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Kargil Vijay Diwas 2024: कारगिल जंग के दौरान LoC पार करने की तैयारी में था भारत? शरीफ ने क्लिंटन से लगाई थी गुहार, फिर...

Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध के दौरान भारत वास्तव नियंत्रण रेखा (LoC) पार करने की तैयारी में था. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि पाकिस्तानी घुसपैठिये भारतीय क्षेत्र से वापस नहीं लौटे तो भारत उन्हें किसी भी तरह से बाहर निकाल देगा.

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कारगिल युद्ध के दौरान बिल क्लिंटन के पास पहुंच गए थे नवाज शरीफ
कारगिल युद्ध के दौरान बिल क्लिंटन के पास पहुंच गए थे नवाज शरीफ

Kargil Vijay Diwas 2024: कारगिल युद्ध के दौरान मातृभूमि के लिए अपने जान न्योछावर करने वाले वीर जवानों को देश आज एक बार फिर से याद कर रहा है. आज कारगिल विजय दिवस के आज 25 साल पूरे हो गए हैं, यही वह दिन है जब भारतीय सेना ने अद्भुत साहस और अदम्य शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तान को कारगिल की लड़ाई में शिकस्त दी थी. इस युद्ध से जुड़ा एक किस्सा ऐसा भी है जब भारत ने लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार करने की तैयार कर ली थी और तत्कालीन पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ को अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से गुहार लगानी पड़ी थी.

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पाक‍िस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ लंबे समय तक इस संघर्ष से अंजान होने का नाटक कर रहे थे जबकि वो जानते थे कि घुसपैठियों और सैनिकों की बदौलत पाकिस्तान फौज ने कारगिल में भारतीय ठिकानों पर कब्जा करने की नाकाम कोशिश की है. जैसे ही भारत की तरफ से पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब मिला और मुंह की खानी पड़ी तो तब शरीफ युद्ध के बीच मदद मांगने और सत्ता बचाने की खातिर भागे-भागे अमेरिका पहुंचे. 

क्लिंटन के रूख से हैरान रह गए थे शरीफ
हालांकि, अमेरिका के तत्‍कालीन राष्‍ट्रप‍ति बिल क्लिंटन ने उन्‍हें किसी भी तरह की मदद देने से इंकार करते हुए कहा था कि पाकिस्‍तान को अपनी सेना वहां से हटानी ही होगी. इस वजह से राष्ट्रपति क्लिंटन इतिहास में अमेरिका के पहले राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ भारत का समर्थन किया था. उन्होंने कारिगल युद्ध के दौरान जोर देकर कहा था कि पाकिस्तान को कारगिल से नियंत्रण रेखा (एलओसी) के अपने हिस्से में वापस जाना चाहिए. 

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उन्होंने जम्मू- कश्मीर के मुद्दे के हल होने तक कारगिल पर कब्जा जारी रखने के  पाकिस्तान द्वारा पेश किए गए हर तर्क को खारिज कर दिया था. इसके अलावा, उन्होंने सुझाई गई इस शर्त को स्वीकार नहीं किया कि उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने के लिए सहमत होना चाहिए.

अमेरिका के इस नए रुख ने भारत और पाकिस्तान दोनों को चौंका दिया था क्योंकि इस्लामाबाद ने सोचा था कि अमेरिका हमेशा की तरह उसका समर्थन करेगा और भारत को उम्मीद नहीं थी कि अमेरिका इस मुद्दे का गुण-दोष के आधार पर फैसला करेगा. क्लिंटन के इस स्‍टैंड से शरीफ हैरान रह गए. कारगिल युद्ध के बीच यह पाकिस्‍तान की कूटनीतिक हार थी. दरअसल, क्लिंटन ने ये फैसला यूं ही नहीं लिया था, उस समय कारगिल पर हमला करने की साजिश के बारे में भारत ने जो सबूत अमेरिका को दिए थे वह सबूत अमेरिकी खुफिया जानकारी से मेल खाते थे.

एलओसी पार करने की थी तैयारी!
कारगिल युद्ध के दौरान भारत वास्तव नियंत्रण रेखा (LoC) पार करने की तैयारी में भी था. पत्रकार बरखा दत्त अपनी किताब 'द अनक्वाइट लैंड - स्टोरीज फ्रॉम इंडियाज फॉल्ट लाइन्स' में लिखती हैं कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को एक ‘गुप्त पत्र’ भेजा था, जिसमें उन्होंने साफ कर दिया था, 'यदि पाकिस्तानी घुसपैठिए भारतीय क्षेत्र से वापस नहीं लौटे, तो हम उन्हें किसी न किसी तरह से बाहर निकाल फेंकेगे.'

