इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट (India Today Conclave East) के 5वें संस्करण के पहले दिन कलात्मक महत्वाकांक्षाएं और व्यावसायीकरण (Artistic Aspirations vs Commercial) विषय पर चर्चा की गई. इस पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और फिल्म निर्माता व फिल्म समीक्षक उत्पाल बोरपुजारी (Utpal Borpujari), फिल्म निर्माता नीला माधब पांडा (Nila Madhab, कलाकार पारेश मैती (Paresh Maity) और अभिनेता कपिल बोरा (Kapil Bora) शामिल रहे.
कलात्मक महत्वाकांक्षाएं और व्यावसायीकरण पर उत्पाल बोरपुजारी का कहना है कि केवल अच्छी कला ही कमर्शियल तौर पर रह सकती है. आपको अपने काम में सच्चा होना पड़ेगा, तभी ये लंबे समय तक टिकेगी. वहीं सच यह भी है कि क्रिएटिविटी को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए, आर्थिक मदद की भी जरूरत होती है.
कलाकार का पेट कैसे भरेगा?
कॉमर्स और क्रिएटिविटी के बीच के इस समीकरण पर नीला माधब पांडा ने कहा कि डांस, संगीत, सिनेमा, पेंटिंग, के बिना एक दुिनया की कल्पना कीजिए. इंसान ही अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकता है. पूरे दिन के काम के बाद आपके पास मनोरंजन ही बचता है. लेकिन मुझे बुरा लगता है कि आज भी हम मूल्यों, आकांक्षाओं और कॉमर्स की बात करते हैं. जैसे हमें खाने और कपड़े की ज़रूरत होती है उसी तरह हमें मनोरंजन की भी जरूरत है. लेकिन कलाकार का पेट कैसे भरेगा. उन्होंने खुद का उदाहरण देकर समझाया कि आज फिल्म मेकर के अलावा मैं सेल्समैन भी हूं. मुझे फिल्म बनाने के साथ-साथ फिल्म को बेचना भी आना चाहिए. उन्होंने कहा कि लोग अक्सर कलाकारों से पूछते हैं कि वे कला को क्यों बेचते हैं, तो मेरा जवाब यही होता है कि फिर बिल कौन भरेगा?
'लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ नहीं रहतीं'
हालांकि, चित्रकार पारेश मैती के विचार थोड़े अलग थे. उन्होंने कहा कि अगर आप पैसा बनाने के बारे में सोचते हैं, तो यह कला नहीं है. आप एक निश्छल बच्चे की तरह काम करें, कुछ न सोचें, सिर्फ कला पर काम करें और सरस्वती की पूजा करें, तो लक्ष्मी स्वयं आपके पास आएंगी. आप दोनों को जोड़ नहीं सकते, क्योंकि लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ नहीं रहतीं. इसलिए एक अच्छी कला बनाने के बारे में सोचें. अगर उसपर पैसा आता है, तो वह बोनस है.
'पहले क्रिएटिव सैटिस्फेक्शन के लिए फिल्में बनती थीं'
आजकल करोड़ों और हजार करोड़ की फिल्में बनती हैं. सत्यजीत रे लोगों से रुपए उधार लेकर फिल्में बनाते थे. इसपर कपिल बोरा ने कहा कि 1935 से जब से असमिया फिल्में बनना शुरू हुईं, लोगों ने फिल्में इसलिए बनाईं कि लोगों तक वे अपनी कहानियां पहुंचा सकें. तब पैसा कमाना ध्येय नहीं था, वे बस चाहते थे कि लोगों को कहानियों का पता लगे, वे खुद को रचनात्मक रूप से संतुष्ट करना चाहते थे. वे भी पैसा उधार लेकर फिल्में बनाते थे.
हर भाषा की फिल्म में पोटेंशियल है, बशर्ते..
उत्पाल बोरपुजारी ने कहा कि हर तरह का सिनेमा चलता है. हिंदी हो, तेलुगू हो या फिर भोजपुरी हर भाषा की फिल्मों के आगे बढने की संभावना होती है, बशर्ते उसकी मार्केटिंग अच्छे से की गई हो. अब दर्शक बढ़ गए हैं. फिल्में जिन्हें केवल फेस्टिवल में ही देखा जाता था, वे अब ओटीटी के माध्यम से सबके सामने हैं. ओटीटी पर भी फिल्में होती हैं, लेकिन किसी को पता नहीं चलता, जब तक कि वह प्लेटफॉर्म उसका प्रचार न करता हो.