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जलवायु परिवर्तन पर बोले जावड़ेकर... पिछले 100 सालों का नतीजा, भारत सुधार के लिए कर रहा काम

जलवायु परिवर्तन को लेकर उन्होंने कहा कि इसके लिए अकेले भारत जिम्मेदार नहीं है और इस बदलाव के लिए हाल की घटनाएं जिम्मेदार नहीं हैं.

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जलवायु परिवर्तन पर क्या बोले प्रकाश जावड़ेकर (पीटीआई)
जलवायु परिवर्तन पर क्या बोले प्रकाश जावड़ेकर (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 12 दिसंबर को वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन
  • पीएम मोदी सम्मेलन को करेंगे संबोधित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 दिसंबर को वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शुक्रवार को इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि पीएम मोदी 12 दिसंबर को ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते की पांचवीं वर्षगांठ पर वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे.

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जलवायु परिवर्तन को लेकर उन्होंने कहा कि इसके लिए अकेले भारत जिम्मेदार नहीं है और इस बदलाव के लिए हाल की घटनाएं जिम्मेदार नहीं हैं. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन रात भर की घटना नहीं है, यह पिछले सौ सालों में की गई गतिविधियों का नतीजा है. 

उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संयुक्त राज्य अमेरिका का योगदान 25% है, यूरोप का 22%, जबकि चीन का 13% और भारत का केवल 3% है. हम इस जलवायु परिवर्तन के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं हैं. बल्कि भारत एक जिम्मेदार देश के रूप में उत्सर्जन को कम करने के लिए कदम उठा रहा है. 

उन्होंने कहा कि पेरिस जलवायु समझौते के अनुसार हमारी उत्सर्जन तीव्रता 33.35 फीसदी तक तक कम होनी थी, हमने इसका 21 फीसदी गैस का उत्सर्जन कम कर लिया है. शेष लक्ष्य को हम आगामी 10 वर्षों में हासिल कर लेंगे. 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को जलवायु महत्वाकांक्षी शिखर सम्मेलन में बोलेंगे, पेरिस समझौते को अपनाने की पांचवी वर्षगांठ मनाई जा रही है जिसे संयुक्त राष्ट्र और यूनाइटेड किंगडम द्वारा आयोजित किया जा रहा है. 

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क्या है पेरिस समझौता?

समझौते के तहत प्रावधान है कि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और यह कोशिश बनाए रखना कि वो 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न बढ़ने पाए. मानवीय कार्यों की वजह से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना कि पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोखते रहें.

समझौते के तहत हर पांच साल में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना भी उद्देश्य है. साथ ही इसमें विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने की बात भी कही गई है.

हालांकि यह समझौता विकसित और विकासशील देशों पर एक सामान नहीं लागू किया जा सकता था. इस कारण से समझौते में विकासशील देशों के लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए आर्थिक सहायता और कई तरह की छूटों का प्रावधान किया गया.

ट्रंप का कहना था कि भारत और चीन इस पर कुछ खास नहीं कर रहे थे. भारत को लगातार इस मुद्दे पर विदेशी मदद मिल रही है. 2015 में भारत को 3.1 बिलियन डॉलर की मदद मिली थी, जिसमें से कुल 100 मिलियन डॉलर की मदद तो सिर्फ अमेरिका ने ही की थी.

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