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कॉलेजियम द्वारा सुझाए नामों की नियुक्ति में क्यों हो रही देरी? केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

वकील हर्ष विभोर सिंघल ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से सिफारिश या अनुशंसा किए जाने के बाद जजों की नियुक्ति को अधिसूचित करने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करने का निर्देश देने का आग्रह किया है. ताकि अगर नियुक्ति नहीं की जा रही है तो समय सीमा के अंदर ही सुप्रीम कोर्ट को तथ्यों के साथ इसके पीछे की वजह के बारे में जानकारी दी जाए.

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भारत का सर्वोच्च न्यायालय. (PTI Photo)
भारत का सर्वोच्च न्यायालय. (PTI Photo)

सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद देश के उच्च न्यायालयों में जजों और चीफ जस्टिस की नियुक्ति नहीं किए जाने पर केंद्र सरकार ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी  के जरिए अपना जवाब दाखिल किया है. अटॉर्नी जनरल ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ को बताया है कि  कॉलेजियम द्वारा उच्च न्यायालयों में जज और चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश की गई है, उनमें से कई के बारे में केंद्र सरकार के पास 'संवेदनशील तथ्य' आए हैं. इस कारण सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों के क्रियान्वयन में देरी हो रही है.

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आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें केंद्र सरकार की ओर से जो तथ्यपरक संवेदनशील जानकारी मिली है, उसे सार्वजनिक करना न तो संस्थान के हित में होगा और न ही इसमें शामिल न्यायाधीशों के हित में. लिहाजा वह पीठ के समक्ष इस जानकारी को सीलबंद लिफाफे में रखना चाहेंगे. ताकि तीनों न्यायाधीशों तक ये बातें गोपनीय रूप में पहुंचाई जा सकें. सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ वकील हर्ष विभोर सिंघल की उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश के महीनों बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार कई उच्च न्यायालयों में चीफ जस्टिस और जजों कह नियुक्ति को मंजूरी नहीं दे रही.

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वकील हर्ष विभोर सिंघल ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से सिफारिश या अनुशंसा किए जाने के बाद जजों की नियुक्ति को अधिसूचित करने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करने का निर्देश देने का आग्रह किया है. ताकि अगर नियुक्ति नहीं की जा रही है तो समय सीमा के अंदर ही सुप्रीम कोर्ट को तथ्यों के साथ इसके पीछे की वजह के बारे में जानकारी दी जाए. याचिका में कहा गया है कि इस बाबत कोई निश्चित समय सीमा न तय होने की वजह से सरकार नियुक्तियों को अधिसूचित करने में मनमानी करती है. इससे न्यायिक प्रक्रिया में बेवजह देरी और न्यायपालिका की स्वायत्तता पर असर पड़ता है.

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याचिकाकर्ता के मुताबिक इस समय अवधि के अभाव में संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था भी खतरे में पड़ती है. न्यायपालिका की महिमा, गरिमा एवं दूरदर्शिता का भी अपमान होता है. क्योंकि सरकार को यदि किसी नाम पर आपत्ति है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के साथ साझा किया जाए. वकील हर्ष विभोर सिंघल ने अपनी याचिका में कहा है कि अगर सरकार को कॉलेजियम द्वारा सुझाये गए किसी नाम पर आपत्ति नहीं है और फिर भी निश्चित अवधि के अंदर नियुक्तियों को अधिसूचित नहीं किया जाता है, तो ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्तियों को अपने आप अधिसूचित माना जाना चाहिए.

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