कोरोना की दूसरी लहर ने पूरे देश में भारी तबाही की है. जिस देश ने कोरोना की पहली लहर पर जीत हासिल की थी, दूसरी लहर की सुनामी ने घुटनों पर ला दिया. अस्पताल में बेड फुल, मरीजों के लिए ऑक्सीजन नहीं और समय रहते एंबुलेंस मिलना भी मुश्किल हो गया. लेकिन इस पहाड़ जैसी चुनौती के बीच भी एक बात ने लोगों के मन में उम्मीद जगाई. सभी को लगने लगा कि दूसरी लहर के बाद भारत हर्ड इम्युनिटी की तरफ बढ़ गया है. अब इस बारे में एक्सपर्ट ने अपनी राय दी है.
हर्ड इम्युनिटी की तरफ भारत?
पहले आपको बता देते हैं कि हर्ड इम्युनिटी का मतलब क्या होता है. आसान शब्दों में जब किसी देश की बड़ी आबादी एक वायरस से संक्रमित हो जाती है या फिर ज्यादातर लोगों को टीका लग जाता है, तब इंसान के शरीर में उस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बन जाती है. जैसे ही ऐसा होता है संक्रमण का खतरा कम हो जाता है और देखते ही देखते महामारी कमजोर पड़ जाती है. अब भारत की बात करें तो दूसरी लहर में सक्रमण काफी तेजी से फैला है, R रेट भी 1.44 रहा है, ऐसे में देश का एक बढ़ा हिस्सा वायरस की चपेट में आया है.
रणदीप गुलेरिया ने क्या बताया?
लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस सब के बावजूद भी भारत हर्ड इम्युनिटी के करीब नहीं पहुंच पाया है. AIIMS के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया बताते हैं कि दिल्ली में कोरोना की सबसे बुरी मार देखने को मिली है. वहां वायरस इतना फैला कि सभी को लगने लगा हर्ड इम्युनिटी वाली स्टेज आ गई है. सीरो सर्वे में भी देखा गया कि 50 से 60 प्रतिशत लोगों के अंदर एंटीबॉडी थी. उन आंकड़ों को देख तो कहा जा सकता था कि दिल्ली में हर्ड इम्युनिटी हो गया है. लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल गई है.
ICMR के आंकड़े क्या कहते हैं?
ICMR की भी माने तो देश की अभी भी एक बड़ी आबादी कोरोना की चपेट में आ सकती है, ऐसे में हर्ड इम्युनिटी की बात करना भी बेमानी हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि हर्ड इम्युनिटी के जरिए किसी देश को महामारी से नहीं बचाया जा सकता है. सारा जोर वैक्सीनेशन पर देना जरूरी है, जिससे उस वारयस के खिलाफ एक पुख्ता हथियार तैयार हो सके. वहीं क्योंकि अब वायरस लगातार अपना स्वरूप बदल रहा है, कई तरह के म्यूटेशन होते दिख रहे हैं, इस वजह से भी हर्ड इम्युनिटी के सहारे नहीं बैठा जा सकता है.