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दो देशों के बीच सीमा पर तनाव की स्थिति में, रक्षा सामान की खरीद बढ़ जाती है. ऐसे में देश लड़ाकू जेट, टैंक, गोला-बारूद खरीदना शुरू कर देते हैं. यह किसी भी देश के लिए दुश्मन को संकेत देने की सामान्य रणनीति होती है कि अगर कोई आपात स्थिति आती है तो वो इसके लिए तैयार है. हालांकि, यह कोई 20वी सदी नहीं है और सिर्फ अपनी रक्षा ताकत के आधार पर युद्ध नहीं जीते जा सकते.
लेकिन क्या होगा अगर युद्ध कंप्यूटर कोड पर ही जीते या हारे जाएं?
साइबर पावर धीरे-धीरे किसी देश की ताकत के लिए नया वैल्यू एडीशन बन रहा है. हम देख रहे हैं कि लोगों की मॉनिटरिंग के लिए जासूसी, साइबर युद्ध, बॉट हमले और मजबूत सर्विलांस सिस्टम का इस्तेमाल बढ़ते जा रहे हैं. हाल के दिनों में चीन के साथ सीमा पर तनाव बढ़ने के बैकग्राउंड में ये गौर किया जाना चाहिए कि भारत साइबर स्पेस में कितनी ताकत रखता है?
अमेरिका के हार्वर्ड केनेडी स्कूल से जुड़े बेलफर सेंटर ने नेशनल साइबर पावर इंडेक्स नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट के अनुसार, साइबर पावर में भारत अभी बहुत पीछे है.
साइबरस्पेस में भारत की रैंकिंग
रिपोर्ट में जिन 30 देशों का विश्लेषण किया गया, उनमें भारत 21वें स्थान पर है. रिपोर्ट के मुताबिक साइबरस्पेस में टॉप पांच शक्तिशाली देशों में पहले से पांचवें क्रम के मुताबिक, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, रूस और नीदरलैंड्स हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, "ये देश रणनीतियों और पहले हुए साइबर हमलों, दोनों को लेकर संकेत देते हैं कि वे नीतिगत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए साइबरस्पेस के इस्तेमाल का इरादा रखते हैं और उन्हें हासिल करने की क्षमता रखते हैं."
फेहरिस्त में 21 वें स्थान पर भारत के बाद तुर्की, ईरान, ब्राजील, यूक्रेन और सऊदी अरब हैं. मिस्र अंतिम स्थान पर मौजूद है. साइबरस्पेस के इस्तेमाल के लिए इन देशों में कम ललक और कम क्षमताएं दिखीं.
रिपोर्ट के मुताबिक, "इस श्रेणी में आने वाले देश या तो साइबरस्पेस में खुद को ताकत प्रोजेक्ट करने लिए सक्रिय रूप से क्षमता और इरादे विकसित नहीं कर पा रहे हैं, या उनकी साइबर रणनीति, साइबर अटैक्स, साइबर पावर को मापने के जरूरी क्षमताओं पर पर्याप्त जानकारी प्रकाशित नहीं हुई है (या उन्होंने इसे जाहिर नहीं किया है).”
भारत का रैंक क्यों नीचा?
नेशनल साइबर पावर इंडेक्स (एनसीपीआई) को क्षमता और इरादे, इन दो अहम फैक्टर्स का साझा सूचकांक (इंडेक्स) माना जाता है. ये फैक्टर फिर आगे सात मापदंडों पर आधारित हैं - रक्षा, आक्रमण, सर्विलांस, कंट्रोल, इंटेलीजेंस, कॉमर्शियल और नॉर्म्स. ऊपर दिए फैक्टर्स में भारत कहीं भी टॉप में स्टैंड नहीं करता.
भारत को रक्षा श्रेणी में 24वां स्थान, कंट्रोल में 29वां, इंटेलीजेंस में 15वां, नॉर्म्स में 12वां, सर्विलांस में 26वां और कॉमर्शियल मापदंडों में 19वां स्थान मिला. भारत सहित 13 ऐसे देश रहे जिन्होंने ‘आक्रमण’ के या विनाश वाली गतिविधियों के लिए न तो इरादे दिखाए और न ही क्षमताएं विकसित कीं.
