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मैसूर में कुंभ... यहां भी त्रिवेणी के संगम पर जुटते हैं लोग, दक्षिण का प्रयाग है थिरमकुदालु नरसीपुर, फरवरी में लगेगा महामेला

मैसूर जिले का थिरमकुदालु नरसीपुर एक तरह से गंगा-यमुना और सरस्वती का ही संगम है. थिरमकुदालु नरसीपुर को दक्षिण का काशी कहा जाता है और तीन नदियों के संगम स्थल होने के कारण इसकी महानता तीर्थराज प्रयाग के समान ही है. कहते हैं कि रामायण काल में यह पूरा क्षेत्र शूर्पणखा और उसके भाइयों खर-दूषण के अधिकार में आता था. यहीं से वे राक्षसी गतिविधियों का संचालन करते थे.

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 थिरिमाकुदालु नरसीपुर को दक्षिण के प्रयाग की संज्ञा दी जाती है. यहां स्थित गुंजा नरसिंह स्वामी का भव्य मंदिर, यह मंदिर कावेरी-कपिला नदियों के संगम पर है. (फोटो-विकीपीडिया)
थिरिमाकुदालु नरसीपुर को दक्षिण के प्रयाग की संज्ञा दी जाती है. यहां स्थित गुंजा नरसिंह स्वामी का भव्य मंदिर, यह मंदिर कावेरी-कपिला नदियों के संगम पर है. (फोटो-विकीपीडिया)

महाकुंभ -2025 के आयोजन से प्रयागराज में आस्था और श्रद्धा की अद्भुद छटा देखने को मिल रही है. जब भी कुंभ की बात होती है तो हमारे जेहन में हरिद्वार-प्रयाग और नासिक-उज्जैन का ही ध्यान आता है, लेकिन असल में कुंभ महज चार स्थानों पर ही सीमित नहीं है. आज संस्कृति और धार्मिकता के मुख्य केंद्र भले ही उत्तर भारत में महसूस होते हैं, लेकिन यह पूरी वास्तविकता नहीं है. 

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दक्षिण दिशा में पहले हुआ था परंपराओं का विकास
संपूर्ण भारत में सनातन की सुगंध बिखरी हुई है और हर जगह से मिलाकर ही एक भारतीय परंपरा का विकास हुआ है. ऐसे में दक्षिण भारत का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत के बाद परंपराओं और सभ्यता की विकास इसी दिशा से हुआ. नदियों के संगम में कुंभ मेले की परंपरा का एक सिरा भारत की दक्षिण दिशा से भी निकलता है.

सिर्फ उत्तर भारत की धरोहर नहीं हैं कुंभ
भारत में चार स्थानों पर मान्य तौर पर कुंभ लगते हैं, लेकिन कुंभ की कथा केवल इतनी भर नहीं है. मैसूर जिले के थिरमकुदालु नरसीपुर का कुंभ आध्यात्म का ऐसा ही केंद्र है. यहां कावेरी, कपिला और स्फाटिका नदी के संगम तट पर श्रद्धालु पहुंचते हैं और कुंभ स्नान करते हैं.

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दक्षिण में भी गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम
ये तीनों नाम प्रतीक तौर पर गंगा-यमुना और सरस्वती ही हैं. कावेरी को दक्षिण की गंगा कहा जाता है. यह नदी महर्षि अगस्त्य के कमंडल से निकली है और उनकी पत्नी देवी लोपामुद्रा की प्रतिरूप मानी जाती है. कपिला नदी स्वर्ग लोक की एक गाय है. इसे कामधेनु गाय की पुत्री माना जाता है. कामधेनु की एक और पुत्री थी नंदिनी. कहते हैं कि इसका जल दूध की तरह सफेद है. कपिला गाय को सूर्यदेव ने ऋषियों को यज्ञ के प्रसाद के तौर पर दिया था. इसलिए इसे उनकी भी पुत्री माना जाता है. यह यमुना नदी का प्रतीक है.

वहीं स्फाटिका सरस्वती नदी का प्रतीक है. वास्तव में यह एक झील नुमा ही है, इसकी मान्यता भी गुप्तगामिनी नदी के समान ही है. देवी सरस्वती के हाथ में जिस स्फटिक पत्थरों की माला है, उसके पत्थर इसी झील में मिलते हैं. 

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दक्षिण का काशी और प्रयाग है थिरमाकुदालु नरसीपुर
इस तरह मैसूर जिले का थिरमकुदालु नरसीपुर एक तरह से गंगा-यमुना और सरस्वती का ही संगम है. थिरमकुदालु नरसीपुर को दक्षिण का काशी कहा जाता है और तीन नदियों के संगम स्थल होने के कारण इसकी महानता तीर्थराज प्रयाग के समान ही है. कहते हैं कि रामायण काल में यह पूरा क्षेत्र शूर्पणखा और उसके भाइयों खर-दूषण के अधिकार में आता था. यहीं से वे राक्षसी गतिविधियों का संचालन करते थे.

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रामायण काल से जुड़ा है इतिहास
वनगमन के समय श्रीराम ने इस संगम क्षेत्र में स्थान किया था तबसे इसकी पवित्रता और बढ़ गई. इस स्थान के महादेव शिव और उनके पुत्र गणेश ने पवित्र बताया है. महर्षि कपिल के प्रवास के समय यहां उनका आश्रम था. राक्षसों के कारण जब यह सारी भूमि अपवित्र हो गई तब ऋषियों और सप्तऋषियों की सहायता से यहां सभी तीर्थों को बुलाया गया. वे अपने पवित्र जल के साथ प्रकट हुए और इस संगम स्थान को पवित्रता प्रदान की. 

