंने घातक संक्रमणों से निपटने और किसी भी अधिक मृत्यु को रोकने के लिए लंबे समय तक काम करने वाली दवा के साथ उपचार का सुझाव दिया है. विशेषज्ञों ने कहा कि अधिक फर (बाल), उच्च परजीवी भार और नमी त्वचा रोग को बढ़ावा देते हैं. फिर घाव के ऊपर मक्खियां बैठने से संक्रमण बढ़ता है और गंभीर बीमारी को जन्म मिलता है.
'भारत लाए जाएं कम से कम 50 चीते'
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अगले दशक में दक्षिण अफ्रीका से कम से कम 50 और चीतों को भारत लाया जाना जरूरी है. साथ ही भारतीय अधिकारियों को यह सुझाव देते हुए कि कूनो एक सिंक रिजर्व हो सकता है, उन्होंने चीतों के रहने के लिए वैकल्पिक जगहों को भी तलाशने की जरूरत है. सिंक रिज़र्व ऐसे आवास हैं, जिनमें सीमित संसाधन या पर्यावरणीय स्थितियां होती हैं, जो किसी प्रजाति के अस्तित्व या प्रजनन के लिए कम अनुकूल होती हैं.
'कूनो जैसी नई जगहों को उपलब्ध कराए सरकार'
विशेषज्ञों ने 2024 के अंत कूनो जैसी तक कम से कम दो अतिरिक्त ऐसी जगह उपलब्ध कराने की सिफारिश की है, जिनका क्षेत्रफल 50 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो और जहां ज्यादा से ज्यादा बाड़ लगाई जा सकें. क्योंकि दुनिया भर में बिना बाड़ वाली प्रणालियों में चीता का सफल पुनरुत्पादन नहीं देखा गया है. हालांकि न्यूज एजेंसी से बात करते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों ने पहले बाड़ वाले रिजर्व रखने के विचार को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह वन्यजीव संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है.
विदेशी एक्सपर्ट्स ने पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट को लिखा था पत्र
पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट को लिखे पत्र में विदेशी विशेषज्ञों ने प्रोजेक्ट के प्रबंधन को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी. विशेषज्ञों ने निराशा व्यक्त की कि उन्हें समय पर जानकारी नहीं दी जा रही है और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर रखा गया है. उन्होंने दावा किया कि प्रोजेक्ट के प्रमुख नेता वाईवी झाला के सेवानिवृत्त होने के बाद से उनकी भागीदारी कम हो गई है. बेहतर निगरानी और समय पर पशु चिकित्सा देखभाल से चीते की कुछ मौतों को रोका जा सकता था.
इस पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि चीते की मौत कूनो में किसी लापरवाही के कारण हुई. एनटीसीए के अनुसार, आम तौर पर चीतों की जीवित रहने की दर कम होती है. गैर-प्रवेशित आबादी में भी केवल 50 प्रतिशत वयस्क चीते ही जीवित रहते हैं. प्रचलित आबादी के लिए जीवित रहने की दर और भी कम है.