मोटे तौर पर इरादों और क्षमताओं पर आधारित रैंकिंग से पता चलता है कि भारत में साइबर शक्तिशाली राष्ट्र होने के लिए उस स्तर के उच्च इरादे या क्षमताएं नहीं दिखीं, जो दिखनी चाहिए.
इंडिया टुडे डेटा इंटेलीजेंस यूनिट (DIU) ने बेलफर सेंटर की एनसीपीआई रिपोर्ट के एक लेखक साइमन जोन्स से बात की. वे प्रौद्योगिकी और सुरक्षा से संबंधित मामलों के विशेषज्ञ हैं. उनसे भारत के निचले रैंक के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा,
"यह हमारे लिए थोड़ा हैरान करने वाला था कि भारत, जो अपने तकनीकी क्षेत्र को बढ़ाने के लिए इतना जोर देता रहा है, उसके पास राष्ट्रीय साइबर रणनीति नहीं है,. केवल इसकी 2013 की राष्ट्रीय साइबर नीति है. हालांकि ये स्वागत करने लायक है कि भारत की ओर से जल्द ही एक राष्ट्रीय साइबर रणनीति प्रकाशित करना तय है. राष्ट्रीय साइबर रणनीति के होने और नियमित तौर पर उसे अपडेट करने से भारत को अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करने में मदद मिलेगी. ये समझाया जा सकेगा कि वो क्यों महत्वपूर्ण है. साथ ही ये आश्वस्त कर सकेगा कि इसके पास सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संसाधन और क्षमताएं हैं, जो डिलिवर करने के लिए आवश्यक हैं. भारत के पास अपेक्षाकृत कमजोर डेटा निजता (प्रीवेसी) और कमजोर साइबर अपराध कानून माने जाते हैं. ये स्थिति तब है जब हाल फिलहाल में भारतीयों को काफी साइबर अपराधों का सामना करना पड़ा.”
रिपोर्ट ने ‘इरादे’ को सरकार की ओर से प्लानिंग की पहलों की गुणवत्ता और मात्रा का माप बताया. प्लानिंग की पहलों में राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीतियां, क्राइसिस प्लान्स और अन्य संबंधित सरकारी प्लानिंग दस्तावेज आते हैं. यह साइबर से जुड़े मुद्दों पर सरकार के "दिखाए बर्ताव" का एक मूल्यांकन है.
रिपोर्ट के अनुसार साइबर क्षमताएं "एक या अधिक साइबर उद्देश्यों से संबंधित देश के उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा का माप थीं. (यानी प्रति वर्ष दायर पेटेंट की संख्या, ग्लोबल टॉप सिक्योरिटी फर्मों की संख्या, कुशल श्रमिकों की संख्या)".
साइबर ताकत को लेकर अमेरिका से होड़ में चीन
साथ ही, हमें यह ध्यान देना चाहिए कि भारत का तत्काल पड़ोसी चीन तीन संकेतकों (सर्विलांस, डिफेंस और कॉमर्शियल) में अव्वल है. और सभी सात संकेतकों में टॉप पांच देशों में शामिल है. यही वजह है कि साइबर ताकत के लिए ओवरऑल रैंकिंग में ये नंबर 2 पर है.
चीन ने अन्य टॉप देशों की तरह अपने उद्देश्य और इरादे साफ तौर पर तय किए हैं. जोन्स ने दोहराया कि भारत के लिए अपनी क्षमताएं बढ़ाना क्यों इतना महत्वपूर्ण है.
जोन्स ने कहा, “भारत को चीन सहित पड़ोसियों की प्राथमिकताओं और उद्देश्यों पर भी ध्यान देना चाहिए. एनसीपीआई में, चीन ‘राष्ट्रीय साइबर और प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा' बढ़ाने का इरादा रखने को लेकर सबसे अधिक स्कोर करने वाला देश है. इसने घरेलू प्रौद्योगिकी उद्योग को विकसित करने के लिए वैध और अवैध साधनों का उपयोग करने की अपनी इच्छा का प्रदर्शन किया है. भारत को व्यावसायिक रूप से संवेदनशील जानकारी की रक्षा करने पर फोकस करना चाहिए, इसे उस तरह के हमलों से बचाना चाहिए जिनका चीनी एक्टर्स को इस्तेमाल करते हुए ऑब्जर्व किया गया है.”
