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मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक हस्तक्षेप याचिका दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि जेंडर आधारित विशिष्ट कानूनों का दुरुपयोग चिंता का विषय है. मैरिटल रेप का अपराधीकरण भारत में विवाह और परिवार की संस्था को अस्थिर कर देगा. 

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सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक हस्तक्षेप याचिका दाखिल की गई है. याचिका मे मैरिटल रेप के अपराधीकरण की मांग वाली दलीलों का विरोध किया गया है. याचिका में कहा गया है कि जेंडर आधारित विशिष्ट कानूनों का दुरुपयोग चिंता का विषय है. मैरिटल रेप का अपराधीकरण भारत में विवाह और परिवार की संस्था को अस्थिर कर देगा.

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याचिका में जेंडर बेस्ड कई कानूनों का हवाला दिया गया है और बताया गया है कि कैसे इन कानून का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग किया जा रहा है. याचिका में मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाए जाने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज किए जाने की मांग की गई है.

15 फरवरी तक जवाब दाखिल करे केंद्र
मैरिटल रेप यानी पति के पत्नी से जबरन संबंध बनाने को बलात्कार के दायरे में लाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट 14 मार्च से सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र से 15 फरवरी तक जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. पिछले साल यानी 16 सितंबर 2022 को मेरिटल रेप अपराध है या नहीं ? इस पर सुप्रीम कोर्ट परीक्षण करने को तैयार हो गया था.

कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. भारतीय कानून में फिलहाल मैरिटल रेप कानूनी तौर पर अपराध नहीं है. हालांकि, इसे अपराध घोषित करने की मांग को लेकर कई संगठनों की ओर से लंबे वक्त से मांग चल रही है. सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग की गई है.

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हाईकोर्ट के 2 जजों ने दिया था अलग-अलग फैसला
11 मई 2022 को दिल्ली हाईकोर्ट के 2 जजों ने अलग-अलग फैसला दिया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों जजों की राय एक मत नहीं दिखी. इसी के चलते दोनों जजों ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए प्रस्तावित किया था. सुनवाई के दौरान जहां बेंच अध्यक्षता करने वाले जस्टिस राजीव शकधर ने मैरिटल रेप अपवाद को रद्द करने का समर्थन किया था. वहीं जस्टिस सी हरि शंकर ने कहा कि IPC के तहत अपवाद असंवैधानिक नहीं है और एक समझदार अंतर पर आधारित है.

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