India Today Conclave 2021 के स्वागत भाषण में इंडिया टुडे समूह के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी ने कोरोना संकट की बात करते हुए कहा कि इसे अब एक अवसर की तरह लेना चाहिए और अब पीछे मुड़कर नहीं बल्कि भविष्य की ओर देखना चाहिए. उन्होंने कहा कि हर संकट एक अवसर भी लेकर आता है. यहां पेश है उनकी पूरी स्पीच...
लेडीज एवं जेंटलमैन,
गुड मॉर्निंग
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2021 में आपका हार्दिक स्वागत है. आप सबको यहां जुटा देखकर मुझे दोहरी खुशी हो रही है. आप सब यहां आए इसके लिए मैं आपकी सराहना करना चाहूंगा. लेडीज एवं जेंटलमैन, यह हमारे कॉन्क्लेव का 19वां संस्करण है. आप सबके सहयोग के लिए धन्यवाद.
पिछले साल मार्च 2020 में हमें कोविड की वजह से कॉन्क्लेव रद्द करना पड़ा था. तो इस बार हम असामान्य परिस्थतियों में मिल रहे हैं, जो कि ऐसे अस्तित्व एवं सामाजिक दूरी के नियमों से बंधा है, जिसकी वजह से हमारे लिए पहले जैसे आसान और परिचित तरीके से मिलना कठिन है.
एक तरह से यह हमारे समय का रूपक हो गया है.
पिछले 18 महीने काफी ज्यादा उथल-पुथल, नुकसान और अनिश्चितता के रहे हैं. हमने काफी भयावह महामारी का सामना किया है. हमने दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकतों को भी कमजोर बुनियादी ढांचे की वजह से लड़खड़ाते देखा है. हमने मेडिकल ऑक्सीजन की अभूतपूर्व तंगी का सामना किया और अपने प्रियजनों को पीड़ित होते देखा है.
हमने यह देखा है कि बाढ़, आग, तूफान जैसे कठोर प्राकृतिक वातावरण किस तरह से दुनिया को तबाह करते रहे. हमने बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन और भारी आर्थिक असमानता देखी. दुनिया में बुरी तरह से राजनीतिक विभाजन, उग्र प्रदर्शन, लोगों की मौतें और अशक्त कर देने वाले डिजिटल डिवाइड का दौर रहा. लाखों बच्चे स्कूलों की पढ़ाई से बाहर हो गए और अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं. बहुत से लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. व्यक्तिगत तौर पर भी बहुत से लोगों ने अतिशय अकेलेपन और अलगाव का सामना किया है. अवसाद और मानसिक सेहत की समस्याएं काफी बढ़ गई हैं.
एक पंक्ति में कहें तो यह विनाशकारी, हृदय विदारक और अस्थिरता का दौर रहा है.
लेकिन हर संकट कुछ नए परिकल्पना के लिए एक अवसर भी होता है. मानव का स्वभाव बुनियादी रूप से काफी जीवटता का होता है. मैं भी फिर शुरू करना, फिर से जुड़ना और नए सिरे से जीना चाहता हूं.
इसलिए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के इस 19वें संस्करण की थीम है- अ बेटर नॉर्मल यानी बेहतर सामान्य दौर. अगले दो दिनों में हम ज्यादा समय पीछे मुड़कर देखने में नहीं बल्कि आगे देखने में लगाएंगे. हम नए विचारों और चीजों को करने के नए तरीकों पर बात करेंगे. समस्याओं पर बात इनके समाधान निकालने की उम्मीद के साथ होगी.
भारत और दुनिया फिलहाल चार गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है.
पहला है जलवायु परिवर्तन जिसे हम अपने आसपास देख रहे हैं. जानकारों ने इसे ‘मानव इतिहास का सबसे निर्णायक दशक’ बताया है. हमें यदि मानवता को बचाना है तो अब विचार-विमर्श का समय खत्म हो गया, अब एक्शन यानी कार्रवाई का समय है.
आप यह मत सोचिए कि इसका असर आप पर नहीं होगा. भारत ने साल 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कम से कम 33 फीसदी तक कटौती की प्रतिबद्धता जाहिर की है. यह हमारे जीने के तरीके में कई तरह के बदलाव लाने वाला है. हमें भारत को हरित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए इनोवेटिव तरीके अपनाने होंगे.
दूसरी चुनौती है, महामारी और जन स्वास्थ्य. हम कोरोना वायरस के साथ किस तरह से रहेंगे और निकट भविष्य में हमें क्या करने की जरूरत होगी? कोरोना वायरस करीब दो साल तक हमारे दिमाग में बसा रहा है.
अब भी कई चीजें अज्ञात हैं. विभिन्न वैक्सीन की प्रभावशीलता कब तक रहेगी? वायरस किस तरह से रूपांतरित होगा? क्या वास्तव में कोई हर्ड इम्युनिटी जैसी चीज है? महामारी कब खत्म होगी? और ऐसे कई अन्य सवाल हैं. हमें साथ मिलकर इनके जवाब तलाशने होंगे और बेहतर एवं मजबूत स्वास्थ्य सुविधाओं पर जोर देना होगा.
