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केरल में एक बंदरगाह बन रहा है. इस बंदरगाह को गौतम अडानी की कंपनी बना रही है. बन रहे इस बंदरगाह का नाम वैसे तो विझिंजम पोर्ट है पर इसे अडानी पोर्ट के नाम से भी जाना जाता है.
विझिंजम पोर्ट या अडानी पोर्ट देश का पहला ऐसा बंदरगाह होगा, जहां बड़े-बड़े कंटेनर जहाज आ सकेंगे. लेकिन इस पोर्ट को बनाने का विरोध भी हो रहा है. विरोध को चार महीने से ज्यादा वक्त गुजर भी गया है. पर 26 और 27 नवंबर को ये हिंसक हो गया.
26 नवंबर को कंस्ट्रक्शन साइट के पास हिंसक प्रदर्शन हुए. इसके बाद पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था. उनकी रिहाई की मांग करते हुए 27 नवंबर की रात को प्रदर्शनकारियों ने विझिंजम पुलिस थाने पर हमला कर दिया. इस हमले में 36 पुलिसकर्मी घायल हो गए. इस मामले में पुलिस ने तीन हजार से ज्यादा लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है.
इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने पोर्ट बनाने के लिए सामान लेकर आ रहे ट्रकों को भी जाने से रोक दिया.
इस हिंसा पर मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने गुरुवार को कहा कि कुछ आंदोलकारियों ने शांति भंग करने के 'इरादे' से हिंसा का रास्ता अपनाया था. उन्होंने पुलिस पर हमला किया और पुलिस थाने पर हमला करने की खुलेआम धमकी भी दी.
पर विरोध करने की वजह क्या है?
अडानी पोर्ट का विरोध मछुआरे कर रहे हैं. इन प्रदर्शनों का नेतृत्व लैटिन कैथोलिक चर्च के आर्चबिशप थॉमस नेटो कर रहे हैं.
विरोध प्रदर्शन करने वालों का तर्क है कि इस बंदरगाह के बनने से तटीय क्षरण होगा, जिससे उनकी आजीविका पर असर पड़ेगा. उनका कहना है कि इससे समंदर में रहने वाली मछलियां मर जाएंगी.
बंदरगाह के विरोध में अक्टूबर में मछुआरों ने अपनी बोटों को भी आग लगा दी थी. उनका कहना था जब तट नहीं रहेगा, तो हमारा जीवन भी नहीं बचेगा. हम अपनी आजीविका के साधन को आग लगा रहे हैं. अगर बंदरगाह बनता है तो हम अपना तट हमेशा के लिए खो देंगे.
प्रदर्शनकारियों ने बंदरगाह का काम रुकवाने समेत सात मांगें की थीं. उनका कहना था कि बंदरगाह का काम रोका जाए, तटीय क्षरण पर स्टडी करवाई जाए और तटीय क्षरण की वजह से जिन लोगों के घर और जमीन गई हैं, उन्हें कहीं और बसाया जाए.
मछुआरों की चिंता पर चर्चा के लिए केरल सरकार ने एक कमेटी का गठन भी किया है. सरकार का कहना है कि वो बंदरगाह का काम रोकने को छोड़कर बाकी सभी मांगें मानने को तैयार है. सरकार का दावा है कि मछुआरों के पुनर्वास के लिए 2,450 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं.
प्रदर्शनकारियों की मांगें क्या हैं?
1. बंदरगाह के निर्माण कार्य को रोका जाए.
2. तटीय क्षरण पर स्टडी करवाई जाए.
3. समुद्र के कटाव से जिन लोगों को घर गया, उनका पुनर्वास किया जाए.
4. तटीय क्षरण रोकने के लिए कदम उठाए जाएं.
5. मछली पकड़ने के दौरान मारे गए मछुआरों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए.
6. मछुआरों को मिट्टी के तेल पर सब्सिडी दी जाए.
7. तिरुवनंतपुरम जिले के अंचुथेंगु में स्थित मुथालापोझी फिशिंग हार्बर को साफ किया जाए.
सरकार का क्या है कहना?
23 अगस्त को केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने विधानसभा में बताया था कि ये विरोध प्रदर्शन 'सुनियोजित' लग रहा है. सरकार उनसे बातचीत करने के लिए तैयार है और मछुआरों की चिंताओं का हल करना चाहती है.
केरल के मत्स्य और बंदरगाह विभाग के अधिकारियों ने मछुआरों को भरोसा दिया है कि पोर्ट के दोनों ओर 20 किलोमीटर की दूरी तक पर्यावरण के सारे पहलुओं की लगातार निगरानी की जा रही है.
