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कारगिल विजय दिवसः 3 महीने में भारतीय जांबाजों ने कैसे नाकाम किए थे पाकिस्तान के मंसूबे, सुनें बहादुरी की कहानी शमीम की जुबानी

हॉल ऑफ फेम लेह एक संग्रहालय है जिसका निर्माण और रखरखाव भारतीय सेना द्वारा किया जाता है. हॉल ऑफ फेम लेह एयरफील्ड के पास स्थित है. यह संग्रहालय उन सैनिकों की याद में बनाया गया है जिन्होंने भारत-पाक युद्ध में अपनी जान गंवाई थी. कारगिल की लड़ाई 3 मई 1999 से 26 जुलाई 1999 तक लड़ी गई थी.

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टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने के बाद जीत का जश्न मनाते भारतीय जवान. (सभी फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)
टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने के बाद जीत का जश्न मनाते भारतीय जवान. (सभी फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)

भारतीय जांबाजों ने अपने पराक्रम और खून से इस देश की अखंडता को जिंदा रखा है. कई बार दुश्मनों ने इस देश को तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन सीमा पर तैनात मां भारती के सपूतों ने हर बार नापाक मंसूबों को नाकाम किया है. ऐसी ही घटना साल 1999 में हुई थी जब पाकिस्तान की ओर से भारत में घुसपैठ हुई थी और फिर दोनों देश में युद्ध छिड़ गया था. इस युद्ध में पाकिस्तान को न सिर्फ मुंह की खानी पड़ी थी बल्कि पूरी दुनिया ने भारतीय बहादुरों के जज्बे का लोहा माना था. इसे जमीन पर लड़ी गई अब तक की सबसे मुश्किल लड़ाइयों में से एक माना जाता है. इस युद्ध में भारतीय जांबाजी की कहानी बता रहे हैं शमीम हसन जो सियाचीन में हुए ऑपरेशन मेघदूत का हिस्सा थे. उन्होंने लेह स्थित हॉल ऑफ फेम संग्रहालय में कारगिल की कहानी का सुनाई. 

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बता दें कि हॉल ऑफ फेम लेह एक संग्रहालय है जिसका निर्माण और रखरखाव भारतीय सेना द्वारा किया जाता है. हॉल ऑफ फेम लेह एयरफील्ड के पास स्थित है. यह संग्रहालय उन सैनिकों की याद में बनाया गया है जिन्होंने भारत-पाक युद्ध में अपनी जान गंवाई थी. कारगिल की लड़ाई 3 मई 1999 से 26 जुलाई 1999 तक लड़ी गई थी. 26 जुलाई को भारतीय सेना ने जीत हासिल की थी. तब से इस तारीख को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है.आइए सुनते हैं कारगिल में भारतीय बहादुरी की कहानी शमीम की जुबानी...

पाकिस्तान ने समझौते को तोड़ा था...

शमीम ने बताया कि 1999 से पहले भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था कि दोनों ही देश के सैनिक सर्दियों में उन इलाकों में अपने जवानों की तैनाती नहीं करेंगे जहां पर बर्फ जमा होगी. शमीम ने बताया कि भारत ने तो इस समझौते का पालन किया लेकिन पाकिस्तान ने धोखे के तहत सर्दियों में इन पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया. इसमें द्रास, टाइगर हिल और कारगिल समेत कई अहम इलाकों पर वो पहुंच गए. उन्होंने कहा कि करीब 134 किमी के दायरे में पाकिस्तानियों ने अपनी पैठ बना ली थी. शमीम ने कहा कि जब हमें इस कब्जे के बारे में पता चला तो जवाब देने की बारी हमारी थी. 

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सौरभ कालिया को मिली जिम्मेदारी..

शमीम ने बताया कि घुसपैठ की जानकारी एक भेड़ चराने वाले ने भारतीय जवानों को दी थी, जिसके बाद सौरभ कालिया के नेतृत्व में एक पेट्रोलिंग टीम को इलाके का मुआयना करने के लिए भेजा गया था. लेकिन सभी 10 जवान इसमें शहीद हो गए. इसके बाद जो ऑपरेशन हुआ उसमें मनोज पांडे को शहादत मिली. उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. 

शमीम ने बताया कि इसके बाद तोलोलिंग की पहाड़ी को अपने कब्जे में लेना भारतीय जवानों के लिए बहुत अहम था. क्योंकि रणनीतिक रूप से तोलोलिंग भारत के लिए बहुत जरूरी था. शमीम ने बताया कि इस पहाड़ी पर कब्जे के लिए विजयंत थापर ने केवल 22 साल की उम्र में शहादत दी. शमीम ने इसके बाद विक्रम बत्रा की कहानी सुनाई. 

यह भी पढ़ें: कारगिल विजय दिवस: लखनऊ सैनिक स्कूल का नाम अब शहीद मनोज पांडे के नाम पर

टाइगर हिल पर कब्जे में लगा एक महीना

शमीम ने बताया कि टाइगर हिल पर बर्फ ज्यादा होने के कारण भारतीय जवानों को इस पर कब्जे में एक महीने से ज्यादा का वक्त लग गया. उन्होंने योगेंद्र सिंह की बहादुरी का किस्सा सुनाया जिन्होंने 17 गोली लगने के बाद भी टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया. शमीम ने बताया कि पाकिस्तानियों ने जितनी भी भारतीय जमीन पर कब्जा किया था उसे भारतीय जवानों ने 3 महीने में छुड़ा लिया था. 

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शमीम ने बताया कि कारगिल युद्द के दौरान 3 महीने में भारत ने अपने 527 जवानों को खोया था. इस युद्द में 1363 जवान घायल हुए थे. तब से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है.

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