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राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद जम्मू कश्मीर का विभाजन कर सकती है? धारा 370 पर SC ने पूछा सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि जम्मू कश्मीर में स्थानीय पार्टी के सहयोग से आपकी सरकार है. यह बेहतर काम कर रही है. आपने अचानक सरकार से समर्थन वापस ले लिया. फिर केंद्र सरकार राष्ट्रपति को अनुच्छेद 356 आदेश जारी करने के लिए राजी करता है. सत्ता के दुरुपयोग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?

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सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार छठे दिन हुई सुनवाई हुई. इस दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार अपने लाभ के लिए हर पैंतरा अपना रही है. 

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और वकील रिफत आरा भट्ट ने कहा कि जम्मू कश्मीर में स्थानीय पार्टी के सहयोग से आपकी सरकार है. यह बेहतर काम कर रही है. आपने अचानक सरकार से समर्थन वापस ले लिया. फिर केंद्र सरकार राष्ट्रपति को अनुच्छेद 356 आदेश जारी करने के लिए राजी करता है. फिर राष्ट्रपति को विधानसभा का प्रस्ताव जारी करने के लिए राजी किया जाता है. सत्ता के दुरुपयोग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा? संसद कार्यकारी और विधायी कामकाज पर संसद का नियंत्रण है. फिर आप कहते हैं कि राष्ट्रपति सभी शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे. 

राष्ट्रहित क्या है?

दवे ने कहा कि केंद्र सरकार ने उल्लेख किया है कि 370 को रद्द करना राष्ट्रहित में किया गया था लेकिन जवाबी हलफनामे में यह उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रहित क्या है. आज यह मान लेते हैं कि यह फैसला राष्ट्रहित में है. कल सत्तासीन कोई अन्य पार्टी ऐसा फैसला लेने की कोशिश कर सकती है, जो राष्ट्रहित में नहीं है. अगर यह जम्मू कश्मीर में किया जा सकता है तो गुजरात या महाराष्ट्र में क्यों नहीं किया जा सकता.

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उन्होंने कहा कि सरकार को इस तरह की शक्ति देना कानून की नजर में विनाशकारी हो सकती है. यहां विद्रोह है. इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. पूर्वोत्तर के कई राज्यों में विद्रोह की स्थिति है. पंजाब में लंबे समय से विद्रोह है. 

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या संसद राष्ट्रपति शासन के दौरान जम्मू कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने के लिए कानून बना सकती है? याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सत्ता के दुरुपयोग का इससे अच्छा उदाहरण कुछ और नहीं हो सकता. धवन ने पीठ को बताया कि संविधान के अनुच्छेद तीन और चार के तहत एक अनिवार्य शर्त है. इसके तहत मामले को राष्ट्रपति को राज्य विधायिका के पास भेजना पड़ता है. ऐसे में जब राज्य में राष्ट्रपति शासन  लागू था, तो राज्य का पुनर्गठन नहीं हो सकता था.

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