रोजगार की तलाश में रघु गुजरात से दिल्ली आया. उसकी माली हालत ठीक नहीं थी. वो काम की तलाश में था. उसे काम तो नहीं मिला, उल्टा उसका पर्स और कीमती सामान चोरी हो गया. इसी दौरान उसकी मुलाकात राजू नाम के एक शख्स से हुई.
राजू ने उससे कहा कि अगर वो एक किडनी दे देता है तो इतने पैसे मिलेंगे कि उसकी सारी दिक्कतें दूर हो जाएंगी. ना-नुकुर करने के बाद रघु किडनी देने के लिए मान गया. किडनी देने पर रघु को 3.20 लाख रुपये दिए गए.
किडनी निकालने और उसे बेचने का ये सारा खेल राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके हौज-खास में चल रहा था. इस मामले में पुलिस ने दो डॉक्टर समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया है. इस पूरी गैंग का सरगना कुलदीप राय विश्वकर्मा था.
पुलिस के मुताबिक, ये गैंग 20 से 30 साल की उम्र के ऐसे नौजवानों को टारगेट करता था, जिन्हें पैसों की जरूरत होती थी. वो उन्हें पैसे के लिए अपनी किडनी बेचने के लिए मनाता था. पुलिस ने बताया कि ये गैंग अब तक 20 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका था. यानी, रघु अकेला नहीं था बल्कि उसके जैसे और रघु थे, जिनकी गरीबी का फायदा उठाया गया और उनकी किडनी बेची गई.
भारत में मानव अंगों की गैर-कानूनी खरीद-फरोख्त को रोकने के लिए 1994 में कानून बनाया गया था. भारत में मानव अंगों के गैर-कानूनी कारोबार के लिए 5 से 10 साल तक की कैद और 20 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान है. वहीं, मानव टिशू का कारोबार करने पर एक से तीन साल की कैद और 5 से 25 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है. इतना सख्त कानून होने के बावजूद भारत में धड़ल्ले से मानव अंगों की खरीद-फरोख्त जारी है.
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कितना बड़ा है मानव अंगों का कारोबार?
- दुनियाभर में मानव अंगों की मांग बढ़ रही है, लेकिन इसकी तुलना में डोनर नहीं हैं. इस कारण गैर-कानूनी तरीके से मानव अंगों की तस्करी और खरीद-फरोख्त बढ़ रही है.
- ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी (GFI) के मुताबिक, हर साल जितनी ऑर्गन ट्रांसप्लांट होते हैं, उसमें से 10% तस्करी के जरिए होते हैं. सबसे ज्यादा तस्करी किडनी की होती है.
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, हर साल 10 हजार से ज्यादा किडनी की तस्करी होती है. वहीं, भारत में हर साल 2 हजार लोग अपनी किडनी बेच देते हैं. ये आंकड़ा 2007 का है. जाहिर है कि इसमें और इजाफा हुआ होगा.
- दुनिया के ज्यादातर देशों में मानव अंगों को खरीदना और बेचना गैर-कानूनी है. ईरान इकलौता देश है जहां ऐसा करना कानून के दायरे में आता है.
- GFI के मुताबिक, दुनियाभर में मानव अंगों का कारोबार 1.7 अरब डॉलर यानी 13 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है. ये आंकड़ा भी 2017 तक का ही है.
1 करोड़ में बिकती है किडनी
मानव अंगों का गोरखधंधा करने वाले लोग भोले-भाले और गरीबों को अपना शिकार बनाते हैं. ये गरीबों को पैसे का लालच देते हैं और उनसे अपने अंग बेचने को कहते हैं. सबसे ज्यादा मांग किडनी की होती है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक किडनी 1 करोड़ रुपये के आसपास बिकती है. जरूरत के हिसाब से ये कीमत कम-ज्यादा हो सकती है. वहीं, जो किडनी देता है, उसे सिर्फ 3 लाख रुपये ही मिलते हैं. बाकी पूरा पैसा ये पूरा काला कारोबार चलाने वाले आपस में बांट लेते हैं.
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लेकिन, इसकी वजह क्या है?
