जमात-ए-इस्लामी हिन्द ने इलेक्टोरल बॉन्ड पर चिंता जताई है. संस्था ने कहा कि भारत में जिस तरह से राजनीतिक दलों को चुनावों में फंडिंग की जाती है और चुनाव लड़े जाते हैं, वे चिंता का विषय हैं. जमात-ए-इस्लामी हिन्द के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह बात कही.
सलीम इंजीनियर ने बताया कि 2019 के लोकसभा चुनावों में कई हजार करोड़ रुपये खर्च हुए जो दुनिया का अब तक का सबसे महंगा चुनाव था. इलेक्टोरल बॉन्ड पर संशय जताते हुए उन्होंने कहा कि हमारे राजनेताओं द्वारा अपना खजाना भरने के लिए सरल तरीका इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए फंडिंग का है. उन्होंने कहा कि चुनावी बॉन्ड गुमनाम होते हैं. वित्त अधिनियम 2017 में संशोधन करके सरकार ने राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के जरिए प्राप्त चंदे का खुलासा करने से छूट दे दी है. लेकिन चूंकि ये बॉन्ड सरकारी स्वामित्व वाले बैंक (SBI) द्वारा बेचे जाते हैं, इसलिए सरकार के लिए यह जानना आसान होता है कि विपक्ष को कौन फंडिंग कर रहा है.
प्रोफेसर सलीम ने राजनीतिक दलों से अपील की कि उन्हें एक साथ आना चाहिए. उन्होंने मांग की कि पूरी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बना कर चुनावों में धन बल के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए कानून लाना चाहिए.
संविधान में संशोधन की मांग
प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 341 में उपयुक्त संशोधन किया जाए ताकि दलित हिन्दुओं, बौद्धों और सिखों के अलावा ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को आरक्षण का लाभ मिले. ये बातें उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहीं.
अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म से अलग करने की मांग
प्रोफेसर सलीम ने रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों का हवाला दिया और कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म से पूरी तरह अलग किया जाना चाहिए. उन्होंने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को संज्ञान में लाया और बताया कि धर्मांतरण के बाद दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है.
हेट स्पीच पर SC की टिप्पणी का स्वागत
संगठन ने हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत किया और कहा कि जमात अदालत के आदेश की सराहना करती है, जिसमें कहा गया है कि संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करने वाले बंधुत्व की परिकल्पना करता है और देश की एकता और अखंडता प्रस्तावना में निहित मार्गदर्शक सिद्धांतों में से एक है.
जमात-ए-इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय मीडिया सचिव सैयद तनवीर अहमद ने चार एनसीएफ (राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा) में से पहले दस्तावेज के प्रकाशन का स्वागत किया. हालांकि उन्होंने कहा कि स्कूलों के फाउंडेशन स्टेज (2022) के लिए एनसीएफ को महत्वपूर्ण समीक्षा और परामर्श प्रक्रिया की गहनता की आवश्यकता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि वर्तमान दस्तावेज और भविष्य के एनसीएफ को अधिक समावेशी, सामाजिक रूप से न्याय संगत और साझा सहमति वाले संवैधानिक मूल्यों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित किया जाएगा. अहमद ने एनसीएफ के गठन से पहले की परामर्शी प्रक्रिया की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर भी चिंता जताई है. एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि जमात-ए-इस्लामी हिन्द ने शिक्षा मंत्रालय से संपर्क करने के साथ-साथ एनसीएफ के लिए राष्ट्रीय संचालन समिति को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करने के साथ निकट भविष्य में इन सिफारिशों को सार्वजनिक रूप से एकजुट होकर प्रस्तुत करने की भी योजना है. सैयद तनवीर अहमद जमात-ए-इस्लामी हिन्द के मर्कजी तालीमी बोर्ड के निदेशक भी हैं.