हर तीन साल पर आयोजित होता है कुंभ
इन्हीं पौराणिक आधार पर थिरमकुदालु नरसीपुर हर तीन साल पर ग्रहों की विशेष स्थिति होने पर कुंभ का आयोजन करता है. इसे यहां दैव्यम स्नान के तौर पर जाना जाता था. माघ मास में यहां पुराने समय से एक मेले जैसा आयोजन होता आ रहा था. जिसे पिछली शताब्दी में ही कुंभज स्नानम् के आयोजन के तौर पर पहचान दी गई है.

कावेरी कुंभ मेला के नाम से विख्यात
जब भी कुंभ मेले का जिक्र होता है, तो हमारे मन में सबसे पहले उत्तर भारत में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर होने वाले विशाल धार्मिक आयोजन की छवि उभरती है, लेकिन दक्षिण भारत में इस आयोजन को कावेरी कुंभमेला भी कहा जाता है. यह मेला कर्नाटक के मैसूर क्षेत्र में कावेरी नदी के तट पर आयोजित होता है और इसकी अपनी विशिष्ट धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता है.

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कावेरी कुंभमेला हर तीन साल में एक बार आयोजित किया जाता है और इसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. इस आयोजन का मुख्य आकर्षण कावेरी नदी में स्नान है, जिसे पवित्र और आत्मा को शुद्ध करने वाला माना जाता है. इसके अलावा, यह मेला भक्तों को दक्षिण भारत की अनूठी संस्कृति, परंपराओं और भक्ति संगीत का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है. कावेरी नदी को दक्षिण भारत में "गंगा" के समान पवित्र माना जाता है. हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. यह मेला विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्व रखता है, जो धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक शांति की खोज में हैं.

पंचतीर्थों की यात्रा भी करते हैं श्रद्धालु
कावेरी कुंभमेला के दौरान श्रद्धालु पास के पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हैं, जिसे पंच तीर्थ यात्रा कहा जाता है. इसे पंचाटन भी कहते हैं. ये पंचतीर्थ पांच अलग-अलग मंदिर हैं. इन्हें अगस्त्येश्वर मंदिर, भिक्षेश्वर मंदिर, मूलस्थानेश्वर मंदिर, आनंदेश्वर मंदिर और गुंजा नरसिंह स्वामी मंदिर के तौर पर जाना जाता है.

इस यात्रा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को आत्मशुद्धि और भक्ति का अनुभव कराना है. कावेरी कुंभमेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है. मेले के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिनमें भक्ति संगीत, पारंपरिक नृत्य और धार्मिक प्रवचन शामिल हैं. इस मेले में कर्नाटक की पारंपरिक लोक कलाओं और संगीत की झलक देखने को मिलती है. भक्तों के लिए आयोजित भक्ति गीत और नृत्य कार्यक्रम इसे और अधिक रोचक बनाते हैं.

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हालांकि कावेरी कुंभमेला का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है, लेकिन इसकी परंपरा दक्षिण भारत की भक्ति परंपरा और संतों की शिक्षाओं से प्रेरित है. यह आयोजन धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक है. दक्षिण भारत के अनेक संतों और भक्त कवियों ने कावेरी नदी की महिमा का गुणगान किया है. उनकी शिक्षाओं और संदेशों का प्रभाव आज भी इस मेले में महसूस किया जा सकता है. कावेरी कुंभमेला न केवल धार्मिक बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. यह मेला लोगों को नदियों और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है. श्रद्धालु न केवल कावेरी नदी की पवित्रता बनाए रखने का संकल्प लेते हैं, बल्कि इस आयोजन के माध्यम से स्वच्छता और हरित जीवनशैली को अपनाने का संदेश भी दिया जाता है.

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उत्तर और दक्षिण के सांस्कृितक संगम का प्रतीक है कावेरी मैसूर कुंभ
कावेरी कुंभमेला लोगों के जीवन में आध्यात्मिक शांति और सामाजिक एकता का संदेश लेकर आता है. यह आयोजन उन लोगों को जोड़ता है, जो विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं से आते हैं, लेकिन एक ही उद्देश्य से जुड़ते हैं—आध्यात्मिक उन्नति और सांस्कृतिक अनुभव. मैसूर का कुंभमेला या कावेरी कुंभमेला दक्षिण भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण है. यह न केवल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को भी प्रदर्शित करता है.

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इस बार 10-12 फरवरी को होने वाला है आयोजन

इस बार यह कुंभ मेला फरवरी में तीन दिन के लिए आयोजित होने वाला है. यह 10 से 12 फरवरी तक होगा, जिसमें श्रद्धालु आकर स्नान करेंगे. 'दि हिंदू' ने इसकी तैयारियों को लेकर अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसके मुताबिक अभी हाल ही में प्रशासन ने इसके इंतजाम का जायजा लिया है. वहीं Youtube पर कर्नाटक टूरिज्म के एक वीडियो में भी इस कुंभ मेले की भव्यता और महत्व को देखा-समझा जा सकता है.

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