प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सोमवार को इस दावे की निंदा की कि अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की प्रसिद्ध दरगाह एक शिव मंदिर के ऊपर बनाई गई है. उन्होंने सरकार से ऐसे दावों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए तुरंत हस्तक्षेप करने का आग्रह किया. जमीयत अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने इस दावे को न केवल बेतुका बताया, बल्कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए बेहद हानिकारक बताया. उन्होंने कहा कि यह भारत के दिल पर 'सीधा हमला' है.
मदनी ने उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जामा मस्जिद को निशाना बनाने वाली हालिया कार्रवाइयों की आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय प्रशासन ने विभाजनकारी तत्वों के नेतृत्व में एक 'सांप्रदायिक पंचायत' की अनुमति दी. मदनी ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ऐसे तत्वों को बेखौफ होकर काम करने की इजाजत देती रही, तो इससे विभाजन गहराने और देश की एकता को दीर्घकालिक नुकसान होने का खतरा है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे दावों को अदालतों द्वारा तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए.
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हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विरासत का उल्लेख करते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि सूफी संत विनम्रता के प्रतीक थे. उन्होंने किसी भू-भाग पर शासन नहीं किया, बल्कि उन्होंने लोगों के दिलों पर राज किया. इसी वजह से आप सुल्तान-उल-हिंद कहलाए. एक हजार सालों से आप इस देश के प्रतीक हैं और आपका व्यक्तित्व शांति के दूत के रूप प्रचलित है.' मदनी ने कहा कि इतिहास को फिर से लिखने और समाज को विभाजित करने के ऐसे प्रयास देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करेगा.
उन्होंने कहा, 'यह जरूरी है कि सरकार और न्यायपालिका सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और शांति की भावना को कायम रखें. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अपने पूरे जीवन यही संदेश दिया.' मदनी ने कहा कि ख्वाजा साहब के गरीबों के प्रति सेवाभाव के कारण लोगों ने उन्हें गरीब नवाज का उपनाम भी दिया. उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अमन-शांति, सहिष्णुता और प्राणियों के प्रति प्रेम है. इंसानी भाईचारा, बराबरी और गरीबों की सेवा की परंपरा जो उन्होंने स्थापित की, वह सभी भारतीयों की समान विरासत है, चाहे वो किसी भी धर्म और समुदाय के हों.