इतना सख्त कानून होने के बावजूद भी मानव अंगों की तस्करी का ये खेल कैसे और क्यों चल रहा है? इसकी तीन बड़ी वजहें हैं.
1. कर्जः अपना कर्ज चुकाने के लिए लोग किडनी या दूसरे अंग बेचने को तैयार रहते हैं. 2002 में तमिलनाडु के चेन्नई में एक स्टडी हुई थी. इसमें किडनी बेच चुके 305 लोगों से कारण पूछा गया था, तो इनमें से 96% ने कर्ज को बड़ी वजह बताया था. नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस (NSSO) के आंकड़े बताते हैं कि 2018 तक भारत में 22.4% शहरी परिवार और 35% ग्रामीण परिवारों पर कर्ज था.
2. बेरोजगारी और गरीबीः भारत में गरीबी और बेरोजगारी भी लोगों को अपने अंग बेचने को मजबूर कर रही है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के मुताबिक, अक्टूबर से दिसंबर 2021 की तिमाही में बेरोजगारी दर 8.7% रही. वहीं, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की हाल में आई एक रिपोर्ट बताती है कि देश में 90 करोड़ लोग नौकरी के योग्य हैं, इनमें से 45 करोड़ लोगों ने नौकरी की तलाश करना छोड़ दिया है. जबकि, 2011-12 के आंकड़ों बताते हैं कि देश में अभी भी 22 फीसदी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे आते हैं.
3. डिमांड एंड सप्लाईः मानव अंगों की डिमांड ज्यादा है, लेकिन इसकी सप्लाई कम है. इस कारण गैर-कानूनी तरीके से तस्करी होती है. 4 मार्च 2016 को लोकसभा में सरकार ने बताया था कि देश में 2 लाख किडनी की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 6 हजार उपलब्ध है. इसी तरह 30 हजार लिवर की जरूरत है, जबकि उपलब्ध सिर्फ डेढ़ हजार है. वहीं, 50 हजार हार्ट की जरूरत है और 15 ही उपलब्ध है. इस वजह से अमीर लोग तस्करों के जरिए ज्यादा पैसा देकर अंग खरीदते हैं.
भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट और तस्करी का इतिहास
- 1760 में जॉन हंटर ने पहली बार 'ट्रांसप्लांट' शब्द का जिक्र किया था. 18वीं सदी की शुरुआत से ही वैज्ञानिकों ने इंसानों और जानवरों में ऑर्गन ट्रांसप्लांट का एक्सपेरिमेंट शुरू कर दिया था. 1954 में पहली बार बोस्टन के एक अस्पताल में किडनी का ट्रांसप्लांट किया गया था.
- भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट का इतिहास 1960 के दशक से शुरू होता है. 1960 में इंदौर के एक अस्पताल में पहली बार कॉर्निया का ट्रांसप्लांट हुआ था. इसके बाद 1967 में मुंबई के अस्पताल में किडनी का ट्रांसप्लांट हुआ.
- 1994 तक भारतीयों को हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए विदेश जाना पड़ता था. 3 अगस्त 1994 को दिल्ली एम्स में पहली बार सफल हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ. वहीं, 1998 में सिंगापुर के सर्जन्स की मदद से चेन्नई के अस्पताल में पहली बार लिवर का ट्रांसप्लांट किया गया.
- 2005 में पहली बार मुंबई के अस्पताल में ओवरी का ट्रांसप्लांट किया गया. अब भारत में हर साल 17 से 18 हजार ट्रांसप्लांट हर साल होते हैं. ये संख्या अमेरिका और चीन के बाद सबसे ज्यादा है.
- भारत में मानव अंगों के अवैध कारोबार का इतिहास 1980 से शुरू होता है. तब गल्फ कंट्रीज के लोग भारत आकर गरीबों से उनके अंग खरीदते थे. उस समय खुलासा हुआ था कि संयुक्त अरब अमीरात और ओमान से 130 मरीजों ने मुंबई आकर किडनी खरीदी थी. लेकिन उस समय मानव अंगों के अवैध कारोबार को लेकर भारत में कोई कानून नहीं था.