जोन्स कहते हैं, “चीन ‘सूचना पर्यावरण को नियंत्रित और मैनीपुलेट’ करने के मकसद में दूसरा सबसे अधिक स्कोरिंग वाला देश है. भारत को विदेशी प्रोपेगेंडा के मुकाबले के लिए अपनी क्षमता बढ़ानी चाहिए. इसमें विदेशी प्रोपेगेंडा और दुष्प्रचार को पहचान कर उसे निष्क्रिय करना शामिल है. साथ ही कानून मजबूत करने चाहिए जिससे सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे दुष्प्रचार को हटाने के लिए मजबूर किया जा सके.”
यह गौर करना महत्वपूर्ण है कि कोई देश 7 प्रमुख संकेतकों के बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं करता तो वह कम स्कोर कर सकता है. नतीजतन, अधिकतर मापदंडों पर अपने स्पष्ट इरादों की घोषणा करने वाले देश उन देशों की तुलना में अधिक स्कोर करेंगे जो ऐसा करने से हिचकते हैं.
मिसाल के लिए, रूस, चीन, वियतनाम और सऊदी अरब सर्विलांस के लिए टॉप स्कोर करने वालों में शामिल रहे. इसका कारण उनके घरेलू सर्विलांस उद्देश्य हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि ये देश कैसे "अवैध कंटेंट" बंद करते हैं, और उन सभी के पास कानून प्रवर्तन निकाय और इंटेलीजेंस एजेंसियां हैं जिन्होंने ऐसा करने के लिए क्षमताएं विकसित की हैं और आगे भी कर रही हैं.
भारत को साइबर ताकत बढ़ाने की जरूरत
जोन्स के अनुसार, "अगर भारत अभी भी साइबर डोमेन में स्थिर खड़ा रहता है, तो यह साइबर क्षमताओं में अन्य देशों से पिछड़ने के जोखिम में खुद को डालना है.” जोन्स ने साइबर शक्ति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत के लिए कुछ अपने मूल्यवान निष्कर्ष भी बताए.
उन्होंने कहा, "भारत को अपनी आगामी राष्ट्रीय साइबर रणनीति का इस्तेमाल इस तरह करना चाहिए कि वो अपने पास मौजूद या भविष्य में होने वाली साइबर क्षमताओं को बेहतर ढंग से व्यक्त कर सके. ये बता सके कि उसके पास कौन से विदेशी और घरेलू नीति उद्देश्य हैं जिन्हें वो साइबर साधनों के माध्यम से पूरा करना चाहता है. साथ ही भारतीय सशस्त्र बलों और इंटेलीजेंस समुदाय समेत सभी प्रमुख निकायों और संगठनों की भूमिका और जिम्मेदारी के संबंध में स्पष्ट संदेश दिया जा सके. भारत को अपने साइबर सुरक्षा प्रोफेशनल्स के पूल को बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. अपने नागरिकों को यह समझाने में मदद करनी चाहिए कि कैसे अपने उपकरणों को सुरक्षित रखा जा सकता है. इसके अलावा भारत को साइबर अपराधियों या अपने कम्प्युटर नेटवर्क में भेदियों पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए.
दिल्ली पॉलिसी ग्रुप में रिसर्च एसोसिएट और चीन विषयों की जानकार अंतरा घोषाल सिंह का मानना है कि साइबर पावर ऐसा क्षेत्र है जहां भारत को अपनी तैयारियों को ऊंचे स्तर पर ले जाना चाहिए.
सिंह ने इंडिया टुडे से कहा, “यह (साइबरस्पेस) एक ऐसा क्षेत्र है, जहां हमें अपनी तैयारियों को बढ़ाने की जररूत है. चीन का मानना है कि उसकी सेना PLA के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का स्तर "विश्व स्तरीय" है और वो इस मामले में भारत पर बढ़त रखता है. अगर दोनों देशों के बीच बड़े संघर्ष की नौबत आती है तो PLA के एक्शन प्लान में भारतीय सेना के कमांड नेटवर्क, एयर डिफेंस नेटवर्क या रडार नेटवर्क, एयर कमांड नेटवर्क को निशाना बनाने के लिए साइबर हमलों का इस्तेमाल करना भी शामिल होगा.”
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