कानून मंत्री किरन रिजिजू ने सोमवार को कहा कि सरकार और न्यायपालिका के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं और महाभारत चल रहा है, जैसा कि कुछ लोगों द्वारा पेश किया जा रहा है. कानून मंत्री ने कहा कि हमारे बीच कोई समस्या नहीं है. उन्होंने पूछा कि अगर लोकतंत्र में बहस या चर्चा नहीं होती है तो कैसा लोकतंत्र है.
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट परिसर में गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक सभा को संबोधित करते हुए कानून मंत्री ने यह भी कहा कि चूंकि न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते हैं, इसलिए उन्हें सार्वजनिक जांच का सामना नहीं करना पड़ता है, लेकिन लोग उन्हें देखते हैं और न्याय देने के तरीके से उनका आकलन करते हैं.
उन्होंने कहा कि भारत में अगर लोकतंत्र को फलना-फूलना है तो एक मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना जरूरी है. रिजिजू ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के कुछ विचार हैं और सरकार के कुछ विचार हैं और यदि दोनों मतों में कोई अंतर है तो कुछ लोग इसे ऐसे पेश करते हैं जैसे सरकार और न्यायपालिका के बीच महाभारत चल रहा हो. ऐसा नहीं है. हमारे बीच कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और सरकार के लोग लगातार किसी न किसी तरह रोजाना मिलते हैं.
राय में अंतर का मतलब हमला नहीं: रिजिजू
कानून मंत्री ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी में कहा जाता है कि मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए. हम अलग राय रख सकते हैं. राय में अंतर का मतलब ये नहीं है कि हम एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं. वहीं 6 जनवरी को सीजेआई को लिखे गए पत्र का जिक्र करते हुए रिजिजू ने कहा कि यह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को नियुक्त करने की प्रक्रिया को लेकर लिखा था, जिसमें बताया गया था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजिम में एक प्रतिनिधि रखना चाहती है.
उन्होंने पूछा कि वह सीजेआई और चार वरिष्ठ न्यायाधीशों वाले समूह में एक व्यक्ति को कैसे रख सकते हैं. कानून मंत्री ने कहा कि इसमें कोई "हेड एंड टेल" नहीं था, लेकिन यह लोगों के बीच बहस का विषय बन गया कि सरकार अपने प्रतिनिधियों को कॉलेजियम में कैसे रख सकती है.
न्यायपालिका पर नजर रखते हैं लोग: कानून मंत्री
रिजिजू ने कहा कि सोशल मीडिया पर आम नागरिक सरकार से सवाल पूछते हैं और उन्हें ऐसा करना चाहिए. सरकार पर हमला किया जाता है और हम इसका सामना करते हैं. दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति न्यायाधीश बनता है तो उसे चुनाव का सामना नहीं करना पड़ता है. न्यायाधीशों की कोई सार्वजनिक जांच नहीं होती है. उन्होंने कहा कि चूंकि लोग आपको नहीं चुनते हैं, वे आपकी जगह नहीं ले सकते. लेकिन लोग आपको देख रहे हैं - आपके फैसले, जिस तरह से आप फैसला सुनाते हैं - लोग देख रहे हैं और आकलन करते हैं और राय बनाते हैं.