तीसरी चुनौती है, अर्थव्यवस्था की. महामारी से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में गोता लगा है. हर देश यह जानने को परेशान है कि आगे किस तरह का सुधार होगा. अर्थशास्त्री तो अक्षरों पर आधारित कई तरह के मॉडल दे रहे हैं- K शेप या V शेप या U शेप या यहां तक कि Z शेप भी.
भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के पहले भी छह तिमाहियों तक गिरावट का सामना करती रही. इसके बाद महामारी का झटका आ गया. वायरस को फैलने से रोकने के लिए देश में कई बार लॉकडाउन लगाना पड़ा. इसका नतीजा यह रहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने हाल के इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट का सामना किया. दुनिया की अर्थव्यवस्था में भी उथल-पुथल है, वैश्विक सप्लाई चेन टूटता दिखा है.
देश को इस कठिन आर्थिक दौर से बाहर निकालने में कौन-से उपाय मदद कर सकते हैं? बदलती दुनिया में भारत के लिए नए अवसर क्या हो सकते हैं? बाजारों में क्या हो रहा है? और क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया क्या है?
मैं व्यक्तिगत रूप से यह देखकर खुश हूं कि निजीकरण और मौद्रीकरण हमारी राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा हो गया है. अतीत की तरह अब ये गंदे शब्द नहीं माने जाते. यह बदलाव लंबे समय से अपेक्षित था.
चौथी चुनौती यह है कि वैश्विक स्तर पर ताकत में बदलाव हो रहा है. अब चीन काफी आक्रामक है और अमेरिका आत्मकेंद्रित हो गया है. यह सब अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर जाने और तालिबान के उभरने की छाया में हो रहा है. तो ऐसा लगता है कि वैश्विक कूटनीति का अगला केंद्रबिंदु हमारा पड़ोस ही होगा. हम एक अस्थिर क्षेत्र में रह रहे हैं और 9/11 की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर यह याद करने में समझदारी है कि अफगानिस्तान में जो कुछ भी होता है उसका बाकी दुनिया में भी असर होता है.
पिछले दो साल में हमनें ताकत के केंद्र में भारी बदलाव देखा है- एक बहुध्रुवीय दुनिया का उभार, एक विस्तारवादी चीन, एक ‘बंधा हुआ अमेरिका’ और तालिबान की वापसी. लेकिन इन छोटे शब्दों की गहराई में कई जटिलताएं छुपी हुई हैं.
चीन उभर रहा है, लेकिन यह सुस्त और उम्रदराज होता दिख रहा है. अमेरिका अब विदेशी नीति में हस्तक्षेप करने के अपने चलन से पीछे हटने के मूड में दिख रहा है, हालांकि वह अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत है. तालिबान का भी जोर इस बात पर है कि वह बदल गया है, जबकि उस पर नियंत्रण ज्यादातर कट्टर धड़ों का ही है. पाकिस्तान पर्दे के पीछे से अपनी कुटिल चालें चल रहा है.
मेरा मानना है कि अफगानिस्तान में हाल के घटनाक्रम भारत के लिए एक साफ और मौजूदा खतरा पेश कर रहे हैं. इसलिए सवाल यह है कि हमें ताकत के इस जटिल व्यूह का सामना किस तरह से करना चाहिए?
कॉन्क्लेव के कार्यक्रम इन प्रमुख विषयों को ही ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं. हमारे पास इन विषयों पर बात रखने वाले बेहतरीन वक्ताओं का गुलदस्ता है. पुलिट्जर प्राइज विजेता, जनरल, एकेडमिक जगत के लोग, डॉक्टर, एथलीट, एक्टर, इकोनॉमिस्ट, कारोबारी, खिलाड़ी, जलवायु के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट, उद्यमी, राजनीतिज्ञ और दुनिया भर के कई ऐसे थॉट लीडर जो एक बेहतर भविष्य बनाने का जुनून रखते हैं. यह खचाखच भरा रहने वाला एक कार्यक्रम है जिसमें करीब 78 वक्ता होंगे. इसलिए विचारों की सुनामी के लिए आप सब तैयार रहें.
हम आज एक कोविड की दुनिया में रह रहे हैं. हम इसके साथ सबसे अच्छे तरीके से कैसे रह सकते हैं, इसे सीखना ही होगा. हमारे सार्वजनिक और निजी जीवन का हर क्षेत्र बदल गया और आगे भी बदलेगा.
महामारी ने हमें एक चीज सिखाया है कि ‘हम सब इसमें एक साथ हैं’. वायरस किसी भी तरह की सीमा से नहीं बंधा होता.
हर किसी को इसका सामना करना पड़ सकता है.
हम नए सिरे से सोचने के लिए कह रहे हैं.
हमें निश्चित रूप से ‘अ बेटर नॉर्मल’ तैयार करना होगा.
मुझे उम्मीद है कि यह कॉन्क्लेव आपको इस रास्ते पर ले जाएगा.
हैप्पी कॉन्क्लेविंग.