केरल के पोर्ट मंत्री अहमद देवारकोइल का कहना है कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियन टेक्नोलॉजी और नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंसेस स्टडीज लगातार सारे पर्यावरणीय मानकों की स्टडी कर रही है. उन्होंने बताया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी एक मॉनिटरिंग सेल बनाई है और उसके सामने भी अभी तक तटीय क्षरण होने की बात सामने नहीं आई है.
देवारकोइल का कहना है कि सरकार इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द पूरा करना चाहती है, क्योंकि ये न सिर्फ बड़ा कमर्शियल हब बनेगा बल्कि इससे केरल और देश के इंडस्ट्रियल और इकोनॉमिक सेक्टर में भी बड़ा बदलाव आएगा.
क्या है अडानी पोर्ट?
विझिंजम पोर्ट या अडानी पोर्ट की लागत 7,525 करोड़ रुपये है. ये बंदरगाह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर बन रहा है.
देवारकोइल के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट का 4,600 करोड़ रुपये का खर्चा केरल सरकार उठा रही है. 818 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की ओर से दिए गए हैं और बाकी का खर्चा अडानी ग्रुप उठाएगा. इस बंदरगाह को अडानी ग्रुप की कंपनी और केरल सरकार की विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट लिमिटेड मिलकर बना रही है.
विझिंजम पोर्ट को जनवरी 2014 में ही सारा क्लियरेंस मिल गया था. इस प्रोजेक्ट का काम 5 दिसंबर 2015 से शुरू किया गया था.
इस बंदरगाह को 2019 तक बनकर तैयार होना था, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं और बाद में कोरोना की वजह से इसका काम प्रभावित हुआ. अब दिसंबर 2023 तक का टारगेट रखा गया है. हालांकि, अडानी ग्रुप का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों की वजह से बंदरगाह का काम बाधित हो रहा है और दिसंबर 2023 तक इसका बनकर तैयार होना थोड़ा मुश्किल है.
कंपनी के प्रवक्ता ने न्यूज एजेंसी को बताया कि सितंबर से मई तक का समय समंदर में काम करने के लिए सबसे अच्छा होता है, क्योंकि इस दौरान समंदर शांत रहता है. लेकिन विरोध प्रदर्शनों की वजह से हम तीन महीने गंवा चुके हैं. हम इस प्रोजेक्ट को दिसंबर 2023 तक पूरा करना चाहते थे, लेकिन प्रदर्शनों की वजह से ये डेडलाइन आगे बढ़ सकती है.
कंपनी का दावा है कि अब तक बंदरगाह का 70 फीसदी काम पूरा हो चुका है लेकिन बर्थ कंस्ट्रक्शन और ब्रेकवाटर वर्क का काम 50 फीसदी ही पूरा हुआ है. 2,960 मीटर लंबे ब्रेकवाटर का 1,400 मीटर हिस्सा बन चुका है.
इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव 2015 में कांग्रेस और यूडीएफ के गठबंधन की सरकार के दौरान आया था. तब लैटिन कैथोलिक चर्च ने इसका स्वागत किया था. हालांकि, अब केरल में एलडीएफ की सरकार है और लैटिन कैथोलिक चर्च इसका विरोध कर रही है.
इससे फायदा क्या होगा?
भारत की समुद्री सीमा बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर से लगती हैं. लेकिन हमारे देश में एक भी ऐसा पोर्ट नहीं है, जहां बड़े कंटेनर जहाज आ सकें.
अब चूंकि भारत में ऐसा पोर्ट नहीं है तो अगर समुद्री रास्ते से बड़े जहाजों में कोई सामान हमारे देश में आना हो, तो उसे दुबई, श्रीलंका के कोलंबो या सिंगापुर में रुकना पड़ता है. यहां से सामान छोटे जहाजों के जरिए भारत पहुंचता है. इससे हमें नुकसान पहुंचता है, जबकि दुबई, कोलंबो और सिंगापुर को फायदा होता है.
कंपनी का दावा है कि जब इस पोर्ट का फेज-1 पूरा हो जाएगा तो यहां 10 लाख टीईयू तक की क्षमता होगी और जब ये पूरा बन जाएगा तो इसकी क्षमता 62 लाख टीईयू तक पहुंच जाएगी. टीईयू का मतलब है ट्वेंटी फुट इक्विलेंट यानी 20 फीट तक चौड़े कंटेनर को टीईयू कहा जाता है. यानी, अडानी पोर्ट इतना बड़ा बंदरगाह होगा कि वहां 62 लाख कंटेनर रखे जा सकेंगे.
नौसेना के दक्षिणी कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल एमए हम्पिहोली का कहना है कि विझिंजम पोर्ट न सिर्फ दुबई और कोलंबो के बंदरगाहों को चुनौती देगा, बल्कि इससे भारत की ब्लू इकोनॉमी भी बढ़ेगी और रेवेन्यू जनरेट होगा.