संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत दिलाने वाले संत केशवानंद भारती अब हमारे बीच नहीं हैं. 47 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने 'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. इस फैसले के मुताबिक, संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता.
केरल में इडनीर नाम का एक हिंदू मठ है. केशवानंद भारती इसी मठ के प्रमुख थे. इडनीर मठ केरल सरकार के भूमि-सुधार कानूनों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट गया था. इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत दिया था.
इस मामले में भारती को व्यक्तिगत राहत तो नहीं मिली लेकिन 'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल' मामले की वजह से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत का निर्माण हुआ. जिसने संसद की संशोधन करने की शक्ति को सीमित कर दिया.
इस मामले की सुनवाई 68 दिनों तक चली थी और मुख्य न्यायाधीश एसएम सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. इस मामले की सुनवाई 31 अक्टूबर 1972 को शुरू हुई और 23 मार्च 1973 को पूरी हुई. जानकारों के मुताबिक, ये फैसला करीब 703 पन्नों में सुनाया गया था.
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल मामले के ऐतिहासिक फैसले से कई विदेशी संवैधानिक अदालतों ने भी प्रेरणा ली. कई विदेशी अदालतों ने इस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया. केशवानंद के फैसले के 16 साल बाद, बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने अनवर हुसैन चौधरी बनाम बांग्लादेश में मूल सरंचना सिद्धांत को मान्यता दी थी.
बता दें कि केशवानंद भारती का 6 सितंबर को केरल में निधन हो गया. उनका पूरा नाम केशवानंद भारती श्रीपदगालवारु था. पुलिस के मुताबिक, रविवार तड़के करीब 3.30 बजे उनका निधन हुआ. 79 वर्षीय धर्मगुरु उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी केशवानंद भारती के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा. वहीं, गृहमंत्री अमित शाह ने भी उनके निधन पर खेद प्रकट किया.