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दत्त ने पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा के साथ हुए अपने एक साक्षात्कार का जिक्र किया जिसमें उन्होंने  कहा था: “नियंत्रण रेखा (एलओसी) को पार करने की संभावना से इनकार नहीं किया गया था, न ही परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावना से इनकार किया गया था.”

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युद्ध का नया मोर्चा खोलने की थी तैयारी

दत्त ने यह भी लिखा है कि भारतीय सेना के पास ‘छह दिवसीय युद्ध’ की आकस्मिक योजना थी,जिसमें सैनिकों को इस तरह से तैनात करने की योजना थी कि यदि आवश्यक हुआ तो भारत और पाकिस्तान को अलग करने वाली सीमा को एक सप्ताह से भी कम समय में पार किया जा सके.

पुस्तक में खुलासा किया गया है कि भारतीय सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री से साफ शब्दों में कहा था कि अगर हम कारगिल में पहले जैसी स्थिति हासिल नहीं कर लेते हैं, तो मुझे कहीं और हमला करना होगा. उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि उपमहाद्वीप के दूसरे हिस्से में जल्द ही एक नया युद्ध मोर्चा खोला जा सकता है - जिसमें,बॉर्डर को क्रॉस करना तक शामिल है."

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री वाजपेयी को मनाने के बाद भारत के जनरल वी.पी. मलिक ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से एक सेना ब्रिगेड को पश्चिमी सीमा पर भेज दिया था. साथ ही, नौसेना के पूर्वी बेड़े को बंगाल की खाड़ी से अरब सागर में ले जाया गया था. भारत और पाकिस्तान दोनों चाहते थे कि अमेरिका हस्तक्षेप करे, लेकिन उनकी शर्तों पर. इसलिए जब क्लिंटन ने वाजपेयी को फोन करके वादा किया कि अमेरिका पाकिस्तान पर भारतीय क्षेत्र से अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए काम कर रहा है, तो प्रधानमंत्री चुप रहे.

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मुशर्रफ को पड़ी थी अमेरिकी कमांडर की डांट
किताब में बताया गया है कि दो दिन बाद क्लिंटन ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर-इन-चीफ एंथनी ज़िन्नी को पाकिस्तान भेजा. पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कश्मीर पर अमेरिकी मध्यस्थता के लिए दबाव डाला. ज़िन्नी ने मुशर्रफ़ से दो टूक कहा, “मेरा मकसद कारगिल है, कश्मीर नहीं. अगर आप पीछे नहीं हटते, तो आप अपने ही देश पर युद्ध और परमाणु विनाश लाद देंगे.”  इसके बाद पाकिस्तान के पास पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं बचा और परिणाम यह हुआ कि कारगिल युद्ध में उसे मुंह की खानी पड़ी.

पाकिस्तान ने तोड़ा था समझौता
 1999 से पहले भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था कि दोनों ही देश के सैनिक सर्दियों में उन इलाकों में अपने जवानों की तैनाती नहीं करेंगे जहां पर बर्फ जमा होगी.भारत ने तो इस समझौते का पालन किया लेकिन पाकिस्तान ने धोखे के तहत सर्दियों में इन पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था. इसमें द्रास, टाइगर हिल और कारगिल समेत कई अहम इलाकों पर वो पहुंच गए थे. करीब 134 किमी के दायरे में पाकिस्तानियों ने अपनी पैठ बना ली थी.

भारत का ऑपरेशन विजय

इसके बाद भारत जैसे ही भारत को पता चला कि सीमा के अंदर घुसपैठ हो गई है  तो  फिर पाकिस्तानी सेना घुसपैठिए को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया गया.  कारगिल की लड़ाई 3 मई 1999 से 26 जुलाई 1999 तक लड़ी गई थी. 26 जुलाई को भारतीय सेना ने जीत हासिल की थी. तब से इस तारीख को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है. कारगिल युद्द के दौरान 3 महीने में भारत ने अपने 527 जवानों को खोया था. इस युद्द में 1363 जवान घायल हुए थे.
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